श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “चुगली पुलिया।)

?अभी अभी # ९७३ ⇒ आलेख – चुगली पुलिया ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

ताल तो भोपाल का, बाकी सब तलैया है। आजकल बड़े बड़े फ्लाई ओवर बन रहे हैं, जब संसाधनों की कमी थी, नदियों पर पुल बनाए जाते थे और छोटे छोटे नालों पर बरसात के मौसम में आने जाने के लिए छोटा पुल बनाया जाता था।

हमारे शहर में आज भी कृष्णपुरा पुल है जो कभी सबसे बड़ा पुल कहलाता था। रामबाग और कृष्णापुरे के बीच, आज भी एक पुल है, जिसे बीच वाला पुल कहते थे। घर से स्कूल हम इसी पुल से जाते थे। दिन में तो ठीक, रात में इस पुल से गुजरने में डर लगता था। जब यह पुल बना होगा, किसी ने पुल की फर्शी पर ॐ लिख रखा था। चलते वक्त हमें ध्यान रखना पड़ता था, कहीं इस पर पांव न पड़ जाए। पुल के खत्म होने के पहले, एक पिलर से सटा हुआ, कुछ कटा हुआ, एक शब्द लिखा था कग्। रोज पुल पार करते वक्त ध्यान इसी पर रहता था, ॐ आ गया, अब कग् आएगा।।

पुल को अंग्रेजी में ब्रिज कहते है। मेरे शहर में मेरे देखते देखते, कितने ब्रिज बन गए। मुझे अच्छी तरह याद है, आज तिलक पथ पर कहां लोखंडे ब्रिज है, वहां कभी एक छोटी सी पुलिया थी। इस पार से उस पार जाने के लिए खतरों के खिलाड़ी की तरह, संभल संभल उतरे पारा वाला मामला था। हम बच्चे लोगों का तो कई बार पांव भी फिसल जाता था। पानी ज़्यादा नहीं होता था। एक तो mud स्नान और बाद में घर पर पहले तबीयत से पूजा, तत्पश्चात ठंडे पानी से स्नान।।

सारे पुल ब्रिज हुए अब ! ब्रिज तो हावड़ा का, बाकी सब culvert यानी पुलिया है। आज हमारे शहर में नदी तो एक ही है, जिसका सौंदर्यीकरण चल रहा है, लेकिन पुलियाओं की कोई कमी नहीं। बरसाती पानी के निकास के लिए नालों पर पुलिया बनाई जाती थी। नाले तो बंद हो जाते थी, पुलिया मशहूर हो जाती थी।

आज शहर में जगह जगह कई पुलियाएं हैं। किसी को तीन पुलिया कहते हैं, तो किसी को गमला पुलिया। सुबह की सैर पर जाने वाले स्वास्थ्य के प्रति जागरूक नागरिकों के लिए, ये पुलियाएं सुस्ताने के काम आती हैं। सुबह की सैर अकेले नहीं की जाती। चार पांच लोगों का ग्रुप हो, तो समय भी कट जाता है, और थकान भी महसूस नहीं होती। राजनीति, शेयर मार्केट, फिल्म और अफवाहों के अलावा और भी कई मसले होते हैं, जिन पर इन पुलियाओं पर विस्तृत चर्चा होती है।

कुछ पुलियाएं जो मंदिर के करीब स्थित हैं, शाम की आरती के बाद मोहल्ले की महिलाओं के लिए सुरक्षित होती हैं। वहां सड़क के दोनों ओर, आमने सामने एक एक पुलिया है जिसका नाम किसी ने निंदा पुलिया और चुगली पुलिया रख दिया है। निंदा और चुगली में भी अंतर होता है। निंदा तो किसी की भी की जा सकती है, लेकिन चुगली तो अपनों की ही हो सकती है।।

ऐसा माना जाता है कि निंदा खुले आम की जाती है लेकिन चुगली किसी से छुपाकर की जाती है। ‌मैया मोहे दाऊ बहुत खिजायो, यह चुगली नहीं तो और क्या है।।

‌सास को बहू की निन्दा करने का जन्मसिद्ध अधिकार है, इसलिए वह खुले आम निंदा पुलिया पर किसी भी बहू की निन्दा कर सकती है। बचपन में हम निंदा नहीं समझते थे, केवल चुगली से ही काम चला लिया करते थे। किसी के कान भरना क्या चुगली करना नहीं।

‌अगर पुलिया न होती, तो हम अपने दिल की बात कहां करते। दीवारों के भी कान होते हैं, पुलिया के कान, मुंह, आंख कुछ नहीं होते। आज तक किसी पुलिया ने इधर की बात इधर नहीं की। न कुछ लिया, न कुछ दिया। बस जो उस पर बैठा, उसको थोड़ा आराम दिया। उसे अपने मन की बात कहने का मौका दिया। कितनों ने पुलिया पर बैठकर अपनी फिक्र धुएं में उड़ाई है, कितने थके हुए राहगीरों ने यहां बैठकर राहत की सांस पाई है। क्या आपको कभी किसी पुलिया की याद आई है।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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