श्रीमती सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’
(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “दूसरा छोर”।)
☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # 236 ☆
🌻लघु कथा 🪢दूसरा छोर🪢
प्रीत की रीत निभाते मेघा सदैव उत्साहित रहती। सभी त्यौहारों को जी भर कर जी लेना चाहती थी। तीन बहनों में बड़ी, नाक नक्श तीखे, परन्तु रंग साँवला।
माँ तो तीनों बेटियों को राजकुमारी बना कर रखना चाहती। परन्तु बहनों का आपसी मेलजोल नहीं, क्योंकि दो एक साथ सुंदर नकचढ़ी जो थी।
मेघा पूरा ध्यान पढाई में लगा कर एक प्राईवेट कंपनी में जाँब करने लगी। बहनों का रुखापन उसे ह्रदय से रुला देता।
रिमझिम बारिश बालकनी से झाँकते मेघा को आवाज आई—
मेघा आओ – – आज भैया मुझे फिर से सता रहा है। मैने इसे बाँध रखा है बस दूसरा छोर आप पकड़ लिजिये। कही फिर से भाग न जाए।
हँसी ठिठोली से भरी मेघा सकुचाती आई अपनी सहेली के पास, सुरभि ने भैया की एक हाथ चुनरी से तो दूसरा छोर मेघा को बाँध दिया प्यार दूलार और नेह से बोली–रक्षाबंधन के बाद उपहार में मैने आपको माँग लिया है। मेघा भी लाज से दूसरे छोर में बँधती चली गई।
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© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈




