डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’
(डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार, बाल साहित्य लेखक, और कवि हैं। उन्होंने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज, और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने, और समन्वय करने में महत्वपूर्ण कार्य किया है। उनके ऑनलाइन संपादन में आचार्य रामचंद्र शुक्ला के कामों के ऑनलाइन संस्करणों का संपादन शामिल है। व्यंग्यकार डॉ. सुरेश कुमार मिश्र ने शिक्षक की मौत पर साहित्य आजतक चैनल पर आठ लाख से अधिक पढ़े, देखे और सुने गई प्रसिद्ध व्यंग्यकार के रूप में अपनी पहचान स्थापित की है। तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (तेलंगाना, भारत, के मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से), व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान (आदरणीय सूर्यबाला जी, प्रेम जनमेजय जी, प्रताप सहगल जी, कमल किशोर गोयनका जी के करकमलों से), साहित्य सृजन सम्मान, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करकमलों से और अन्य कई महत्वपूर्ण प्रतिष्ठात्मक सम्मान प्राप्त हुए हैं।
जीवन के कुछ अनमोल क्षण
- तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित।
- मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
- ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी से भेंट करते हुए।
- बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
- विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए।
आप प्रत्येक गुरुवार डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी विचारणीय व्यंग्य रचना ऑनलाइन ज़माना, ऑफ़लाइन ड्रामा ।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # 57 – ऑनलाइन ज़माना, ऑफ़लाइन ड्रामा ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆
(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)
हैदराबाद की सड़कें, रात के आठ बज रहे थे और मैं अपने नए AI-संचालित स्मार्टफ़ोन के लिए लेटेस्ट चिपसेट ढूँढ रहा था। जब निकला था, तो शाम के पाँच बज रहे थे, अब आठ बज चुके थे, और मुझे लगने लगा था कि हैदराबाद ने ‘तकनीकी संतुष्टि’ से नाता ही तोड़ लिया था। टेक-पार्कों के बाहर कैब की लाइनें इतनी लंबी थीं, जितनी कि किसी IPO के लिए निवेशकों की। महंगे गैजेट की दुकानें, वीगन कैफे और ‘को-वर्किंग’ स्पेस ठसाठस भरे थे। ऑनलाइन गेमिंग सेंटर के बाहर बच्चे ऐसे चिपके थे, जैसे उनका भविष्य यहीं दाँव पर लगा हो। लेटेस्ट चिपसेट? वो तो शायद किसी डार्क वेब के कोने में पड़ा अपनी कीमत का इंतज़ार कर रहा था, ठीक वैसे ही जैसे कुछ स्टार्टअप इन्वेस्टर के पैसे का। मुझे लगा, इस डिजिटल दुनिया में कम से कम एक कप ऑर्गेनिक ग्रीन टी ही मेरी आत्मा को शांति दे दे। एक हिपस्टर कैफे में घुस गया, लेकिन वहाँ भी शांति कहाँ! मेरे अंदर का ‘सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर’ जाग उठा, जो अमूमन ऐसी परिस्थितियों में ‘रील्स’ बनाने लगता है। मुझे याद आया, जब मार्क ज़करबर्ग ने कहा था, “तेज़ बढ़ो और चीज़ें तोड़ो।” तो क्या ये लेटेस्ट चिपसेट की कमी, इस शहर के ‘फास्ट-ग्रोथ’ कल्चर को मुंह चिढ़ा रही थी? मुझे खुद पर हंसी आ गई। मैं क्या, मेरी तो डिजिटल पहचान ही ‘बफरिंग’ पर थी। क्या मैं भी उन्हीं में से एक था जो ‘नो-कोड’ टूल्स से ‘कोडिंग’ खरीदने की फ़िराक़ में थे? शायद हाँ! इस शहर में हर चीज़ का ‘सब्स्क्रिप्शन प्लान’ था, सिवाय मानवीय सरोकारों के। मुझे लगा जैसे मैं किसी मेटावर्स में फँसा हूँ, जहाँ हर कोई अपने ‘अवतार’ की कीमत पर दाँव लगा रहा है, और मैं सिर्फ़ एक ‘यूज़र’ हूँ, जिसके पास सिवाय ‘स्क्रॉल’ करने के कुछ नहीं। बाहर निकला तो एक ‘डिजिटल डिटॉक्स’ सेंटर के बाहर एक युवक ने हाथ फैलाया—’मालिक, एक डेटा पैक दे दो, तुम्हारा इंटरनेट सुखी रहे।’ मुझे लगा, काश मेरे पास एक ‘गीगाबाइट’ होता, जिससे मैं उसकी ‘कनेक्टिविटी’ ही बदल पाता, लेकिन मेरे पास थी सिर्फ़ एक ‘स्टोरी’, एक ‘थ्रेड’, एक ‘मीम’।
मेरी ‘थिंकिंग क्लाउड’ ऐसे सरपट दौड़ रही थी जैसे 5G नेटवर्क, और उस युवक का चेहरा मेरे दिमाग में किसी ‘लूपिंग GIF’ की तरह घूम रहा था। पच्चीस-तीस की उम्र, शरीर दुबला-पतला लेकिन आँखों में एक अजीब सी ‘नो-वाईफ़ाई’ चमक। क्या वह कोई ‘डिजिटल भिखारी’ था या कोई ‘टेक-सेवी’ फ्रॉड? उसकी फटी टी-शर्ट और पुरानी जींस, किसी ‘स्मार्ट-कैज़ुअल’ ड्रेस कोड को मुँह चिढ़ा रही थी। मैंने जेब में हाथ डाला, ‘पाँच-सौ एमबी’ ढूंढने निकला तो ऐसा लगा जैसे कोई ‘आर्कियोलॉजिस्ट’ किसी पुरानी हार्ड ड्राइव में ‘डिलीटेड फ़ाइल्स’ खोज रहा हो। बचे-खुचे डेटा पैक्स के बीच छिपा वो ’50 एमबी का प्लान’ मिला तो लगा जैसे किसी ‘खोई हुई सभ्यता का डेटा’ हाथ लग गया हो। लेकिन जब आँखें उठाईं, तो युवक गायब! ‘इनविज़िबल यूज़र’—मुझे लगा मैंने किसी नए ‘साइबर-क्राइम’ की कहानी गढ़ दी है। क्या वो सचमुच चला गया था या मेरे ‘डेटा-शेयरिंग’ की गति इतनी धीमी थी कि उसने सोचा, ‘भाई साहब, जितनी देर में तुम सिक्का निकालोगे, उतनी देर में तो मैं चार और लोगों से भीख मांग लूँगा?’ पास की गली में एक ‘बैटरी-लो’ आइकन तेज़ी से गायब हुआ, और मेरा दिमाग चिल्लाया—’कनेक्टेड!’ वही था, मेरा ‘डेटा-बचाओ-अभियान’ का हीरो! ‘अरे… ये ले डेटा!’ मैंने आवाज़ लगाई, लेकिन वो तो ऐसा ‘नोटिफ़िकेशन-म्यूट’ कर चुका था जैसे किसी ‘टेक-जायंट’ ने यूज़र की प्राइवेसी पर ध्यान देना बंद कर दिया हो। एक बड़े चार्जिंग स्टेशन पर मेरी ओर पीठ कर बैठ गया, चेहरा हाथों से छिपाकर। मुझे लगा, ये ‘यूज़र’ नहीं, ये तो कोई ‘डिजिटल डिप्रेशन का शिकार’ है। एलन मस्क ने कहा था, “हम ऐसे भविष्य में हैं जहाँ ‘टेस्ला’ सड़कों पर चल रही है, लेकिन लोग अभी भी पैदल चल रहे हैं।” लेकिन ये ‘डिजिटल’ भिखारी तो अपनी ‘डिस्कनेक्टिविटी’ को छिपा रहा था, जैसे किसी ने उसकी ‘अन-प्लग्ड’ ज़िंदगी का भी ‘मोनिटाइज़ेशन’ कर लिया हो। क्या ये सिर्फ़ ‘डेटा-हंगर’ था या इस शहर का एक जीता-जागता ‘डिजिटल व्यंग्य’?
