श्री शांतिलाल जैन
(आदरणीय अग्रज एवं वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री शांतिलाल जैन जी विगत दो दशक से भी अधिक समय से व्यंग्य विधा के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी पुस्तक ‘न जाना इस देश’ को साहित्य अकादमी के राजेंद्र अनुरागी पुरस्कार से नवाजा गया है। इसके अतिरिक्त आप कई ख्यातिनाम पुरस्कारों से अलंकृत किए गए हैं। इनमें हरिकृष्ण तेलंग स्मृति सम्मान एवं डॉ ज्ञान चतुर्वेदी पुरस्कार प्रमुख हैं। श्री शांतिलाल जैन जी के स्थायी स्तम्भ – शेष कुशल में आज प्रस्तुत है उनका एक अप्रतिम और विचारणीय व्यंग्य “सोनम (गुप्ता नहीं): बावफ़ा से बेवफ़ा तक…” ।)
☆ शेष कुशल # ५६ ☆
☆ व्यंग्य – “सोनम (गुप्ता नहीं): बावफ़ा से बेवफ़ा तक…” – शांतिलाल जैन ☆
वफ़ा का तो ऐसा है जनाब कि एक अनचाहा कदम उठा और आप बावफ़ा से बेवफ़ा हुए. 2016 की नोटबंदी में दस रूपए के नोट से मशहूर हुई सोनम गुप्ता के बेवफ़ा होने की कहानी की असलियत का तो अभी तक पता नहीं चला मगर सोनम के बेवफ़ा होने की चर्चा फिर से एकबार आम हो चली है. लेह के अवाम ने मनचाहा कदम उठाना चाहा तो मुल्क के निज़ाम ने अनचाहा फील किया और ‘सोनम(टू) बावफ़ा से बेवफ़ा’ हो गई. दस का नोट बच गया. लिखकर मुनादी कराने की जरूरत भी ना पड़ी.
अह्द आसान है पर उसकी वफ़ा मुश्किल है. सूबे को आईन की छठी अनुसूची में जोड़ेंगे. वादा किया था निज़ाम ने. निभाया तो नहीं और बेवफ़ाई का इल्ज़ाम अलबत्ता सोनम के नाम जड़ दिया. कसूर बस इतना ही कि वे दो-तीन बरस से मुक़ाबिल थे निज़ाम के, दाग़ देहलवी का शेर दोहरा रहे थे – ‘वफ़ा करेंगे निबाहेंगे बात मानेंगे, तुम्हें भी याद है कुछ ये कलाम किस का था.’
स्टीरियो टाईप जवाब निज़ाम का – ‘क्यूँ पशेमाँ हो अगर वअ’दा वफ़ा हो न सका, कहीं वादे भी निभाने के लिए होते हैं.’
अब अवाम के इस भोलेपन पर क्या ही कहें – आदतन तुमने कर लिए वादे और आदतन हमने ए’तिबार कर लिया. वादा तो पूर्ण राज्य का दर्ज़ा देने का भी था. ’सादगी तो हमारी ज़रा देखिए ए’तिबार आपके वादे पर कर लिया.’ इंतिज़ार लंबा खिंचा तो इधर सूबे का अवाम सड़कों पर उतर आया, उधर निज़ाम की आँखों में खून उतर आया. यूँ तो निज़ाम की बेवफ़ाई के दर्ज़नों किस्से हवा में तैरते रहते हैं मगर आँखों में इतनी तेज़ी से खून उतर आए ऐसा कम ही हुआ होगा. खून जो निज़ाम की आँखों में उतरता है वो अवाम की छाती चीर कर बहने लगता है. चार निर्दोष जवान सीने चाक् कर दिए गए. वफ़ादार नायक कल तक निज़ाम की आँख का तारा हुआ करे था, फलक से टूटा तो सीधे जेल में लेंड कर गया. पुलिस भी तेरी, अदालत भी तेरी, गवाह भी तू ही रहा. वफ़ा खुद से नहीं होती ख़फ़ा अवाम पर होते हो!!
निज़ाम के पास सतह से लेकर समंदर और आसमां को तक को चीरने के लिए सेना मौजूद थी. मगर उसकी सबसे मज़बूत सेना वर्चुअल दुनियाँ में थी – ट्रोल आर्मी. पुलिसिया कार्रवाई के सामानांतर चलते ट्रोल, कीचड़ फैंकने, कालिख पोतने में प्राम्प्ट भी और प्रवीण भी. बेवफ़ा का ख़िताब नवाजने तक सीमित नहीं रही ट्रोल आर्मी. ‘थ्री ईडियट्स’ का प्रेरणा-नायक, शिक्षाविद, दुनिया के सौ सबसे प्रभावशाली टाइम क्लाईमेट लीडर्स में शामिल एक खरा-खरा पर्यावरण संरक्षक, देशभक्त को गद्दार, पाकिस्तानी एजेंट जैसे कारतूस चला-चला कर लहू-लुहान कर दिया उसने. गंगोत्रियाँ झूठ की भी तो होती हैं जनाब. सोनम को बेवफ़ा का ख़िताब नवाजने की मैली-धारा आईटी सेल की गंगोत्री से निकली और मीडिया में बह चली. ‘बेवफ़ा’ से ‘बदनाम हुई’ तक सोनम(टू) सलाखों के पीछे है, उसका सवाल है –
’मुझ से क्या हो सका वफ़ा के सिवा,
मुझ को मिलता भी क्या सज़ा के सिवा.’
मुनासिब जवाब किसी के पास नहीं, अपन के पास तो बिलकुल नहीं.
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(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)
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