श्री शांतिलाल जैन
(आदरणीय अग्रज एवं वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री शांतिलाल जैन जी विगत दो दशक से भी अधिक समय से व्यंग्य विधा के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी पुस्तक ‘न जाना इस देश’ को साहित्य अकादमी के राजेंद्र अनुरागी पुरस्कार से नवाजा गया है। इसके अतिरिक्त आप कई ख्यातिनाम पुरस्कारों से अलंकृत किए गए हैं। इनमें हरिकृष्ण तेलंग स्मृति सम्मान एवं डॉ ज्ञान चतुर्वेदी पुरस्कार प्रमुख हैं। श्री शांतिलाल जैन जी के स्थायी स्तम्भ – शेष कुशल में आज प्रस्तुत है उनका एक अप्रतिम और विचारणीय व्यंग्य “मृत्यु का प्रमाणपत्र और नागरिकता का संकट…” ।)
☆ शेष कुशल # ६४ ☆
☆ व्यंग्य – “मृत्यु का प्रमाणपत्र और नागरिकता का संकट…” – शांतिलाल जैन ☆
मेरी एक विनम्र सलाह है श्रीमान. अपने परिजनों से कह कर रखें कि आपका अंतिम समय जब भी आए तो आपका मृत्यु प्रमाणपत्र आपके सिरहाने रख दिया जाए. साथ में ले जाने में सुभीता रहे. ट्रेवल डॉक्यूमेंट है श्रीमान्, इहलोक से परलोक तक की यात्रा का वैध दस्तावेज. हालाँकि यह आपके आर्यावर्त के नागरिक होने का प्रमाण नहीं है, तब भी यात्रा के दौरान लगता है. क्या!! पासपोर्ट के बाबत नहीं सुना आपने? पासपोर्ट आपके नागरिक होने का प्रमाण नहीं है – ट्रेवल डॉक्यूमेंट है. मृत्यु प्रमाणपत्र में इतना तो लिखा है कि आप मरे हैं मगर यह नहीं लिखा कि आप आर्यावर्त के नागरिक के तौर पर मरे हैं.
क्या कहा आपने? मरने से पहले मरने का प्रमाणपत्र कैसे बनेगा? तो या तो आप बहुत भोले हैं या बेवकूफ़. रिश्वत के बाबत नहीं सुना आपने? इसे दिए जाने के बाद आप हर उस सज्जन का डेथ सर्टिफिकेट बनवा सकते हैं जो कभी जन्मा ही नहीं. प्रॉविजिनल डेथ सर्टिफिकेट भी बनवाकर रख सकते हैं – सब्जेक्ट टू बी इफेक्टिव फ्रॉम दी एक्चुअल टाईम ऑफ़ डेथ. मेरी बात को सिंसियरली लीजिए श्रीमान्, इस बार आप झूमरीतलैया तक नहीं जा रहे, बैकुंठधाम व्हाया अंतरिक्ष जा रहे हैं. वैतरणी पड़ेगी रास्ते में. हो सकता है डेथ सर्टिफिकेट के अभाव में कामधेनु पूँछ पकड़वाने से मना कर दे. कागज़ दिखाए बगैर वैतरणी पार नहीं कर पाएँगे आप.
अब आप पूछेंगे कि मुझे कैसे पता परलोक यात्रा के बारे में? तो मैं बताना चाहता हूँ कि मैं अभी अभी जाकर वापस आया हूँ. वापस क्या आया हूँ वापस भेज दिया गया हूँ. वो तो अच्छा है मैंने अपना डेथ सर्टिफिकेट पहले से बनवाकर रखा था, रास्ते में दिक्कत नहीं आई. लेकिन पहुँचने पर मुझे बैकुंठधाम के दरवाजे से ही बैक-टू-पेवेलियन कर दिया गया. हालाँकि मेरे पास आधार कार्ड भी था. बोले – आधार केवल आपकी पहचान और पते का दस्तावेज़ है, नागरिकता का नहीं. बैकुंठ में प्रवेश की अनुमति आर्यावर्त के नागरिक शांतिलाल जैन वल्द मोतीलाल जैन, उम्र 66 वर्ष, हाल मुकाम उज्जैन के नाम की है. आपकी पहचान तो साबित हो रही है नागरिकता साबित नहीं होती. उसके बिना आप अंदर नहीं जा सकते.
‘हे देव, मैं आया नहीं हूँ, आपके प्रतिनिधि ही मुझे लाए हैं. क्या वे सिर्फ पहचान का प्रमाणपत्र देखकर लाते हैं?’
उन्होंने कहा – “नागरिकता साबित करने की जिम्मेदारी आपकी स्वयं की है.”
“हे देव, मेरे पास मतदाता पहचान पत्र भी है.”
वे बोले – “मतदाता पहचान पत्र सिर्फ मतदान करने का अनुमति पत्र है, नागरिकता का दस्तावेज़ नहीं है. आपने 2003 में वोट दिया था? यदि हाँ, तो विधान सभा क्रमांक, बूथ क्रमांक, वोटर सीरियल नंबर बताईए.”
“वो तो याद नहीं है.”
“तब तो कुछ नहीं हो सकता. “
“हे देव, मैंने अपना जन्म प्रमाणपत्र संभालकर रखा है. कुछ देर के लिए भैंसा दिलवा दें तो जाकर ले आता हूँ.”
“अकेले आपके जन्म प्रमाणपत्र से नहीं होगा. आपके माता-पिता का, उनके माता-पिता का, उनके भी माता-पिता का बर्थ सर्टिफिकेट लगेगा.”
“वो तो नहीं है हमारे पास.”
“तब तो आप आर्यावर्त के नागरिक नहीं हैं. जल्दी वापस निकल जाईए.”
“हे देव, मैं उस दुखियारी दुनिया में वापस जाना नहीं चाहता जहाँ मुझे बार-बार अपनी नागरिकता साबित करनी पड़े.”
देखिए बैकुंठधाम केवल आर्यावर्त के नागरिकों के लिए आरक्षित है. विवश होकर हमें आपको डिटेंशन सेंटर में रखना पड़ेगा जो पहले ही भरा पड़ा है, पाँव रखने की भी जगह नहीं है. आप तुरंत लौट जाएँ – यही बेहतर होगा आपके लिए.
मरता क्या न करता! बल्कि मरा हुआ क्या ही करता!! परिजनों को भनक लगे उससे पहले वापस आकर शरीर में दाख़िल हो गया हूँ और अब आपसे मुख़ातिब हूँ. नागरिकता किस डॉक्यूमेंट से साबित होती – यदि आपको पता तो मुझे अवश्य बताएँ – आभारी रहूँगा आपका.
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(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)
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