डॉ कुंदन सिंह परिहार
(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय डॉ कुन्दन सिंह परिहार जी का साहित्य विशेषकर व्यंग्य एवं लघुकथाएं ई-अभिव्यक्ति के माध्यम से काफी पढ़ी एवं सराही जाती रही हैं। हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहते हैं। डॉ कुंदन सिंह परिहार जी की रचनाओं के पात्र हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं। उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम व्यंग्य – ‘‘गोदी’ पत्रकार और ‘गोदी’ लेखक ‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार # 298 ☆
☆ व्यंग्य ☆ ‘गोदी’ पत्रकार और ‘गोदी’ लेखक ☆
अमेरिका-इराक की लड़ाई में पेंटागन ने अपनी फौजों के साथ कई ऐसे पत्रकार भेजे थे जिन्हें ‘एंबेडेड’ पत्रकार कहा गया। ‘एंबेडेड’ का मतलब ‘पैवस्त’, यानी जो अमेरिकी शासन की नीति का हिस्सा हों। ये पत्रकार पेंटागन का ही खाते और उसी की बजाते थे। जो पेंटागन दिखाये वही देखते थे और जो निषिद्ध किया जाए उसकी तरफ आंखें मूंद लेते थे। हमारे देश में भी कई पत्रकारों पर ‘गोदी’ मीडिया होने का ठप्पा लगता है क्योंकि वे वही देखते हैं जो सरकार दिखाती है। वे सरकार की आलोचना से परहेज़ करते हैं।
ऐसे ही कुछ पत्रिकाओं में ‘गोदी’ लेखक होते हैं जो पत्रिका और संपादक जी के प्रति पूर्ण निष्ठावान होते हैं और संपादक के इशारे पर नाना करतब करते हैं। ये संपादक जी की ‘किचिन कैबिनेट’ के सदस्य होते हैं और ये वही देखते हैं जो संपादक जी इन्हें दिखाते हैं। दूसरी चीज़ें देखते वक्त ये ‘रतौंधी’ के शिकार हो जाते हैं।
एक सवेरे एक संपादक जी के घर जाने का इत्तफाक़ हुआ। गेट पर आवाज़ लगायी तो बरामदे में से एक खाट से उठकर एक लुंगी- बनयाइन धारी सज्जन पेट खुजाते आये। गेट खोल कर बोले, ‘प्रणाम। पधारिए।’
मैंने पूछा, ‘विपिन जी हैं?’
वे बोले, ‘भैया तो जरूरी काम से सपरिवार बंबई गये हैं। परसों लौटेंगे। आप कैसे पधारे?’
मैंने कहा, ‘मैं दिल्ली के एक अखबार में हूं। यहां कुछ काम से आया था। विपिन जी से पुराना परिचय है।’ फिर पूछा, ‘आप उनके कौन हैं?’
वे बोले, ‘हम उनकी पत्रिका के लेखक हैं। आजकल घर सूना छोड़कर जाना ठीक नहीं। चोर नजर लगाये रहते हैं। हमने भैया से कहा आप निश्चिंत होकर जाइए, हम तो हैं, आपके घर पर पहरा देंगे। यहीं बैठे-बैठे दो चार रचनाएं फटकार लेंगे। मेरे साथ प्रख्यात कवि शलभ जी भी हैं।’
उन्होंने दूसरी खटिया की तरफ इशारा किया जिस पर एक बूढ़े से सज्जन बैठे हमारी तरफ आंखें मिचमिचा रहे थे।
मैंने पहले सज्जन से पूछा, ‘आपका परिचय?’
वे बोले, ‘मैं दीपक भारती हूं। प्रतिष्ठित कथाकार। हम दोनों भैया की पत्रिका में छपते रहते हैं। भैया की हम पर कृपा है।’
उन्होंने भक्ति भाव से आंखें बन्द कर हाथ जोड़े। फिर हंस कर बोले, ‘अभी शलभ जी को भागलपुर की एक संस्था का कविता-वारिधि पुरस्कार मिला है। उसी में मगन हैं।
शलभ जी ने दांत निकाल कर हाथ जोड़े।
मैंने कहा, ‘विपिन जी के प्रति आपकी निष्ठा प्रशंसनीय है।’
दीपक जी बोले, ‘हम भैया और उनकी पत्रिका के प्रति पूरी तरह समर्पित हैं। कोई इन दोनों की तरफ आंख उठा कर भी देखे तो हमें बर्दाश्त नहीं होता।’
शलभ जी बोले, ‘भैया कहें तो दिन और भैया कहें तो रात। भैया मन प्राण में ऐसे बसे हैं कि एक छन के लिए नहीं निकलते।’
दीपक जी गर्व से बोले, ‘हम तो भैया के लिए बाकायदा फौजदारी करने को तैयार रहते हैं। साहित्यिक फौजदारी तो चलती ही रहती है। हम भैया के हुकुम पर पत्रिका में लेखकों की प्रशंसा और निन्दा करते हैं। जिसे भैया कहें उसे आसमान पर पहुंचा देते हैं और जिसे कहें उसे कूट कर पाताल में धंसा देते हैं। फिर जिन्दगी भर बिलबिलाते रहो।’
शलभ जी बोले, ‘हमारा जीवन भैया की सेवा के लिए है। दिन रात उनकी सेवा में खड़े रहते हैं। इसीलिए भैया हमें महत्व देते हैं। कोरे लेखन से क्या होता है? लेखन में तो सैकड़ो झक मार रहे हैं। सेवा-भाव होना चाहिए।’
दीपक जी भावुक होकर बोले, ‘भाभी जी हमें अपने बच्चों की तरह प्यार करती हैं। इतना प्यार तो हमें अपनी सगी मां ने भी नहीं दिया।’
उन्होंने फिर आंखें बन्द कर हाथ जोड़े।
शलभ जी बोले, ‘हम दोनों आज जो कुछ भी हैं, भैया की कृपा से हैं।उनके रिन से हम कभी उरिन नहीं हो सकते। उनके पैरों की धोवन जिन्दगी भर पियें तब भी उनका रिन नहीं उतरेगा।’
उन्होंने भी आंखें मूंद कर हाथ जोड़े।
उनकी बातें सुनकर मन भर गया था, इसलिए मैं वहां से भाग खड़ा हुआ। चलते-चलते दीपक जी बोले, ‘शाम को आइए। शाम को यहां भैया के प्रशंसक इकट्ठे होते हैं। आपको बहुत आनन्द आएगा। गंगा-स्नान हो जाएगा।
मैं ‘मुझे निकलना है’ कह कर गेट से बाहर हो गया।
कुछ दिन बाद एक और पत्रिका के दफ्तर जाने का सुयोग हुआ। संपादक जी के दफ्तर में घुसने लगा तो एक सज्जन ने प्रकट होकर इशारा किया, बोले, ‘पहले थोड़ा इधर आवें।’
वे मुझे एक छोटे से कमरे में ले गये जहां तीन और लोग विराजमान थे। मुझे कुर्सी देकर सब का परिचय कराया,बोले, ‘हम सभी भैया जी की पत्रिका के लेखक हैं। भैया जी के दर्शन से पहले कुछ ज़रूरी जानकारी देने की कृपा करें।’
उन्होंने मेरे बारे में पूछताछ की, बोले, ‘वाह, आप तो पत्रकार हैं। भैया जी और उनकी पत्रिका के बारे में आपकी क्या धारणा है?’
मैंने गोलमोल जवाब दे दिया।
वे बोले, ‘भैया जी से जलने वाले और उनके विरोधी बहुत हैं। दुर्मुख जी को जानते हैं?’
मैंने कहा, ‘नहीं।’
‘कर्कट जी को?’
मैंने कहा, ‘इनको भी नहीं जानता।’
वे बोले, ‘ये भैया जी के विरोधी संपादक हैं। निकृष्ट लोग हैं। आप इनको नहीं जानते यह जानकर निश्चिंतता हुई।’
फिर दो पन्ने का एक कागज निकाल कर बोले, ‘यह भैया जी का बायोडाटा है। फुरसत से पढ़िएगा। चमत्कृत कर देने वाला है। कभी भैया जी पर अपने अखबार में लेख लिखें। हम और आवश्यक सामग्री भेज देंगे। हम चाहते हैं भैया जी की कीर्ति पूरे देश में फैले।’
फिर उन्होंने फोन उठाया, बोले, ‘भैया जी, ये दिल्ली से नीरज जी आपके दर्शन के लिए आये हैं। भेजूं क्या?’
उधर से उत्तर पाकर बोले, ‘जाइए, मिल लीजिए। जूते यहीं उतार दीजिए। भैया जी का ऑफिस हमारे लिए मन्दिर है।’
कुछ महीने बाद दिल्ली में अचानक दीपक जी टकरा गये। नमस्कार के बाद मैंने पूछा, ‘क्या हाल है? विपिन जी कैसे हैं?’
वे मुंह बिगाड़ कर बोले, ‘उनकी बात मत कीजिए। उनकी नज़र में हमारी निष्ठा का कोई मूल्य नहीं है। आजकल वे बहुत पक्षपात करते हैं। अब हमारा उनसे कोई संबंध नहीं है।’
मैंने शरारत से पूछा, ‘तो अब आप किस पत्रिका से जुड़े हैं?’
वे हंस कर बोले, ‘अभी तो कहीं जुड़ा नहीं हूं। हम तो शिशुवत हैं। बिना किसी की गोद में बैठे चैन नहीं पड़ता। देखिए किस गोद में गिरते हैं।’
© डॉ कुंदन सिंह परिहार
जबलपुर, मध्य प्रदेश
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈






बहुत बढ़िया। अत्यंत उत्कृष्ट रचना।
नई प्रजाति से परिचय कराने के लिए आभार। थोड़ा विस्मय हुआ लेकिन आनंद भरपूर आया।
कृपाकर साधुवाद स्वीकार करें। यूं ही लिखते रहें। आपकी दीर्घायु और उत्तम स्वास्थ्य की कामना है।
🙏🙏🌺🙏🙏
धन्यवाद, बिष्ट जी।