श्री यशोवर्धन पाठक
☆ संस्मरण ☆
☆ प्रथम पुण्य तिथि पर सादर स्मरण “स्मृतिशेष श्रीमती भारती श्रीवास्तव…” ☆ श्री यशोवर्धन पाठक ☆
नारी तुम केवल श्रद्धा हो,
विश्वास रजत नग पग तल में।
पीयूष स्त्रोत सी सहित बहा करो,
जीवन के सुन्दर समतल में।।
सुप्रसिद्ध कवि स्व. श्री जयशंकर प्रसाद की उपरोक्त काव्य पंक्तियों की सार्थकता सिद्ध करने वाली एक आदर्श शिक्षिका श्रीमती भारती श्रीवास्तव की 13 अगस्त को प्रथम पुण्य तिथि है। अपनी कर्म निष्ठा से एक कर्तव्य परायण शिक्षिका के रुप में राष्ट्र निर्माता के दायित्वों का का निर्वाह करने वाली मातृ शक्ति श्रीमती भारती श्रीवास्तव इसी दिन हम सभी को छोड़ कर अनंत में विलीन हो गयीं।
समाज में ऐसी महिलाओं का व्यक्तित्व अत्यंत प्रेरकऔर प्रणम्य होता है जो कि परिवार, समाज और अपने कार्यालयीन क्षेत्रों में समान रूप से अपने दायित्वों का सफलता पूर्वक निर्वाह करते हुए सभी के बीच लोकप्रियता अर्जित करती हैं। श्रीमती भारती श्रीवास्तव जी भी एक ऐसी ही स्नेहमयी महिला थीं जिन्होंने यशस्वी, मनस्वी और तपस्वी नारी के रूप में पारिवारिक और सामाजिक संबंधों को तो सक्रियता पूर्वक निभाया ही लेकिन इसके साथ ही शैक्षणिक क्षेत्र में भी अपने शिष्यों के साथ गुरु के अतिरिक्त संरक्षक और अभिभावक की भूमिका भी बड़ी तन्मयता से अदा की। भारती जी मेरे घर के पास ही रहने वाले मेरे स्कूली साथी, बचपन के मेरे आत्मीय मित्र श्री नवीन श्रीवास्तव जी की जीवन संगिनी थी जिन्हें मै भाभी जी के रूप में संबोधित और सम्मानित करता था लेकिन आत्मीय रुप से मैं उन्हें अपनी बहन के रुप में भी देखा करता। दरअसल बात यह थी कि मुझे मेरी मां ने बताया था कि सबसे शुरू में मेरी एक बहन हुई थी जिसका नाम 15 अगस्त को जन्म होने के कारण भारती रखा गया था और बाद में बचपन में ही उसका देहांत भी हो गया था। बस इन्हीं भावनाओं के तहत मैं भारती भाभी को मन ही मन बहन भी मानता था।
भारती श्रीवास्तव जी गौर नदी के पास केन्द्रीय विद्यालय से सेवा निवृत्त हुईं थीं। वे अपने शिक्षकीय कार्यकाल में जिस भी स्कूल में रहीं, अपने छात्रों के बीच लोकप्रिय और प्रतिष्ठित शिक्षिका के रुप में चर्चित रहीं। उनके छात्रों के साथ उनके संबंध स्थायी और स्मरणीय रहते थे। उनके छात्र शालेय जीवन के बाद भी उनसे अक्सर बात करते और अपनी उस पूज्यनीय शिक्षिका का मार्गदर्शन लेते जिनसे उन्हें पारिवारिक आत्मीयता प्राप्त हुई थी। शाला का स्टाफ भी उनकी योग्यता और बौद्धिकता से काफी प्रभावित रहता। शैक्षणिक क्षेत्र में भारती जी एक ऐसी विदुषी शिक्षिका के रुप में विख्यात थीं जिन्हें अनेक भाषाओं का ज्ञान था। जो भी व्यक्ति जिस भाषा में उनसे बातचीत करता, भारती जी उसी भाषा में उससे बातचीत करने लगती।
भारती जी का मायका उड़ीसा राज्य में पुरी के आंचलिक क्षेत्र में था। हमारे देश में जगन्नाथ पुरी आध्यात्मिक रूप में काफी महत्व रखता है। भारती जी पुरी से जो पावन और धार्मिक संस्कार लेकर नवीन भाई के साथ मंगल परिणय के सूत्र में आबद्ध हुईं,उन संस्कारों के साथ उन्होंने न केवल अपने पति का जीवन के प्रत्येक सुख – दुख में साथ दिया बल्कि अपने दोनों बच्चों को भी उच्च शिक्षा के साथ ऐसे संस्कार दिए जिनके कारण उन्होंने समाज में एक गरिमामयी पहचान बनाई।। एक सबके लिए और सब एक के लिए की सहकारी भावना के साथ भारती जी पारिवारिक और सामाजिक क्षेत्र में अपनी जिम्मेदारियों को बखूबी निभा रही थीं। उन्होंने सभी के बीच अपने प्रभावी व्यक्तित्व से एक विशिष्ट पहचान बनाई थी। कहने का मतलब यह कि सब कुछ अच्छा चल रहा था लेकिन विधाता को तो कुछ और मंजूर था। भारती जी को कठिन बीमारी केंसर ने जकड़ लिया। इलाज चला और फिर उम्मीद भी जगी। भारती जी के स्वास्थ्य में सुधार होने लगा लेकिन फिर उनकी तबियत खराब होने लगी। डाक्टर बिटिया निमिषा, दामाद डाक्टर अनुज निगम की सारी कोशिशें बेकार हो गयीं और भारती जी बिटिया, दामाद, बेटे नयन, जीवन साथी नवीन, और जेठ जिठानी सभी को अपने सपने सौंप कर चिर निद्रा में लीन हो गयीं।
भारती जी ने अपनी विद्वत्ता और बौद्धिक समझ के साथ परिवार में, समाज में और स्कूल में जो अपनापन बांटा वह सभी के मानस पटल पर यादों की धरोहर के रूप में सदा अमिट रहेगा —
यादों में जब खो जाता है मन
दुनिया की सुधि बिसराता है मन
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© श्री यशोवर्धन पाठक
पूर्व प्राचार्य, राज्य सहकारी प्रशिक्षण संस्थान, जबलपुर
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈







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