श्री अजीत सिंह

(हमारे आग्रह पर श्री अजीत सिंह जी (पूर्व समाचार निदेशक, दूरदर्शन) हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए विचारणीय आलेख, वार्ताएं, संस्मरण साझा करते रहते हैं।  इसके लिए हम उनके हृदय से आभारी हैं। आज प्रस्तुत है आपका एक संस्मरणीय आलेख न्यूज़ का मोर्स कोड…।)

☆ आलेख – न्यूज़ का मोर्स कोड… – अजीत सिंह ☆

स्कूल, कॉलेज और यूपीएससी के मोर्स कोड कुछ हाथ लगे, तो हम न्यूज का मोर्स कोड सीखने आकाशवाणी की मॉनिटरिंग सर्विस में पहली नौकरी करने 15 जून 1971 को शिमला पहुंचे। पहले ही दिन हम इस बात को लेकर कुछ हैरान परेशान से हुए कि वहां समाचारों को स्टोरी कहा जा रहा था। स्टोरी तो कुत्ते, बिल्ली, बंदर, भालू, शेर आदि के काल्पनिक विवरण होते हैं, पंचतंत्र की तरह। लड़ते झगड़ते, बतियाते लोगों के विवरण कहानी कैसे हो सकते हैं!

कोई बुद्धु समझ मज़ाक न उड़ाए, इस डर से हमने पूछा भी नहीं। बस कबूल करते गए। आज 54 साल बाद आत्म मंथन से मुझे लगता है कि आदमी और जानवरों की कहानियों में कोई बड़ा फर्क नहीं है। और टीवी न्यूज चैनलों की प्राइम टाइम बहस को देख कर तो बिल्कुल नहीं लगता।

इन दिनों वॉट्सएप पर वायरल एक चुटकुला पढ़ा। पड़ोस का एक व्यक्ति एक लड़की से पूछता है, तुम क्या जॉब करती हो?

“जी मैं कुत्ते लड़वाने का काम करती हूं, लड़की ने कहा।

व्यक्ति ने पूछा, यह कैसी जॉब हुई, कुत्ते लड़वाने की जॉब?

लड़की ने कहा, जी मैं न्यूज चैनल की एंकर हूं।

यह न्यूज का मुद्दा है ही झगड़े का मुद्दा। सब शांत हो, हंसी खुशी का माहौल हो, तो कोई खबर नहीं होती। झगड़ा हो, गाली गलौज हो, मार पीट हो, तोड़ फोड़ हो, जितनी बड़ी हो, इतनी ही बड़ी न्यूज होती है।

न्यूज़ के चलन ने दादी नानी की कहानियां ख़तम कर दी हैं।

डर, सनसनी, जासूसी, ड्रग्स, सेक्स और क्या क्या मसाले डाले जाते हैं न्यूज बनाने के लिए,  इसे समझना ही न्यूज के मोर्स कोड को समझना है।

शुक्र है हम सब कुछ सीखने से बच गए। आकाशवाणी पर उन दिनों साफ सुथरे ढंग से सच्ची बात कहने का समय था।

आज भी बचा है, पर श्रोता दर्शक तो नीजि चैनल ले गए। सिग्नल की कवरेज तो 100% है, पर इसे पकड़ने वाले कितने हैं?

मास मीडिया लत डालता है, फिर आपकी जेब से पैसे निकालता है कि आपको पता भी नहीं लगता। और अब तो हमारे दिमाग की भी चोरी हो रही है।

बड़ा टेढ़ा मोर्स कोड है आजकल के सोशल मीडिया का। हर नागरिक को स्मार्टफोन से ज़्यादा स्मार्ट बनने की जरूरत है। यही कह रही थी पंजाब यूनिवर्सिटी चंडीगढ़ की प्रो अर्चना सिंह गत दिवस हमारे वेबिनार में।

बीते युग की बात कर रहा हूं, जब समाचार टेलीग्राम से भेजे जाते थे, मोर्स कोड की विधि से।

अपने मुंह मियां मिट्ठू होने का संभावित इल्ज़ाम अपने सिर लेते हुए मैं कहना चाहता हूं कि 70 के दशक में जब मैं  संवाददाता बना तो, सही या ग़लत, मुझे अक्सर ऐसा लगता था कि संवाददाता के रूप में मेरा पद आकाशवाणी में सबसे बढ़िया पद था। बड़े बड़े लोगों के संग बातचीत, देश विदेश की यात्राएं, प्रेस कॉन्फ्रेंस और इंटरव्यू, डिनर व लंच, घर व दफ्तर में एस टी डी सुविधा के फोन और राष्ट्रीय समाचार  बुलेटिन में बाइलाइन। और तो और, दफ्तर में आने जाने की कोई समय बद्धता भी नहीं। स्टोरी फाइल की और निकल गए । प्रेस क्लब की ओर या फिर कहीं और गपशप और खाने पीने  के लिए।

इतना कुछ तो  था इस पद के साथ। और क्या चाहिए था! पर धीरे धीरे प्रैसनोट व प्रेस कॉन्फ्रेंस कुछ रूटीन और बोरिंग से लगने लगे। मुझे साहित्यिक गोष्ठियों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में जाना अच्छा लगता था। मेरी पत्रकारिता पर साहित्य का असर होना शुरू हो गया था। कुछ निखार दिखाई देता था। मैंने साहित्य की शैली  तो पकड़ी पर कल्पना का सहारा लेने की आवश्यकता नहीं पड़ी। वो कहते हैं न sometimes facts are stranger than fiction. मेरे सामने फील्ड में ऐसे ही तथ्य थे जो साहित्यिक कल्पना जैसे लगते थे। मैंने जो लिखा, वह कहानियां नहीं हैं, रिपोर्ट्स हैं।

साहित्यिक कार्यक्रमों में  पत्रकार नहीं होते थे। उन्हे वहां कोई न्यूज की संभावना नहीं लगती थी। पर शब्दों पर लेखकों और कवियों की जो पकड़ थी, वह पत्रकारिता में अक्सर नहीं होती थी। मुझे साहित्य में रस आने लगा। पत्रकारिता को जल्दी में लिखा साहित्य कहा जाता है पर साहित्य तो जल्दबाजी में लिखा ही नहीं जा सकता। साहित्य में ठहराव होता है। पत्रकारिता में होड़ लगी रहती है कौन किस से पहले खबर प्रसारित करा लेता है। बदहवास हो जाते हैं पत्रकार इस भाग दौड़ में। कुछ समाचारों को गड्डमगड्डा भी कर जाते हैं। कुछ पत्रकार समाचारों को बढ़ा चढ़ा कर भेजते हैं ताकि उनकी खबर छपे, कहीं समाचार एजेंसी बाज़ी न मार जाएं और उन पर अगले दिन संपादक की डांट पड़े। 

उन दिनों खबर  सबसे पहले आकाशवाणी से ही जाती थी। इसके लिए मुझे ज़्यादा अलर्ट रहना पड़ता था। धीरे धीरे समझ में आने लगा कि तथ्य इकट्ठे कर लेने मात्र से रिपोर्टिंग नहीं होती।

उसे 5 W और 1 H के पारम्परिक स्टाइल में लिखा जाए या वॉयसकास्ट के रूप में पर्सनल टच के साथ। न्यूज़ मैनेजमेंट भी ज़रूरी है। अर्ली मॉर्निंग, लेट मॉर्निंग, अर्ली मिड डे, लेट मिड डे , अर्ली इवनिंग लेट इवनिंग, 6 टाइमजोन  होते थे एक खबर के। वॉइस कास्ट, न्यूजरील, सामयिकी, स्पॉटलाइट, मॉर्निंग कमेंट्री , तब्सरा, कितनी ही संभावनाएं हर खबर में ढूंढ कर रखनी पड़ती थी।

खबर का इंट्रो या मुखड़ा लिखना आसान नहीं होता। इसके लिए पत्रकारों को मेंटल कांस्टिपेशन हो जाती है। लिखते हैं, काटते हैं, फिर लिखते हैं। मुखड़ा लिख लिया जाय तो फिर काम सीधा हो जाता है।

न्यूज़ का मोर्स कोड धीरे धीरे समझ में आता है।

रिपोर्टिंग सामयिक इतिहास लिखने की प्रक्रिया भी है। रिपोर्टर इतिहासिक घटनाओं का गवाह होता है।

संवाददाता के तौर पर मेरी कार्य स्थली जम्मू कश्मीर राज्य रहा।  13 वर्ष जम्मू में और करीबन साढ़े 6 साल श्रीनगर में।

कठिन परिस्थितियों में काम किया। ठीक ही हो गया कुल मिला कर।  ‘कारेस्पांडेंट ऑफ द  ईयर’ नाम से आकाशवाणी पुरस्कार भी मिला । एक ‘सर्टिफिकेट ऑफ मेरिट’ भी मिला।

दिल्ली में न्यूज सर्विसेज डिविजन का न्यूजरूम बड़ी अजीब जगह है। वहां आपकी सर्विस  सेनियोरिटी नहीं चलती। प्रोफेशनल योग्यता की सेनियोरिटी चलती है। बड़े सीनियर अधिकारी छोटे बुलेटिन कर रहे होते हैं और जूनियर अधिकारी एडिटर इन चार्ज बने होते हैं। बड़े धुरंधर किस्म के लोग हैं वहां। कोई स्टेनोग्राफर चिल्ला कर न्यूज एडिटर को कहता है, सर, पार्लियामेंट से पहले द नहीं लगता। अगर आपने क्यों कह दिया तो सुनने को मिल सकता है, अंग्रेज़ी में क्यों नहीं चलता सर।

डी जी हरीश अवस्थी की न्यूज मीटिंग में जाने से लोग डरते थे। पर आदमी कमाल का प्रोफेशनल था। पहली क्लास के बच्चों की तरह हम उनसे न्यूज के  गुर सीखते थे। किसी को तो भयंकर किस्म की डांट भी पड़ती थी। इस सब के बीच न्यूज़ का मोर्स कोड सरल होता गया।

नौकरी से रिटायर हुए तो क्या करें। प्रेस नोट, प्रेस कॉन्फ्रेंस बंद हो गए, अब कैसे और किसकी रिपोर्टिंग करें!

हमने अपने आपको चुनौती दी कि अब आम आदमी की रिपोर्टिंग करेंगे। आम आदमी वह जिसका नाम, काम, संघर्ष और उपलब्धि मीडिया के लिए अक्सर कोई खबर नहीं बनती।

वानप्रस्थ सीनियर सिटीजन क्लब नाम से 8-10 साथियों के साथ मिलकर एक संस्था बनाई। हर सदस्य के विस्तृत आत्म परिचय का कार्यक्रम शुरू हुआ। मैंने रोचक न्यूज फीचर लिख कर स्थानीय समाचार पत्रों को भेजना शुरू किया। यह सिलसिला आज 18  साल बाद भी जारी है और संस्था के सदस्यों की संख्या 140 के करीब पहुंच गई है।

दिमाग में कुछ अजीब से ख्याल आते हैं। दिल को छूने वाली यादें उमड़ने लगती हैं।

लिखने पर मज़बूर कर देती हैं।

बेकस का मकान’,

‘ हरसिंहपुरा की पंजाबी बेटियां, क्यूं बार बार लेती हैं गांव का नाम’

‘छत्रपाल की याद में’,

‘श्रीनगर में सीआरपीएफ की लड़कियां’,

‘रेडियो अनाऊंसर का रेलवे स्टेशन’ ,

‘पूरे परिवार का जन्मदिन 15 अगस्त को ‘,

‘Jingoism, on the rise or on the wane?

‘पीली मंढोरी में जसिया को ढूढने आए थे पंडित जसराज ‘, ‘पितृपक्ष में पिता-स्मृति’

और

‘सुमित्रा ने कहा था…’ 

जैसे लेख बन जाते हैं।

अपने पिता और पत्नी पर लेख लिखना आसान भी है क्योंकि आपसे बेहतर उन्हे कौन जानता है। और मुश्किल भी कि अंतरंग बातों को पाठकों के लिए रुचिकर बना पाना आसान नहीं होता। निजता का सवाल भी है।

कई बार मुझे लगता है कि मानव सभ्यता के विकास में किसी कारण यह त्रुटि आ गई है कि हमें खून खराबा, लड़ाई झगडे, मृत्यु और विध्वंस में न्यूज नजर आती है जिसे हम अति उत्साहित हो प्रचारित करते हैं जबकि हंसते खेलते बच्चों, लहलहाते फूलों, उत्सव मनाते समुदायों में कोई न्यूज नजर नहीं आती। समाज में जैसी  सूचनाएं प्रचारित होगी, वैसा ही समाज बन जाएगा। आजकल हर व्यक्ति ऐसे बहस करता है जैसे टेलीविजन चैनलों पर होती है, उद्वेग और क्रोध से भरी हुई बातें।

गुड न्यूज जैसे गुम ही हो गई है। मैं गुड न्यूज ढूंढ़ता हूं। मेरा यह भी मानना है कि हर व्यक्ति के पास बड़ी कहानियां होती हैं। अगर ढंग से पूछा जाए तो वह बताने का इच्छुक भी है। मैं यही कोशिश करता हूं अपने सीमित सामर्थ्य के साथ।

और पिछले छह साल से मैं गुणीजनों के कई ग्रुपों से जुड़ा हूं जहां मुझे अति  प्रेम और  कुछ करने का उत्साह व प्रेरणा मिलती है।

न्यूज़ का मोर्स कोड शायद धीरे धीरे लेखन के मोर्स कोड की तरफ अग्रसर हो रहा है। मोर्स कोड वाला टेलीग्राम भेजने का सिस्टम अब बंद हो चुका है। नई तकनीक आ रही हैं। उन्हीं के अनुरूप लेखन शैली भी बदल रही हैं। अब फोन पर किसी भी लिपि में बोलकर लिखा और इसे भेजा जा सकता है। सुविधा के अनुरूप मेरी शैली भी बदल रही है। कुछ मित्र कहते हैं मेरा लेखन है तो पत्रकारिता पर इसकी शैली साहित्यिक लगती है।

मैं आपकी कहानियां सुनना चाहता हूं। अपनी कहानियां सुनाना चाहता हूं।

न्यूज़ का मोर्स कोड भी रोचक है, नीरस नहीं।

कठिन है, पर आनंददायक भी। मैंने इसे समझने की कोशिश भी की और इसे अपने अनुरूप ढालने की भी।

धन्यवाद मित्र विजय दीक्षित जी।

एक नई phrase देने के लिए, न्यूज का मोर्स कोड

☆ ☆ ☆ 

 © श्री अजीत सिंह

पूर्व समाचार निदेशक, दूरदर्शन हिसार।

मो : 9466647037

26.01.2025

(लेखक श्री अजीत सिंह हिसार से स्वतंत्र पत्रकार हैं । वे 2006 में दूरदर्शन केंद्र हिसार के समाचार निदेशक के पद से सेवानिवृत्त हुए।)

ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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