जगत सिंह बिष्ट

(मास्टर टीचर : हैप्पीनेस्स अँड वेल-बीइंग, हास्य-योग मास्टर ट्रेनर, लेखक, ब्लॉगर, शिक्षाविद एवं विशिष्ट वक्ता)

☆ कथा कहानी ☆ नई सुबह ☆ श्री जगत सिंह बिष्ट ☆

भोर की पहली किरण धरती पर उतर रही थी। हवा में ठंडक थी और खेतों पर ओस की बूँदें चमक रही थीं। टोपी और छड़ी लिए गांव के बुजुर्ग धनीराम अपनी रोज़ की सैर पर निकले थे। रास्ते के किनारे अचानक उन्होंने देखा—एक युवक मिट्टी पर औंधा पड़ा है। उसके पास एक भूरा, दुबला कुत्ता चौकन्ना बैठा था, जैसे उसकी रखवाली कर रहा हो।

 

सूरज की किरण जब युवक के चेहरे पर पड़ी, तो कुत्ते ने उसकी नाक के पास सूंघकर एक गरम बौछार छोड़ दी। युवक कराहा, होंठ खुले, कुछ बूंदें भीतर चली गईं। उसने बड़बड़ाया—“और डालो रे, एक और पैग!”

 

धनीराम ठिठक गए। पास जाकर देखा—यह तो पारगांव का पंकज है! अच्छे किसान परिवार का लड़का, पर हाल के दिनों में बुरी संगत में पड़ गया था। उन्होंने छड़ी से कुत्ते को हलका इशारा किया और बोले—

“उठ भुला, घर जा। तेरी ईजा तेरे लिए रातभर जाग रही होगी।”

पंकज ने आंखें मलते हुए चारों ओर देखा। सिर भारी था, मुंह कसैला। कल रात के नशे और दोस्तों की हंसी-मजाक की धुंधली यादें दिमाग में तैर गईं। वह धीरे-धीरे उठा, लड़खड़ाते कदमों से घर की ओर बढ़ा। कुत्ता उसके पीछे-पीछे चला।

 

घर पहुंचा तो मां मवेशियों को चारा डाल रही थी। आंगन में चिड़ियां चहचहा रही थीं। पंकज चुपचाप दहलीज पर बैठ गया। सिर झुका हुआ, चेहरा अपराधबोध से भरा। कुत्ता उसके पैरों के पास बैठा पूंछ हिलाने लगा।

मां ने देखा, पर कुछ नहीं कहा। न ताना, न डांट। बस थाली में दो रोटियां रख दीं। वही मौन, वही करुणा—जिसकी आवाज़ शब्दों से कहीं अधिक गहरी होती है।

पंकज ने एक रोटी का टुकड़ा तोड़कर कुत्ते के आगे डाल दिया, फिर बोला—

“चल साथी, खेत चलते हैं।”

 

दिनभर खेत में वही रहा। धान की बालियां हवा में झूम रही थीं, जैसे प्रभात की प्रार्थना कर रही हों। पसीना बहता गया, और हर बूंद के साथ भीतर की गंदगी भी धुलती गई।

दोपहर में दाल-चावल खाया, और उसी कटोरे में कुत्ते को दूध में चावल मिलाकर दिया। दोनों ने साथ भोजन किया।

शाम को जब घर लौटा, तो मां शांत थी। दीपक की लौ स्थिर थी।

पंकज ने उस मौन में वह पुकार सुनी, जो किसी प्रवचन में नहीं मिलती—मां की मूक क्षमा की पुकार।

 

रात हुई। पंकज के भीतर फिर बेचैनी उठी। दरवाजे की ओर बढ़ा ही था कि कुत्ता उछलकर उसकी पैंट पकड़ लेता है—बिना भौंके, बिना गुर्राए, बस रोकता है।

उसकी आंखों में जैसे लिखा था—“अब नहीं, बस अब लौट चल।”

 

पंकज ठिठक गया। मां का चेहरा आंखों के आगे घूम गया।

वह लौट आया, चुपचाप थाली में बैठा, खाना खाया और कुछ कौर कुत्ते को दिए।

रात गहरी थी, पर मन में एक अजीब-सी शांति थी।

 

सुबह पक्षियों की मधुर बोली ने उसे जगाया। सूरज की किरणें कमरे में उतर आई थीं। उसने शुद्ध जल से मुंह धोया, कुल्ला किया, आंखों में बूंदें डालीं।

तभी मां की आवाज़ आई—

“बेटा, बछिया को घास डाल दे, दूध दुहने का समय हो गया।”

 

पंकज मुस्कुराया—वह मुस्कान जो भीतर से आती है।

उसने कुत्ते के सिर पर हाथ फेरा और बोला—

“चल साथी, आज सच में नई सुबह है।”

 

दोनों खेत की ओर चले—एक प्राणी, जिसने अपने मालिक को जगाया; और एक मनुष्य, जिसने खुद को पाया।

गांव की गलियों में रोशनी फैल चुकी थी।

 

©  जगत सिंह बिष्ट

इंदौर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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2 Comments
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Hemant Tarey
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मार्मिक ❤️

जगत सिंह बिष्ट
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आभार!🌷