डॉ. रामेश्वरम तिवारी
संक्षिप्त परिचय
- हिंदी-प्राध्यापक(सेवानिवृत्त) महारानी लक्ष्मीबाई शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भोपाल (म.प्र).
- नई दुनिया, दैनिक भास्कर, वीणा, हंस, धर्मयुग, कादम्बिनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविता और लघुकथाएँ प्रकाशित। पुस्तकः कविता के ज़रिए, मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित।
आज प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम विचारणीय लघुकथा बलि।
☆ लघुकथा – बलि ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆
गाँव में पैदा हुई प्राइमरी क्लास तक पढ़ी-लिखी मंगली की शादी शहर में ऑटो रिक्शा चलाकर अपना गुजर-बसर करने वाले राजू से हो गई। वह पहली बार ट्रेन में बैठकर शहर पहुँची। शहर की भीड़-भाड़ और रौशनी की चकाचौंध देखकर कुछ दिनों के लिए उसका सर ऐसा चकराया कि बेचारी घर से बाहर ही नहीं निकली।
पर जैसाकि सूरज के निकलने पर धीरे-धीरे अँधेरा छँटता है और चीजें साफ़ होती जाती है। मंगली भी शहर की आबो-हवा की आदी हो गई। शादी के बाद राजू को जब ऑटो चालन से जीवन-यापन में मुश्किलें आने लगी, तो मंगली ने पड़ोस के बँगले में रहने वाले साहब के घर पर झाड़ू-पोंछा करने का काम शुरू कर दिया।
मंगली की बोल-चाल और व्यवहार इतना अच्छा था कि उसने मेम साहब का दिल जीत लिया। एक दिन वह मेम साहब से बोली- ‘मेडम जी, मुझे इस माह की पगार नगदी में चाहिए। माल जाकर बच्चों और उनके पापा के लिए कपड़े ख़रीदना है।’
पहली तारीख़ को मेम साहब ने मंगली से कहा- ‘चलो आज माल चलते हैं। मुझे भी कुछ ख़रीददारी वग़ैरह करनी है। वहाँ पर लगे एटीएम से रुपए निकालकर तुम्हें दे दूँगी।’ मंगली पहली बार माल पहुँची। मेम साहब से उसने रुपए लिए और उनके साथ कपड़ों के ब्राँडेड स्टोर पहुँची। वहाँ पर उसने देखा कि कुछ जवान लड़कियाँ शर्मनाक कपड़े पहने हुए है। वह मेम साहब के पास जाकर धीरे से कान में बोली- ‘मेडम जी, जरा पीछे मुड़कर देखिए। इन्होंने अपने बदन पर, नहीं के बराबर कपड़े पहन रखे हैं।’ मेम साहब बोली- ‘मंगली यह तुम्हारा गाँव नहीं हैं। शहर की लड़कियाँ तुम्हारे जैसी साड़ी-लहंगा नहीं, लड़कों वाले कपड़े पहनती हैं। वह भी अधनंगे। तुम्हें मालूम नहीं आजकल फ़ैशन की दुनिया में नंगई की प्रतिस्पर्धा चल रही है।’
पर एक सुबह बड़े वाले बँगले के साहब और मेम साहब बाहर बरामदे में बैठकर चाय की चुस्कियाँ ले रहे थे। तभी उन्होंने देखा कि मंगली अधनंगे कपड़े पहनकर बड़ी ठसक के साथ जलवा बिखेरते हुए चली आ रही है और वहीं मोहल्ले के शोहदे अपने दीठों को फाड़कर उसे घूरे जा रहे हैं। गाँव की रहने वाली भोली-भाली, सीधी-सादी मंगली पर शहरी पहनावे का ऐसा रंग चढ़ा कि देखा-देखी के फेर में बेचारी नंगई की बलि चढ़ गई।
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© डॉ. रामेश्वरम तिवारी
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