डॉ. ऋचा शर्मा

(डॉ. ऋचा शर्मा जी को लघुकथा रचना की विधा विरासत में  अवश्य मिली है  किन्तु ,उन्होंने इस विधा को पल्लवित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी । उनकी लघुकथाएं और उनके पात्र हमारे आस पास से ही लिए गए होते हैं , जिन्हें वे वास्तविकता के धरातल पर उतार देने की क्षमता रखती हैं। आप ई-अभिव्यक्ति में  प्रत्येक गुरुवार को उनकी उत्कृष्ट रचनाएँ पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है स्त्री विमर्श पर आधारित एक विचारणीय लघुकथा थाप। डॉ ऋचा शर्मा जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संवाद  # 154 ☆

☆ लघुकथा – थाप ☆ डॉ. ऋचा शर्मा ☆

दिन-भर मशीन की मानिंद वह एक के बाद एक, घर के काम निबटाती जा रही थी। उसका चेहरा भावहीन दिख रहा था। बातचीत भले ही कर रही थी लेकिन स्वभाव में कुछ उदासी थी। मन ही मन वह झुँझला भी रही थी। छोटे भाई की शादी थी। घर में हँसी मजाक का माहौल था। किन्तु उसमें वह शामिल नहीं हो रही थी। वह शायद वहाँ पर रहना भी नहीं चाह रही थी।

“कुमुद ऐसी तो नहीं थी, क्या हो गया इसे?” उसकी उम्र ढ़ली अविवाहित बड़ी बहन से मैंने पूछा।

“अरे कोई बात नहीं, थोड़ी मूडी है।” कहकर उसने भी बात टाल दी।

मुझे खटक रहा था कि शादी लायक दो बड़ी बहनों के रहते, छोटे भाई की शादी की जा रही है? लड़कियाँ खुद ही शादी करना ना चाहें, सो अलग बात है लेकिन जानते-बूझते उनकी उपेक्षा करना सही नहीं है।

“खैर छोड़ो, दूसरे के फटे में पैर क्यों अड़ाना !”

शादी के घर में रिश्तेदारों का जमावड़ा था। महिला संगीत चल रहा था। साथ में स्त्रियों की शोख अदाएँ और फुसफुसाहट भी जारी थी। किसी एक ने कहा–“बिनब्याही जवान दो बहनें घर बैठी हैं और कई साल छोटे भाई की शादी की जा रही है?” दूसरी बोली–“बड़ी तो अधेड़ दिखने लगी है। कुमुद के लिए भी नहीं सोचा जा रहा।” ढ़ोलक की थाप पर नाच-गाना तो चल ही रहा था, निंदारस भी खुलकर बरस रहा था।

“अरे कुमुद ! अबकी तू उठ, बहुत दिनों से तेरा नाच नहीं देखा। ससुराल जाने के लिए थोड़ी प्रैक्टिस कर ले।” बुआ ने हँसी में व्यंग्य बाण छोड़ दिया–“अब कुमुद के लिए भी लड़का देख लो, नहीं तो यह भी कोमल की तरह बुढ़ा जाएगी। फिर कोई दूल्हा इसे नहीं मिलेगा।” ढ़ोलक की थाप थम गई। बात हिय में चटाख से लगी।

नाचने के लिए उठे कुमुद के कदम, वहीं थम गए। लेकिन चेहरा खिल गया–“किसी ने तो दिल की बात कही। फिर वह उठी और दिल खोलकर नाचने लगी।

कुमुद की माँ ननद रानी से उलझ गई–“बहन जी ! आपको रायता फैलाने की क्या जरूरत है। सबके सामने ये बातें छेड़कर। इत्ता दान-दहेज कहाँ से लाएँ? दो-दो लड़कियों के हाथ पीले करना, कोई आसान है? ऐरे-गैरों के घर जाकर किसी दूसरे की जी-हुजूरी करने से तो अच्छा है, अपने छोटे भाई का परिवार ही पालें। छोटे को सहारा भी रहेगा? उसकी नौकरी भी पक्की नहीं है। कोमल तो समझ गई लेकिन कुमुद के दिमाग से शादी का फितूर उतर नहीं रहा। खैर…जाने दो !”

ढ़ोलक की थाप, सुर में गाती औरतों की आवाजें और तालियों के बीच, इन बातों से अनजान कुमुद मगन-मन नाच रही थी।

© डॉ. ऋचा शर्मा

प्रोफेसर एवं अध्यक्ष – हिंदी विभाग, अहमदनगर कॉलेज, अहमदनगर. – 414001

संपर्क – 122/1 अ, सुखकर्ता कॉलोनी, (रेलवे ब्रिज के पास) कायनेटिक चौक, अहमदनगर (महा.) – 414005

e-mail – richasharma1168@gmail.com  मोबाईल – 09370288414.

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares
5 1 vote
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest

1 Comment
Oldest
Newest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments
अ.ल. देशपांडे अमरावती
0

बहन जी, समाज की दुखती रग पर आपने कलम की नोक रख दी है.
दहेज के कारण लडकियोंका ब्याह रूक जाए यह स्वस्थ समाज का लक्षण नहीं है.
आपकी कलम का पैनापन बना रहें.
शुभकामनाएं.

अ.ल. देशपांडे अमरावती.