श्री अजीत सिंह
(हमारे आग्रह पर श्री अजीत सिंह जी (पूर्व समाचार निदेशक, दूरदर्शन) हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए विचारणीय आलेख, वार्ताएं, संस्मरण साझा करते रहते हैं। इसके लिए हम उनके हृदय से आभारी हैं। आज प्रस्तुत है आपका राष्ट्रीय प्रसारण दिवस पर एक संस्मरणीय आलेख ‘वो भी क्या दिन थे…’।)
☆ आलेख – राष्ट्रीय प्रसारण दिवस पर विशेष… वो भी क्या दिन थे… ☆ श्री अजीत सिंह ☆
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राष्ट्रीय प्रसारण दिवस का इतिहास:
भारत में पहला रेडियो प्रसारण बॉम्बे स्टेशन से 23 जुलाई 1927 को किया गया था। तब स्टेशन का स्वामित्व इंडियन ब्रॉडकास्टिंग कंपनी नामक एक निजी कंपनी के पास था।
सरकार ने 1 अप्रैल 1930 को प्रसारण का कार्यभार संभाला और इसका नाम बदलकर भारतीय राज्य प्रसारण सेवा (आईएसबीएस) कर दिया ।
यह शुरू में प्रायोगिक आधार पर था। बाद में यह स्थायी रूप से 1932 में सरकारी नियंत्रण में आ गया।
8 जून, 1936 को भारतीय राज्य प्रसारण सेवा ऑल इंडिया रेडियो बन गई । 1956 में इसका नाम आकाशवाणी रखा गया।
वर्तमान में, आकाशवाणी दुनिया के सबसे बड़े सार्वजनिक प्रसारण संगठनों में से एक है।
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(प्रसारण दिवस की सभी साथियों को बधाई। मुझे अपने स्कूल समय की एक रोचक घटना याद आ रही है जो मैं आपसे साझा करना चाहता हूं। – श्री अजीत सिंह)
एक रेडियो उद्घोषक ने रेलवे स्टेशन मंज़ूर करवा लिया…
राष्ट्रीय प्रसारण दिवस पर, मुझे उस समय की याद आती है जब एक रेडियो उद्घोषक अपने गांव के लिए एक रेलवे स्टेशन मंजूर करवा सकता था । यह साल 1956 या 57 के आसपास की बात है।जब मैं छठी या सातवीं क्लास का स्कूल छात्र था ।
उस समय हरियाणा पंजाब राज्य का हिस्सा था। जिला करनाल में सरकारी हाई स्कूल कैमला में हमारे शिक्षक ने हमें एक दिन पास के गांव कोहंड तक पैदल मार्च करने के लिए कहा, जहां एक मंत्री को एक जनसभा को संबोधित करना था। हम यात्रा का आनंद लेने के लिए बहुत खुश थे और लगभग तीन किलोमीटर की दूरी कोई बड़ी बात नहीं थी।
रेल राज्य मंत्री श्री शाहनवाज कुछ समय बाद पंडित हिरदे राम के साथ आए, जो कि कोहंड गांव के रहने वाले आकाशवाणी दिल्ली के देहाती कार्यक्रम के एक लोकप्रिय कंपीयर थे।
अपने स्वागत भाषण में हिरदे राम ने रेलवे स्टेशन की मांग की और बदले में मंत्री ने मांग स्वीकार कर ली। हम सभी ने ताली बजाई। ऐसा लग रहा था कि हिरदे राम पहले से ही दिल्ली में मंत्री के साथ डील कर चुके थे।
एक दो महीने के बाद, हम फिर से कोहंड के लिए मार्च कर रहे थे जब पहली ट्रेन वहां रुकी थी। यह एक उत्सव का समय था। इसमें ग्रामीण बैंड बाजे के साथ शामिल हुए। सरपंच और उसके आदमियों ने मिठाई से भरी टोकरियां हर डिब्बे में डाली। बर्फी का एक डब्बा स्टेशन मास्टर के लिए और दूसरा इंजन ड्राइवर के लिए था। पतासों के साथ हमने भी अपनी जेबें भरी थीं।
ट्रेन उस दिन करीब दस मिनट के लिए रुकी। स्टेशन मास्टर ने घोषणा की कि आगे से रेलगाड़ी का ठहराव केवल एक मिनट के लिए होगा ।
असल में, स्टेशन को ट्रैफिक की मात्रा के आधार पर परीक्षण के तौर पर शुरू किया गया था। ट्रैफिक ज्यादा नहीं था। स्थानीय पंचायत ने एक रास्ता तैयार किया: पहला, कोई भी बिना टिकट यात्रा नहीं करेगा और दूसरा, पंचायत निर्धारित न्यूनतम कोटा पूरा करने के लिए पर्याप्त संख्या में प्रतिदिन रेलवे टिकट खरीदेगी।
कोहंड रेलवे स्टेशन अभी भी एक छोटा स्टेशन है। जाहिर है, अब टिकटों की आवश्यक बिक्री को पूरा करने के लिए पर्याप्त ट्रैफिक है। मुश्किल से एक या दो ट्रेनें वहां रुकती हैं। पानीपत और करनाल के लिए यात्री यहां से ट्रेनें लेते हैं।
हमारे गांव में एक सामुदायिक रेडियो सेट था और लोग हर्षोल्लास के साथ देहाती कार्यक्रम सुनते थे। कभी कभी कोई कहता सुनाई पड़ता कि साहब के रूप में बोल रहा आदमी वही व्यक्ति है जिसने अपने गांव कोहंड के लिए रेलवे स्टेशन मंजूर करा लिया था।
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जब मैं अस्सी के दशक में आकाशवाणी जम्मू में संवाददाता के तौर पर काम कर रहा था तो एक सहयोगी ने मुझे एक श्रोता से मिली चिट्ठी दिखाई जिस पर पता लिखा था, “स्टेशन मास्टर, रेडियो कश्मीर, जम्मू” । अक्सर पत्र डायरेक्टर के नाम से आते थे। मैंने कहा इसमें श्रोता की कोई खास गलती नहीं है। अगर रेलवे स्टेशन का मुखिया स्टेशन मास्टर हो सकता है तो रेडियो स्टेशन का मुखिया भी स्टेशन मास्टर क्यों नहीं हो सकता ?
हा हा!
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© श्री अजीत सिंह
पूर्व समाचार निदेशक, दूरदर्शन हिसार।
मो : 9466647037
26.01.2025
(लेखक श्री अजीत सिंह हिसार से स्वतंत्र पत्रकार हैं । वे 2006 में दूरदर्शन केंद्र हिसार के समाचार निदेशक के पद से सेवानिवृत्त हुए।)
≈ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈





