श्री सूबेदार पाण्डेय “आत्मानंद”

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आत्मानंद साहित्य# 116 ☆

☆ ‌कल आज और कल – सब्जी मंडी का बाजार वाद ☆ श्री सूबेदार पाण्डेय “आत्मानंद” ☆

अभी अभी लगभग पांच से छः दशक बीते कल की ही तो बात है, जब हमें पूरे साल शुद्ध रूप से घर पर प्राकृतिक रूप से उगाई गई सब्जियां नानी, दादी, माँ की गृह वाटिका से खाने के लिए उपलब्ध हो जाया करती थी। जिसमें किसी भी प्रकार का कोई रासायनिक खाद या  तत्व नहीं मिलाया जाता था, हर घर के पिछवाड़े में गृहवाटिका होती थी।

जब मौसम की पहली बरसात में पानी बरसता था तो दादी, नानी तथा मां घर पर रखे।  की, कुम्हड़ा, नेनुआ, तोरइ आदि के बीज निकाल कर खुद तो बोती ही थी औरों को भी बीज बांट कर लोगों को सब्जी तथा फल फूल उगाने के लिए प्रेरित करती थी, खुद भी घर की तरकारी खाती थी और अधिक पैदावार होने पर अगल बगल बांटती थी। तब न तो मंडियां होती थी न तो बाजार वाद और उपभोक्ता वाद ही अस्तित्व में आया था। हमारे आहार-विहार, आचार-विचार का सीधा संबंध मौसम से जुड़ा हुआ करता था। हमारी आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु मौसमी सब्जियां तथा फल प्रकृति ने उपलब्ध कराये, जैसे गर्मी में हरी सब्जियां जल युक्त फल  तथा जाड़े में गरम मसाले दार सब्जियां, तथा बरसात में लता वर्गीय सब्जी, फल उपलब्ध थे। हम फलों का सेवन प्राकृतिक रूप से डाल से पके अथवा बिना रसायनों के पकाएं फलों का सेवन करते थे।

हमारे पुरोधा संत महात्मा प्रकृति की गोद में पलते थे तथा उनकी जीवन पद्धति दैनिक दिनचर्या पूर्ण रूप से प्रकृति आधारित थी उनका जीवन कंदमूल फल तथा प्राकृतिक रूप से उगे जड़ी बूटियों तथा फलों द्वारा संरक्षित तथा सुरक्षित था। बीमारी की स्थिति में जड़ी बूटियों के इलाज तथा दादी अम्मा के नुस्खे आजमा कर हम ठीक हो जाते थे। पौराणिक अध्ययन चिंतन तथा मान्यताओं के अनुसार यह सर्व विदित तथ्य है। महर्षि चरक से सुश्रुत  और च्यवन तक जो भी आयुर्वेदिक चिकित्सा शास्त्र लिखे गये उनके मूल में प्राकृतिक चिकित्सा ही समाहित थी। आज भी हमारे जीवन में आयुर्वेद की चिकित्सा पद्धति का महत्त्व पूर्व वत बना हुआ है आज जब दुनिया हमारी संस्कृति तथा सांस्कृतिक पद्धतियों की दीवानी है तब हम अपने सांस्कृतिक विरासत को संभालने की बजाय उसे गंवाते जा रहे हैं।

अब हम विज्ञापन तथा प्रचार के मोहपाश में ऐसे फंसे हैं कि अपनी मिट्टी जिसमें हम लोट पोट कर पले बढ़े। अब उसे भी हानिकारक बता कर अपने नव जातकों को उनके शरीर की कोमल त्वचा पर रासायनिक लेप कर रहे हैं। आज आर्थिक उदारीकरण वैश्वीकरण बाजार वाद  हमारे गृह उद्योगों तथा कला संस्कृति को चौपट कर हमें हर पल आधुनिक होने के लिए उकसा रहा है। पहले हम अपना हाथ राख और मिट्टी से साफ करते थे और अब लाइफब्वाय डेटाल के चक्कर में अपनी ही मिट्टी की उपेक्षा कर रहे हैं। तथा हम अपने ही बाल बच्चों के आत्महंता बन आधुनिक होने का जश्न मना रहे हैं। यह आने वाले समय के लिए सुखद संकेत नहीं है।

आज बेतहाशा आबादी में वृद्धि ने खपत के सापेक्ष उत्पादन के लिए लोभ लाभ के चक्कर में अन्नदाता को बाजार की तरफ रूख करने के लिए बाध्य किया है। आज हमने भोजन से लेकर दवाइयों के लिए भी पाश्चात्य पूंजी वादी शक्तियों के अधीन खुद को कर दिया है। जिसका खामियाजा पूरे समाज को भुगतना पड़ेगा। हमारी सांस्कृतिक विरासत  हमारा  सनातन हिंदू धर्म दर्शन सोडष संस्कारों तथा आदर्श कर्मकांड आधारित था लेकिन हम आधुनिक बनने तथा दिखने के चक्कर में उसे तिलांजलि दे बैठे हैं।

यद्यपि हम अपना बहुमूल्य संस्कार आधारित जीवन छोड़ कर आधुनिकता के मोहपाश में बंध चुके हैं और एक अंधी सुरंग में चलते चले जा रहे हैं, जहां न तो संकल्प है न कोई विकल्प, उस मोह पंजाल से बाहर आने का। हम जितना ही इस चक्रव्यूह से बाहर निकलने का प्रयास कर रहे हैं उतना ही उलझते जा रहे हैं।

और अब तो आपने  भोजन के नाम पर समुंद्री शैवाल से लेकर फफूंद जनित मशरूम तक को भी पौष्टिक तत्व से युक्त बता लोगों को खिलाने पर आमादा है। भविष्य में हो सकता है हमें अपना पेट भरने के लिए अप्राकृतिक संसाधनों तथा कृत्रिम आहार विहार रसायन युक्त पदार्थों पर निर्भर होना पड़े।

( इस आलेख में उल्लेखित विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं।)

© सूबेदार  पांडेय “आत्मानंद”

संपर्क – ग्राम जमसार, सिंधोरा बाज़ार, वाराणसी – 221208, मोबा—6387407266

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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