श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # 359 ☆
व्यंग्य – सामिष डाइट चार्ट!
श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
भारतीय जीवन में उपवास और स्वयं पर पाबंदियों का ताना-बाना हमारी जीवन शैली का हिस्सा है। हमने हमारे देवी-देवताओ को बडी श्रद्धा और भक्ति से डाइट-कॉन्शस बना दिया है। अपने आराध्य के नाम पर उनके भक्त वेज, नानवेज या फलाहारी डाइट को लेकर बहुत सजग रहते हैं। मंगलवार को नॉनवेज नहीं, शनिवार को नॉनवेज नहीं, गुरुवार को बस पीले फल, सावन में तो सामिष भोजन बिल्कुल नहीं, और नवरात्रि में तो नानवेज भोजन का नाम भी नहीं! शायद भक्तों कोलगता है कि स्वर्ग में कोई महान डाइटिशियन बैठा है, जो दिन, हफ्ते के हिसाब से, महीने की तिथियों के हिसाब से, त्योहारों के हिसाब से. हमारे मांसाहार पर रोक लगाने का रोस्टर प्लान बनाता है। एकादशी को दिन में सिर्फ एक बार आहार, पूर्णिमा को बस मीठा, या चतुर्थी को केवल रात्रि में पूजन के बाद दूध।
मंगलवार भगवान हनुमान जी की भक्ति का दिन, माना जाता है। भगवान बजरंगबली तोब्रह्मचारी थे। शायद उनके भक्तों को लगता है कि इस दिन मांसाहार से उनकी भक्ति संशय ग्रस्त हो सकती है। सवाल ये कि अगर मंगलवार को चिकन खा लिया, तो हनुमान जी नाराज़ क्यों होंगे?उनका आशीर्वाद ‘कैलोरी-काउंट’ पर निर्भर थोड़ी है?
शनिदेव की पेंचदार नज़र से बचने के लिए शनिवार की साधना निर्धारित है। शनिवार को नॉनवेज निषेध दिवस मनाया जाता है। काले भैंसे पर सवार भक्तों के इष्ट आपका आहार नहीं आचरण देखते हैं यह तथ्य भक्तों की समझ से परे क्यों है। क्या शनिदेव वेजिटेरियनिज़म के ब्रांड एम्बेसडर हैं?शनिवार कोसिर्फ साबूदाना की खिचड़ी खाने मात्र से शनिदेव क्यों प्रसन्न हो सकते हैं, इसका उत्तर केवल आस्था और विश्वास में ही है।
भगवान शिव की घर वापसी का पवित्र समय सावन का महीना होता है। दादी ने सावन में नॉनवेज वर्जित कर रखा है। भोलेनाथ तो खुद नीलकंठ हैं, विष पीने वाले! उनका आभूषण सर्प हैं, वस्त्र व्याघ्रचर्म! क्या वे सचमुच नाराज़ हो सकते हैं, यदि कोई भक्त सावन माह में चिकन बिरयानी का डिनर कर ले? शायद यह प्रतिबंध इसलिए है कि बारिश के मौसम में मांस खाने से भक्तों का पेट खराब हो सकता है, और इस वैज्ञानिक तथ्य को भगवान की भक्ति का भय दिखाकर, मानने के लिए विवश किया गया हो।
नौ रातों का महापर्व, नवरात्रि माँ दुर्गा की आराधना का समय होता है। इस अवधि में सामिष भोजन का पूर्ण बहिष्कार किए जाने की परंपरा है। विचित्र विरोधाभासपश्चिम बंगाल में देखने मिलता है जहां नवरात्रि के अंत में पशु बलि की प्रथा है। नौ दिन कठोर उपवास, दसवें दिन बकरे की बलि, माँ दुर्गा की शाकाहारी थाली में मांस का प्रसाद चढ़ाए जाने पर भी मां मुस्कुराती हैं। और भक्तों को मन मांगे वरदान देती हैं। भक्तों ने अपनी परम्परा के अनुसार सामिष भोजन हेतु देवीमां के ‘मूड स्विंग’ की कल्पना की हुई है।
मांसाहार की इन पाबंदियों के पीछे निश्चित ही पवित्रता, संयम और श्रद्धा का भाव है। कभी-कभीलगता है कि भक्तों की डाइट, स्वर्ग में बैठे देवताओं के हाथों में है। हमारे पेट पर रिमोट कंट्रोल से हमारे इष्ट नज़र रखते हैं।
भगवान सुबहकैलेंडर देखते हैं “अरे वाह! आज तो शनिवार है! किसी मूर्ख ने अंडा खाया कि नहीं? चलो, उसकी कुंडली में थोड़ा ‘काल सर्प’ योग डाल देते हैं, उसे निरामिषभोजन का सबक सिखाने के लिए!”
दरअसल हमारे आहार तथा भोजन परहमारी संस्कृति और आस्था का व्यापक प्रभाव है।
इनका पालन संपूर्ण श्रद्धा से करें। पर हाँ, इन विसंगतियों पर मुस्कुराना भी तो ज़िंदगी का हिस्सा है! हो सकता है, खान पान के ये सब नियम असल में हमें संतुलन, अनुशासन और प्रकृति के साथ तालमेल सिखाने के लिए हमारे ऋषि मुनियों की गहरी सोच है। पेट तभी खुश हो सकताहै जब हम कभी कभार उसे भी’होली’डे’ देने की पेशकश करें!तो अगली बार जब आप मंगलवार को मटन की खुशबू से बचते हुए सब्जी की दुकान की ओर बढ़ें, तो एक पल के लिए मुस्कुराइए और सोचिए की, कहीं दूर स्वर्ग में, भगवान के नाम पर बनाडाइट चार्ट हमारे विद्वान सांस्कृतिक संवाहकों की सूक्ष्म अवलोकन क्षमता के सुदीर्घ सांस्कृतिक दर्शन का प्रतिसाद है।
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© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’
म प्र साहित्य अकादमी से सम्मानित वरिष्ठ व्यंग्यकार
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≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈






