मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग
कविता – मन, मानस और हम…
मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग ☆
उम्र के सत्तरवें दशक में कदम रखते हुए भी..
दिल और ज़हन
न वो बचपन की मासूमियत भूल पाता है..
न वो नटखटपन, न शरारतें,
न वो जवानी की रुमानियत।
जिस्म चुकता जाता है ..
स्मृतियाँ तरो ताज़ा होती जातीं हैं ।
माज़ी (अतीत) तकरीबन रोज़..
चौखट पर आकर, दरवज्जे पर,
दस्तक देता है।
चाहे कुछ लम्हों को सही..
वजूद लौट आता है
उस हाशिये पर
जहाँ स्वच्छंदता थी..
मन आवारा था, भावनाओं में।
न ज़िम्मेदारियां, न संघर्ष था जीवन..
बस अपनी सांसें, अपनी धड़कनें थीं।
कल्पनाओं की उस “टाईम मशीन” का शुक्रिया
जो हमें चाहे अनचाहे उस दौर ए वक़्त में ले जाती है…!!!!!
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© मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग
संपर्क – बिलासपुर (छ ग) मो नं 8319743682
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





