श्री संजय भारद्वाज 

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी । ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)
☆ संजय उवाच # 112 ☆ आत्मदीपो भव ☆

भारतीय दर्शन कहता है, ‘आत्मदीपो भव!’ क्या है अर्थ आत्मदीप होने का? आत्मदीप होना अर्थात अपनी आत्मा की ओर देखना। स्वयंप्रभा आत्मा के आलोक में अपनी यात्रा करना। अपना दीपक आप बनना।

एक सूरदास साधक अपने मित्र से मिलने गया। मित्रों की बातचीत में समय का ध्यान ही नहीं रहा। सूर्यास्त हो चला। मित्र ने कहा, “अंधेरे में घर लौटने में तुम्हें कठिनाई होगी। आज मेरे निवास पर ही रुको।” सूरदास ने कहा, “तुम मुझे एक दीप प्रज्वलित करके दे दो। मैं उसकी सहायता से सरलता से घर पहुँच जाऊँगा‌।” मित्र ने आश्चर्य से पूछा, “दीप का भला तुम्हें क्या लाभ?” सूरदास ने कहा, “दीपक से मुझे तो नहीं दिखाई देगा पर राह में चल रहा दूसरा पथिक मुझे देख पायेगा और इस तरह किसी प्रकार की दुर्घटना से मैं बचा रहूँगा।” मित्र ने मित्र की बात का सम्मान करते हुए दीप प्रज्वलित करके दे दिया। सूरदास अपनी राह पर बढ़ चला। थोड़ा समय निर्विघ्न बीता। फिर एकाएक एक व्यक्ति आकर सूरदास से ज़ोर से टकरा गया। वह क्षमायाचना करने लगा पर सूरदास आक्रोश से भर उठा। कहा, “मुझे तो विधाता ने देखने के लिए आँखें नहीं दीं पर तुम तो आँखें होते हुए भी दीपक का प्रकाश नहीं देख सके।” पथिक ने आश्चर्य से कहा,” कैसा प्रकाश? क्षमा करें दीपक तो आपके हाथ में है पर यह प्रज्ज्वलित नहीं है। संभवत: वायु से बहुत पहले ही बुझ चुका। यदि यह प्रज्ज्वलित होता तो मुझसे यह भूल नहीं होती।” सूरदास के नेत्रों से खारा जल बह निकला। कहा,”भूल तो मुझसे हुई है। आज मैंने पाठ पढ़ा कि उधार के प्रकाश से कोई भी अपनी यात्रा पूरी नहीं कर सकता। दीपक तो व्यक्ति को अपने भीतर ही जलाना होता है, आत्मदीप होना पड़ता है।”

मार्गदर्शक ईमानदार हो, गुरु सच्चा हो तो बाहर से अंदरूनी प्रकाश की ओर जाने का संकेत तो मिल सकता है पर अंततः हरेक को अपनी यात्रा स्वयं ही करनी होती है।

कम कहे को अधिक मानना, अधिक जानना। उस संक्षिप्त पर विराट दर्शन का पुनरुच्चार और क्रियान्वयन करना जिसका कण- कहता है, ‘आत्मदीपो भव!’

© संजय भारद्वाज

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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