मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग
कविता – युगांतर..
मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग ☆
कुछ इस तरह
मुद्दतों बाद उसका
अचानक मिलना
यूँ के माज़ी की किताब के सारे सफ़ों का
फरफरा कर उड़कर पलट जाना
यादों की जमीं, ज़िद्दी गर्द का
तीखे तेवर दिखाना
फिर उस किताब को वापस बंद कर
यथार्थ के संसार में वापस लौट आना
उनींदी आंखों से अधूरे टूटे सपने को वापस जोड़
फिर से देखने की,नाकाम कोशिश करना
बीते काल के उस टीले के, शिखर को
मायूस आंखों से देखने,को छुपाना
जहां से नीचे उतर आया था, कभी
उम्मीदों के सारे अवशेष,वहीं छोड़कर
जहां से, मालूम था कि
टूटे तार,
फिर कभी नहीं जुड़ते …!!!!!
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© मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग
संपर्क – बिलासपुर (छ ग) मो नं 8319743682
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈




