श्रीमती अर्चना द्विवेदी ‘गुदालू’
(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती अर्चना द्विवेदी ‘गुदालू’ जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत। शिक्षा – स्नातकोत्तर (समाज शास्त्र ए हिंदी साहित्य), सम्मान – अनेक साहित्यिक सम्मान से अलंकृत। प्रकाशन – साझा संकलन एवं पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित,आकाशवाणी में काव्यपाठ। सम्प्रति – गृहणी, श्रोता एवं रचनाकार। अभिरुचि – साहित्य, संगीत, प्रकृति, देशाटन। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – श्री गणेश।)
☆ लघुकथा ☆ श्री गणेश श्रीमती अर्चना द्विवेदी ‘गुदालू’ ☆
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शाम ढलते ही गणेश पंडाल गेंदे के फूलों और झिलमिलाती लाइटों से सज गया था। ढोल-मंजीरों की गूँज के साथ संध्या आरती हुई। सभी ने श्रद्धा से आरती की और प्रसाद लेकर अपने घरों की ओर मुड़े ही थे कि बाहर गाड़ियों का शोर गूँजा।
“अरे हटो, नेता जी आ रहे हैं!”
कार्यकर्ताओं के लावलश्कर के साथ स्थानीय नेता जी समर्थकों समेत पंडाल में दाखिल हुए। मुख्य कार्यकर्ताओं ने उन्हें तुरंत गणेश प्रतिमा के सामने ला खड़ा किया।
एक कार्यकर्ता ने पुजारी के हाथ से थाली लेकर नेता जी को थमा दी और जोर से बोला, “मुख्य अतिथि आ गए हैं, आरती दोबारा होगी!”
पुजारी ने असमंजस में भगवान की मूर्ति और फिर नेता जी की ओर देखा। इसके बाद भारी मन से घंटी उठाई और बोले, “ॐ जय गणेश देवा…”
नेता जी ने कैमरों की तरफ देखकर आरती शुरू की। जो लोग घर जा चुके थे, वे भी रुककर इस तमाशे को देखने लगे। बप्पा के दरबार में भक्ति पीछे छूट गई थी और प्रोटोकॉल का बोलबाला हो चुका था।
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© श्रीमती अर्चना द्विवेदी ‘गुदालू’ ‘✍️
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