श्री शांतिलाल जैन

(आदरणीय अग्रज एवं वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री शांतिलाल जैन जी विगत दो  दशक से भी अधिक समय से व्यंग्य विधा के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी पुस्तक  ‘न जाना इस देश’ को साहित्य अकादमी के राजेंद्र अनुरागी पुरस्कार से नवाजा गया है। इसके अतिरिक्त आप कई ख्यातिनाम पुरस्कारों से अलंकृत किए गए हैं। इनमें हरिकृष्ण तेलंग स्मृति सम्मान एवं डॉ ज्ञान चतुर्वेदी पुरस्कार प्रमुख हैं। श्री शांतिलाल जैन जी  के  स्थायी स्तम्भ – शेष कुशल  में आज प्रस्तुत है उनका एक अप्रतिम और विचारणीय व्यंग्य  “बकरे की अम्मा कब तक खैर मनाएगी…” ।)

☆ शेष कुशल # 54 ☆

☆ व्यंग्य – “बकरे की अम्मा कब तक खैर मनाएगी… – शांतिलाल जैन 

थैंक गॉड, मैं बिहार में वोटर नहीं हूँ. होता तो इस समय इन पंक्तियों को लिखने की बजाए भगवान चित्रगुप्त की आराधना कर रहा होता. वे ही होते जो पहचान के संकट की इस घड़ी में हमारी मदद कर पाने की स्थिति में होते. माता-पिता अब इहलोक में हैं नहीं. उनका जन्म स्थान और जन्म तारीख इस समय कोई बता पाने की स्थिति में हैं तो वे सिर्फ चित्रगुप्त ही हैं. उनकी खाताबही में तो हर आत्मा का इनवर्ड आउटवर्ड दर्ज़ रहता है. पेरेंट्स के कागज़ मिल नहीं रहे हों तो चित्रगुप्त की शरण में जाने के अलावा और रास्ता ही क्या बचता है ? समस्या रहमान मियाँ को भी फेस करनी पड़ रही होती और मिस्टर थॉमस को भी. उनको और भी ज्यादा, उनके रिलिजन में आत्मा की आवाजाही का रिकार्ड रखने का कोई सिस्टम ही नहीं है. वैसे भी सारी कवायद उनके चक्कर में ही हो रही है. उनसे तो बस थोड़ी सी दर्दमंदी रखी जा सकती है. नए निज़ाम में उसके अपने खतरे हैं. बहरहाल, अपन के लिए बड़ा सवाल ये है कि चित्रगुप्त को प्रसन्न कर पाने में असफल रहने पर अपन क्या करते?

गिव-अप कर देते. भाड़ में जाए वोट देने का अधिकार. न हो वोटर लिस्ट में नाम, न सही. वोट देने से क्या ही बदल जाएगा! पहले भी कितनी बार अंगुली काली कराई है, कभी लोकसभा, कभी विधानसभा, कभी मुन्सीपाल्टी, कभी पंचायत. तर्ज़नी परमानेंट काली होने को है मगर बदला क्या? वही करप्शन, वही महंगाई, वही बेरोज़गारी, वैसी ही बदहाल सड़कें, गिरते पुल, पटरी से उतरती रेलें, वीरान से सरकारी स्कूल, उजड़े-उजड़े से खैराती अस्पताल, जनप्रतिनिधियों की बेशर्मी, झूठ, दोगलापन, पल्टियाँ, वादाखिलाफी, बिलो-बेल्ट हरकतें – अभी तक कुछ नहीं बदला तो अब क्या बदल जाएगा. बदला है तो सिरिफ अमीरों के लिए. अमीर अधिक  अमीर हुए, गरीब और अधिक गरीब. अपन की गरीबी का क्या! वोट दिया तो भी बढ़नी है नहीं दिया तो भी. जितनी बार तर्जनी काली कराओ देश में कालाधन उतने गुना बढ़ जाता है, दोनों में एक खास किसम का को-रिलेशन है. एक दिन सब वोट उनका होगा, धन तो उनका है ही. अपन की तो नाम कट न जाए के चक्कर में एक दिन की दिहाड़ी कट जाने को है. रखे सरकार वोट देने का अधिकार अपने पास, जिसको देना हो दे. अपन तो निकलते हैं यहाँ से.

भ्रम और घबराहट सरजू बाबू में भी हैं मगर वे मेरी तरह पलायन में भरोसा नहीं रखते. बोले – ‘एतना अर्ली नरभस नहीं न होईएगा सांतिबाबू. तनी कोशिश करके खोजिएगा त कहीं से न कहीं से एक सेट माई-बाप का जुगाड़ हो जाएगा. अभेलेबल हुईए त उन्हीं को पेरेंट नहीं न बना लीजिएगा. दुनियादारी में सफल लोग गदहा को बाप बना लेते हैं, आपको तो…..’

‘वही तो नहीं हो पाएगा सरजू बाबू. बाप बदलने की कला आती तो अपन भी कहीं के मंत्री सांसद विधायक होते. जिन्दगी दिहाड़ी मजूरी करते पाँच किलो राशन के भरोसे कटती नहीं.’

‘डेमोकिरसी के रक्शा का सवाल बा सांतिबाबू. आपन के भोट देने का अधिकार का रक्शा तो करना ही पड़ेगा.’

‘बहुत भोले हैं आप बाबू सरजू परसाद, इनको अधिकार देना ही होता तो इनके ही जारी किए हुए दस्तावेज़ ये मान्य नहीं कर लेते. ये देने की नहीं छीनने की कवायद है. जब छिना ही जाना है तो टाईम भेस्ट क्यों करना. कोउ नृप होई हमै का हानि.’

इस बीच एक खुशख़बर आई. अपन का फॉर्म अपलोड गया. बीएलओ साब खुदऐ पूरे टोले के फॉर्म भर दिए हैं. न घर आए, न फॉर्म दिया, न दस्तखत कराए, पूरा गाँव-टोला का फॉर्म अपलोड कर दिए. इफिशियंट बिहार! लोग नाहक बदनाम करते हैं. अब डर सिर्फ इतना है कि जैसे नाम चढ़ाया है वैसे ही काट न दें. काट भी दें तो कोई बात नहीं वोट देकर क्या हासिल कर लेंगे हम. रहनुमाओं से बस इतनी सी इल्तजा है आर्यावर्त का नागरिक बना रहने दें.

ख्यालों से बाहर निकलकर बिहार से एम्पी में लौट आया हूँ. बकरे की अम्मा कब तक खैर मनाएगी. आज नहीं तो कल भगवान चित्रगुप्त की मेहर तो एम्पी में भी लगेगी. तब की तब देखी जाएगी. फिलवक्त नीली छतरीवाले का शुक्रिया अदा कर रहा हूँ – ‘थैंक गॉड, मैं बिहार में वोटर नहीं हूँ’.

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© शांतिलाल जैन 

बी-8/12, महानंदा नगर, उज्जैन (म.प्र.) – 456010

9425019837 (M)

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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