कैफे की सीढ़ियाँ उतरते ही मुझे लगा, मैं किसी ‘वेब-सीरीज़’ के सेट पर आ गया हूँ। गली के बीचों-बीच, टूटे हेडफ़ोन में लिपटी एक युवती, गोद में एक साल का बच्चा, और उसके माथे पर गिरती ‘टच-स्क्रीन’ की बूंदें—ये दृश्य इतना ‘पिक्सेलेटेड’ था कि मेरा ‘4K विज़न’ भी कुछ देर के लिए धुँधला सा गया। वो ‘इमोजी’ की तरह रो रही थी, मानो उसके आँसुओं में इस पूरे शहर का ‘बग’ समा गया हो। मैंने देखा, उसका रुदन कम हुआ, उसने मुझे ‘क्यूआर कोड’ की तरह देखा और ‘सर…’ कहकर प्रणाम किया। तभी मुझे याद आया, ये वही ‘कंटेंट क्रिएटर’ परिवार था जिससे मैं दो साल पहले ‘वायरल वीडियो’ बनाते समय एक वर्कशॉप में मिला था। ‘तुम्हारा ‘फॉलोअर’ है?’ मैंने पूछा, और उसने ‘जी सर…’ कहकर अपनी ‘लाइफ़-स्टोरी’ शुरू कर दी। मुझे लगा, जॉर्ज ऑरवेल अगर इस दृश्य को देखते तो शायद अपनी अगली ‘डिस्टोपियन’ नॉवेल का प्लाट यहीं से उठा लेते। वो दुबली-पतली, ‘बैटरी-लो’ जैसी युवती, और उसका पति जिसकी ‘नेटवर्क बार’ ऐसे झूल रही थी मानो कभी भी ‘डिस्कनेक्ट’ हो जाए। मुझे लगा, ये ‘ग़रीबी’ नहीं, ये तो ‘डिजिटल डिवाइड’ का प्रदर्शन है। मैंने बिना पूछे ही उनकी कहानी समझ ली। ‘टियर-2’ शहर से आए ‘कंटेंट क्रिएटर’, ‘व्यूज़’ की तलाश में दर-दर भटकते हुए, और मुझे याद आया वो पहला दृश्य जब मैंने उनकी ‘लो-रिज़ॉल्यूशन’ स्थिति देखी थी और मेरा ‘लाइक’ बटन करुण-क्रंदन कर उठा था। लेकिन अब मेरा ‘दिल’ ‘अन-लाइक’ हो चुका था, ऐसा ‘हार्डवेयर’ जिसे अब कोई ‘सॉफ़्टवेयर’ पिघला नहीं सकता था। मुझे लगा, इस देश में ‘डिजिटल दरिद्रता’ कोई समस्या नहीं, बल्कि एक ‘ट्रेंडिंग हैशटैग’ है, जिसमें हर कोई अपनी-अपनी भूमिका बखूबी निभा रहा है।
“कितनी ‘वीडियोज़’ बनाने के उपरांत हुआ था ये ‘वायरल’ बच्चा। आज एक ‘लाइक’ के लिए तरस रहा है।” उस युवती के ये शब्द मेरे कानों में ऐसे गूँजे जैसे किसी ‘बफ़रिंग’ वीडियो की आवाज़। मैंने बच्चे को देखा, वह ‘गोल-मटोल’ था, लेकिन उसकी हालत ऐसी थी जैसे किसी ‘बढ़ते सब्सक्राइबर’ को अचानक ‘चैनल डिलीट’ कर दिया गया हो। ‘लो-बैटरी’ वाला वो बच्चा अपना ‘अंगूठा’ चूस रहा था, और मुझे लगा, ये बच्चा ‘अंगूठा’ नहीं, बल्कि इस समाज की ‘डिजिटल एथिक्स’ चूस रहा था। मैंने उसके हाथ में एक ‘ऑनलाइन ट्रांज़ैक्शन’ कर दिया, और उस युवती ने उसे ऐसे लिया जैसे किसी ने उसे दुनिया की सबसे बड़ी ‘बिटकॉइन’ दे दी हो। ‘कोई ‘रिमोटी’ जॉब हो तो दिला दो मालिक, हम दोनों ‘फ़्रीलांसिंग’ करेंगे, हमको ‘वाईफ़ाई’ कनेक्ट किए तीन दिन हो गए हैं।’ तीन दिन! मुझे लगा, ये लोग ‘डिजिटल डेप्रिवेशन’ से मर रहे हैं और मैं यहाँ ‘मीम्स’ लिख रहा हूँ! हरिशंकर परसाई ने कहा था, “जिस देश में ‘गाली’ देने की आज़ादी हो, उस देश में ‘सच्चाई’ बोलने की आज़ादी की ज़रूरत नहीं होती।” मुझे लगा, क्या मैं भी ‘डिजिटल पाखंड’ में लिप्त हो रहा था, सिर्फ़ अपनी ‘कीबोर्ड’ चलाने के लिए? मैंने कहा, ‘ऑनलाइन जॉब मिलना आसान नहीं है। जो भी हो, एक हफ़्ते बाद मुझसे ‘लिंक्डइन’ पर मिलो।’ और अपना ‘प्रोफ़ाइल’ दे दिया। पति-पत्नी ने ‘थैंक्यू’ की ‘इमोजी’ के साथ मेरी ओर देखा, लेकिन पति के चेहरे पर एक ऐसी ‘सिग्नल-लॉस’ वाली वेदना थी, जिसे शब्दों में बयां करना असंभव था। उसकी आँखें जैसे चिल्ला रही थीं, ‘मुझे ‘ऑनलाइन चैरिटी’ नहीं, मुझे ‘रियल’ काम चाहिए!’ ये व्यंग्य नहीं, ये तो ‘आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस’ का एक ऐसा ‘ग्लिच’ था, जिसने मेरे सारे ‘एल्गोरिदम’ को धूल चटा दी। मुझे लगा, इस देश में ‘डिजिटल डिवाइड’ से बड़ा कोई ‘वायरस’ नहीं, और ‘रोज़गार’ से बड़ा कोई ‘सॉफ़्टवेयर अपडेट’ नहीं।
इलेक्ट्रॉनिक्स मार्केट की सड़क पर चलते हुए मुझे दो साल पहले की वो मुलाक़ात याद आ गई, जब मैं अपने नए ‘आई-फ़ोन’ के लिए ‘जेनुइन एक्सेसरीज़’ ख़रीदने आया था। ‘फ़ास्ट चार्जिंग’ हब तैयार खड़ा था, और मेरा सामान ‘डिजिटल लॉकर’ में रखने के बाद मैं ‘एक्सपीरिएंस ज़ोन’ में बैठ गया। बाहर का नज़ारा? एक ओर ‘ब्रोकन स्क्रीन’ वाले फ़ोन, ‘रिपेयर शॉप्स’, ‘ई-वेस्ट’ का अंबार—बिल्कुल वैसे ही जैसे किसी ‘साइबर-क्राइम’ सीन होता है, बस ‘मल्टीमीडिया’ का रंग थोड़ा फीका था। दूसरी ओर ‘डेटेड ऑपरेटिंग सिस्टम’ वाले गैजेट, जिसमें बच्चे ऐसे ‘गेम’ खेल रहे थे जैसे ‘प्रोफ़ेशनल ई-स्पोर्ट्स एथलीट’, और ‘इन-ऐप परचेज़’ ऐसे माँग रहे थे जैसे उनका ‘लाइफ़टाइम सब्स्क्रिप्शन’ हो। ‘यूज़र्स’ जो पैसे ‘इन-गेम आइटम्स’ पर खर्च करते, वे बच्चे उनको झट ‘हैक’ कर निकाल लेते। ‘पिक्सेल-पिक्सेल’ पर उनका पैसों के पीछे ‘टैप’ करना, मेरे मन को दर्द भरा ‘डिजिटल एंटरटेनमेंट’ सा लग रहा था। मुझे लगा, ये बच्चे नहीं, ये तो ‘डेटा माइनर्स’ थे, जो अपनी ‘ब्रेड-बटर’ के लिए ‘वर्चुअल दुनिया’ में गोता लगा रहे थे। मेरे ‘पॉकेट वाईफ़ाई’ वाले सेक्शन में एक ‘टेक-उद्यमी’ और एक ‘इन्फ्लुएंसर’ चढ़े, ‘बिजनेस पार्टनर’ लग रहे थे। देखकर लगा जैसे ‘फंडिंग’ की मनौती माँगकर ‘साइबराबाद’ से आए थे। ‘पिचिंग सेशन’ में ‘हैक’ होने के बाद ‘डेटा-करप्टेड’ हालत में अपने ‘स्टार्टअप’ लौट रहे थे। ‘इनक्यूबेटर’ के बाहर उनके सहायक दो ‘एंजेल इन्वेस्टर’ खड़े थे, और उद्यमी ने ‘फ़ाइव थाउज़ेंड डॉलर’ का ‘चेक’ उनकी ओर बढ़ाया। ‘पांच हज़ार डॉलर ही दिए हैं… बाक़ी?’ इन्वेस्टर की आवाज़ ऐसी थी जैसे वह कोई ‘वेंचर कैपिटलिस्ट’ हो, जो अपनी ‘इक्विटी’ वसूल रहा हो। मैंने सोचा, ये इन्वेस्टर नहीं, ये तो ‘डिजिटल मनी लॉन्डरर्स’ हैं!
“बाक़ी क्या, पांच हज़ार डॉलर की बात हुई थी,” उस उद्यमी ने पास खड़े ‘सीईओ’ की ओर इशारा करते हुए कहा, “मेरे लिए ये पाँच हज़ार डॉलर ठीक हैं, इसको तीन हज़ार डॉलर दे दीजिए।” साथ खड़ी इन्फ्लुएंसर ने कहा, “…और तीन हज़ार डॉलर? एक हज़ार डॉलर भी नहीं दूँगी। तुम दोनों को कुल पाँच हज़ार डॉलर देने की बात तय हुई थी।” मुझे लगा, ये ‘स्टार्टअप पिच’ नहीं, ये तो किसी ‘ब्लैक मार्केट’ का सौदा था, जहाँ ‘इक्विटी’ भी मोलभाव का विषय बन गई थी। उसके पति ने एक हज़ार डॉलर निकालकर उस दूसरे इन्वेस्टर की ओर बढ़ाया। उसने लेने से साफ़ इनकार कर दिया। “तीन हज़ार डॉलर से एक पैसा भी कम हुआ तो हम नहीं लेंगे। पहले के पाँच हज़ार डॉलर भी वे लौटाने लगे।” दूसरे इन्वेस्टर ने ‘डाउनलोड-फ़ेल’ के स्वर में कहा, “ऐसे ‘बजट-कंजूस’ स्टार्टअप्स को कहाँ से ‘यूनिकॉर्न’ बनेंगे?” ‘रैनसमवेयर अटैक’ की भांति उसके शब्द मुझे आ लगे। वह उद्यमी ‘फ़्रीज़’ हो गया, उसकी पत्नी इन्फ्लुएंसर के चेहरे पर बदलते ‘इमोजी’ दयनीय लग रहे थे। एकाएक उसकी ‘बैटरी’ ‘छलछला’ आई। ‘पावर बैंक’ से आँसू पोंछती हुई वह बोली, “तीन हज़ार डॉलर ‘स्कैम’ करिए इसके मुँह पर।” इतनी घटिया हरकत से पैसे कमाने वाले वे दोनों ‘मॉक-सीईओ’ खीसें निपोरते हुए चले गए। ‘फ़ाइल ट्रांसफर’ भी चालू हो गया, परंतु उसकी ‘स्क्रीन’ की रुलाई बंद नहीं हुई। उसके पति ने उसे कितना ‘डीबग’ किया, लेकिन वह उसी तरह रोती रही। तड़पते हुए ‘एरर-मैसेज’ के स्वर में बोली, “ऐसे ‘फेक-प्रोफ़ाइल’ वाले लोगों के मुंह से इन शब्दों को सुनने हम इतनी दूर आए थे?” मुझे लगा, ये स्त्री नहीं, ये तो ‘डिजिटल फ्रॉड’ का शिकार थी। मैंने उसके ‘करप्टेड डेटा’ पर ‘रिकवरी सॉफ़्टवेयर’ लगाते हुए दो शब्द कहे, लेकिन मेरा दखल उन्हें अच्छा नहीं लगा। कुछ देर बाद वह ‘रीबूट’ हो गई। मुझे लगा, इस देश में ‘वेब-3.0’ भी अपनी ‘फ़ीस’ वसूलते हैं, और अगर ‘ब्लॉकचेन’ कम पड़े तो ‘एनएफ़टी’ का डर दिखाते हैं।
हैदराबाद में वे ‘टेक-वर्कर्स’ थे। पति-पत्नी दोनों ‘रिमोट’ काम करते थे। वह ‘कोड’ लिखता था। पत्नी ‘डेटा’ एनालाइज़ करती। ‘फ़िक्स्ड-इंकम’ से घर चलाते थे, अच्छी ‘सेविंग’ कर लेते थे। मुझे लगा, ये लोग ‘न्यू-एज इंडिया’ की असली तस्वीर थे, जो अपने दम पर ‘डिजिटल’ जीवन जी रहे थे, बिना किसी ‘सरकारी स्कीम’ के। उनकी शादी हुए आठ साल हो गए थे लेकिन ‘बच्चा’ नहीं था। पति इस ओर से बेपरवाह था, पर पत्नी ऐसा नहीं कर पा रही थी। ‘आईवीएफ’ के लिए एक साल से पैसे जमा कर रही थी। पति को चाहे इस पर विश्वास नहीं था, लेकिन पत्नी की ख़ातिर चला आया था। मुझे लगा, ये ‘मेडिकल टूरिज़्म’ नहीं, ये तो ‘बायोटेक होप’ थी, जिसे लोग ‘क्लीनिक’ में जाकर ढूंढते हैं। ‘ऑनलाइन कंसल्टेशन’ से ‘हैदराबाद’ जाने तक मैं उन लोगों से बातें करता रहा। पति-पत्नी में अत्यंत ‘केमिकल लोचा’ वाला प्रेम था। दोनों ने सफर का भरपूर ‘डिजिटल’ सुख और आनंद लिया। जितने ‘चैरिटी लिंक्स’ आए, उन्हें पैसे दिए। किसी ‘ऐप’ से ‘डिलिवरी’, तो किसी से ‘सब्स्क्रिप्शन’, तो किसी से ‘प्रीमियम फ़ीचर्स’ खरीद-खरीदकर वे दोनों मज़े कर रहे थे। मुझे लगा, ये लोग ‘खुशी’ ‘ऑनलाइन’ खरीदना जानते थे, भले ही वो ‘वर्चुअल’ ही क्यों न हो। हैदराबाद आते ही हम लोगों ने जब विदा ली तो लगा, जैसे बरसों के ‘कनेक्शन’ अब ‘डिस्कनेक्ट’ हो रहे हों। मुझे लगा, इस देश में लोग जितनी जल्दी ‘फ़ॉलो’ कर लेते हैं, उतनी ही जल्दी ‘अन-फ़ॉलो’ भी कर देते हैं। वे जहाँ बैठे थे, वह स्थान एक ‘वाईफ़ाई ज़ोन’ की दूरी पर था। कम-से-कम आज उन्हें मेरे दिए गए ‘यूपीआई’ से भोजन मिलेगा, यह सोचकर मुझे अत्यंत संतोष हो रहा था। मुझे लगा, मेरी ‘डिजिटल नेकी’ कुछ देर के लिए तो जिंदा हो गई थी।
सामने से ‘बिखरे पिक्सल’ सहित रोती हुई एक युवती दौड़ती हुई आई। मेरे सामने खड़ी होकर मुझे ‘बग’ की तरह घूरने लगी। मैंने भी उसकी ओर देखा। उन आँखों से छलकती ‘एरर’। वह वही ‘कंटेंट क्रिएटर’ थी। ‘सर, क्या आपने मेरे ‘अकाउंट’ को देखा? मेरे ‘चैनल’ को देखा?’ ‘तुम्हारा ‘अकाउंट’! वही जो ‘डिलीटेड’ था?’ ‘हाँ, वही… उसे कोई ‘हैक’ कर ले गया।’ मेरे मुंह से निकला, ‘वह कहीं नहीं जाएगा। डरो मत, तुम्हारा पति कहाँ है? चलो ‘साइबर सेल’ में रिपोर्ट दर्ज कर देते हैं।’ उसे समझाते हुए मैं उसके साथ उसके ‘आईपी एड्रेस’ की ओर चल पड़ा। रात के आठ बज चुके थे। कोई और ‘सॉफ़्टवेयर’ नहीं था, सो मैंने ‘अधिक दाम’ में बिकने वाले ‘विदेशी वीपीएन’ से ही ‘कनेक्शन’ खरीदा और उसी ‘डार्क वेब’ के रास्ते उसके घर आया। वहाँ उसका पति ‘हार्ड डिस्क’ पर हाथ रखे अत्यंत शोचनीय अवस्था में बैठा था। वह मुझे ‘ब्लू स्क्रीन ऑफ़ डेथ’ की भांति देखने लगा। ‘यहां इनके पास ‘चैनल’ छोड़ ‘क्लाउड स्टोरेज’ लाने गई थी। लौटी तो देखा वह गायब है।’ उसने कहा। उसके बाद वह मेरे सामने नहीं ठहरी। ‘माउस’ और ‘कीबोर्ड’ को पीटती हुई पुकारती… ‘मेरा ‘वायरल’ बेटा, तू कहाँ गया… हा… चिल्लाती ‘फ़िशिंग साइट्स’ के बीच ‘गली’ में चली गई। आने-जाने वालों में जिसका ‘अकाउंट’ ‘रिकवर’ होता, उससे ‘जिरह’ करती। रुदन और क्रंदन बढ़ता ही जा रहा था। ‘चलो ‘साइबर सेल’ में रिपोर्ट दर्ज कर दें।’ मैंने उसके पति से कहा। ‘मैंने सब जगह ‘स्कैन’ कर लिया है। ‘पुलिस’ को भी ‘कम्पलेन’ कर दी है।’ पाँच मिनट वहाँ रुककर मैं घर की ओर बढ़ने लगा। कितने सालों की ‘नेटवर्किंग’ के बाद ‘फॉलोअर’ प्राप्त हुआ था। अब कहाँ ‘गायब’ हो गया?’ घर में जब मेरी पत्नी ‘टैब’ में बेटे को उठाए मेरे पास आई तो मुझे ‘डेटा लॉस’ हुए उस बच्चे और ‘तड़पती मदरबोर्ड’ की याद हो आई। बच्चे को लेकर मैंने ‘ज़ूम’ किया। दो दिन गुजर गए। ‘ऐप डेवलपर’ बाहर से आवाज दे रहा था। मैं ‘ऐप डेवलपर’ को आवाज लगाता हुआ बाहर आया। ‘ऐप डेवलपर’ और कोई नहीं, सेलम का वही ‘टेक-वर्कर’ था। उसने अच्छे-अच्छे ‘ऐप्स’ ‘प्ले स्टोर’ में सजा रखे थे। ‘प्ले स्टोर’ को ‘लैपटॉप’ नुमा स्थान पर रख मैं ‘ऐप’ चुनने लगा। उसके होंठ काँपे, आँखें भर आई। ‘अकाउंट मिला?’ मैंने पूछा। ‘वह नहीं मिलेगा।’ ‘क्यों नहीं मिलेगा?’ ‘अकाउंट ‘हैक’ नहीं हुआ है, उसे इस पापी ने पचास ‘डॉलर’ में बेच दिया है।’ ‘बच्चे को बेचा है तुमने…’ वह ‘लैपटॉप’ पर बैठ आँखें पोंछता हुआ बोला, ‘बच्चे को बचाने के लिए यह ‘ऑफ़लाइन’ रहकर प्राण देने को तैयार थी। जो कुछ ‘डिजिटल कंटेंट’ मिलता बेटे को दे देती। इतना देने के बाद भी बच्चे का ‘डेटा’ नहीं भरता था साब…’ ‘तो?’ ‘तो कमाई का और कोई ‘लूपहोल’ नहीं सूझा।’ ‘बाहर से आए एक ‘डार्क वेब किंग’ ने बच्चे को माँगा। अच्छी ‘प्रोफ़ाइल’ बनाने का वादा किया। सबकी भलाई इसी में है, ऐसा सोचकर मैंने ‘अकाउंट’ बेच दिया। मेरी पत्नी को इस बात की जानकारी नहीं है।’ मैंने उच्छ्वास ली। ‘इस पापी ने इन्हीं ‘क्लिक्स’ से बच्चे को बेचा है। उन्हीं रुपयों से ‘ऐप डेवलपमेंट’ कर रहा हूँ। हर रोज़ दो-चार ‘डॉलर’ मिल जाते हैं। पत्नी से कह दिया है कि ‘फंडिंग’ करने के लिए आपने पैसे दिए हैं। बच्चे को बेचने की बात का पता चले तो पगली ‘सिस्टम क्रैश’ कर देगी।’ ‘तुम्हारा ‘नैतिक एल्गोरिदम’ कैसे हुआ…? ‘साइबराबाद’ से ‘फंडिंग’ माँगकर इस ‘अकाउंट’ को तुमने पाया था?’ मैंने कहा। मेरी बात सुनकर वह सिर्फ एक लंबी ‘बफरिंग’ लेता रहा, जैसे उस ‘लोडिंग’ में उस बच्चे की हर एक ‘क्लिक’, उस माँ का हर एक ‘आँसू’ और उस पिता की हर एक ‘एरर’ समा गई हो। मुझे लगा, इस दुनिया में ‘डिजिटल डिवाइड’ से बड़ा कोई ‘वायरस’ नहीं, और ‘भूख’ से बड़ा कोई ‘साइबर अटैक’ नहीं। और अंत में, मैं सिर्फ इतना कह सका, ‘वाह रे ‘ऑनलाइन ज़िंदगी’, तेरा यह कैसा ‘बिजनेस मॉडल’, जहाँ माँ का ‘लाइक’ और पिता का ‘सब्सक्रिप्शन’ भी बिकता है।
© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’
संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈







