श्रीमती सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’
(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “बप्पा जी ”।)
☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २३९ ☆
🌻लघु कथा 🌻बप्पा जी 🌻
कालिंदी को साक्षात्कार के लिए बुलाया गया। चारों तरफ गणेश उत्सव की धूम मची थी। कालिंदी शहर के भीड़ भरी इलाके से पैदल चली जा रही थी। 12 दिन का समय दिया गया था उसे सभी प्रकार के कागजात समिट करने के लिए। पर कालिंदी कहाँ से लाएं??
अपने जन्म का सर्टिफिकेट और अपना सारा बायोडाटा माँ को तो पता ही नहीं था कि कालिंदी कब बड़ी हो गई।
समय और सहारा एक मात्र पास के शिव गणेश मंदिर का था। जहाँ से उसे पूर्ण संतुष्टि की भावना मिलती थी।
आज वह इस मंदिर पर टकटकी लगाये बैठी अपने भविष्य की भोर को घनी घटा से ढकते देखने लगी।
तेज आंधी तूफान के साथ बारिश। अचानक सर पर हाथ फेरते महसूस करते कालिंदी ने देखा– वहाँ माँ चुपचाप खड़ी है। सारे सवालों का जवाब देती कहने लगी – – – बाकी मैं नहीं जानती यह जगत के बप्पा पिताजी हैं। यही तुझे पाया है कालिंदी को समझते देर ना लगी। वह एक अनाथ है। जिसे बप्पा के मंदिर से उठाया गया था।
बाकी कुछ पूछने से पहले माँ ने आँचल से आंसू पोछते कहने लगी– कुछ वर्षों पहले मै भी इसी सवाल को लेकर आई थी।
आज माँ और बप्पा का आश्रय उसे स्वर्ग का महसूस हो रहा था। माँ तो बिन ब्याहे ही माँ का फर्ज उठा रही थी क्योंकि वह स्वयं भी बप्पा के आश्रय में पायी गई थी।
काली घटा छटते ही मन में सोचने लगी समाज ने गणेश को बप्पा क्यों? कहा!!!
वह स्वयं भी अपनी माँ का नेतृत्व करेगी। कालिंदी को गणेश बप्पा के मातृत्व आदेश याद हो आया और चल पड़ी, अपनी मंजिल को पाने के लिए।
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© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈






