डॉ. रीटा अरोड़ा
(डॉ. रीटा अरोड़ा जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत. सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर। समाचार पत्रों एवं पत्र-पत्रिकाओं में आपके लेख एवं कविताएं निरंतर प्रकाशित होती रही हैं। आपका लेख-संग्रह ‘बांस का विवेक’ हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों संस्करणों में केडीपी (KDP) पर ‘अकीरा अराता’ (AKIRA ARATA) उपनाम से प्रकाशित है। आप जनवादी लेखक संघ, हरियाणा की सक्रिय सदस्य हैं।)
☆ लघुकथा ☆ वह छूटा हुआ मौका ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा ☆
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“माँ, मेरा इंटरव्यू कैंसल हो गया!” निखिल ने फोन पर लगभग चीखते हुए कहा।
“अच्छा… क्यों?”
“कंपनी ने आखिरी समय पर मेल भेज दिया। तीन महीने से तैयारी कर रहा था। आज सुबह से मन ही मन पूरा इंटरव्यू दे चुका था। अब कह रहे हैं—‘नई तारीख बाद में बताएँगे।’”
माँ ने धीरे से पूछा, “तो क्या हुआ?”
“क्या हुआ?” निखिल हँसा, “आपको पता भी है यह नौकरी मेरे लिए कितनी जरूरी थी?”
“हाँ बेटा, पता है।”
“नहीं माँ, आपको नहीं पता। घर का किराया, लोन की किस्त… सब कुछ इसी नौकरी पर टिका था। मुझे लगा था आज सब बदल जाएगा।”
माँ कुछ क्षण चुप रहीं।
फिर बोलीं, “तुमने अपना काम तो पूरा किया था न?”
“हाँ।”
“फिर?”
“फिर क्या? अब इंतज़ार करूँ।”
“कर लो।”
“बस? इतनी आसानी से?”
माँ हल्के से हँसीं, “बेटा, कुछ चीज़ें हमारे हाथ में होती हैं और कुछ नहीं। जो हमारे हाथ में नहीं, उसे पकड़े रहने से हाथ ही दुखता है।”
निखिल कुछ नहीं बोला।
“माँ…”
“हाँ?”
“अगर यह नौकरी नहीं मिली तो?”
“तो तुम क्या करोगे?”
“पता नहीं।”
“और अगर मिल गई तो?”
“तब… सब ठीक हो जाएगा।”
माँ फिर चुप हो गईं।
“क्या हुआ माँ?”
“कुछ नहीं। बस सोच रही थी… इंसान अक्सर जिस दरवाज़े के सामने खड़ा होता है, उसे ही अपनी मंज़िल मान लेता है।”
“आप फिर पहेलियाँ बुझाने लगीं।”
“नहीं बेटा,” माँ ने मुस्कुराकर कहा, “मैं तो बस पूछ रही हूँ—अगर दरवाज़ा देर से खुले तो क्या हम मान लें कि घर में कोई और रास्ता है ही नहीं?”
निखिल ने कोई उत्तर नहीं दिया।
उसी समय उसके मोबाइल पर एक नया मेल आया।
उसने स्क्रीन देखी।
कुछ सेकंड तक चुप रहा।
“माँ…”
“हाँ बेटा?”
“कल एक जगह और इंटरव्यू है। मैंने वहाँ आवेदन तो किया था, लेकिन पहली नौकरी की उम्मीद में उसे लगभग भूल ही गया था।”
माँ मुस्कुराईं, “तो अब?”
निखिल ने खिड़की से बाहर देखा। चेहरे पर सुबह वाली बेचैनी नहीं थी।
“अब लगता है… कल जल्दी उठना पड़ेगा।”
माँ हँस पड़ीं।
“हाँ बेटा, कभी-कभी जिंदगी हमारी योजना बदल देती है… ताकि हम वह रास्ता देख सकें, जिस पर हमने ध्यान ही नहीं दिया था।”
निखिल ने फोन रखा और अगली सुबह की तैयारी में लग गया।
बाहर रात गहरी हो रही थी।
और उसके भीतर… जैसे कोई नया सवेरा धीरे-धीरे उतर रहा था।
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© डॉ रीटा अरोड़ा
सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर करनाल
≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





