श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’
(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के आभारी हैं जो साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं।
आज प्रस्तुत है “पुरातात्विक विरासत का संरक्षण: चुनौतियाँ और समाधान…” पर चर्चा।
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा# 188 ☆
☆ पुरातात्विक विरासत का संरक्षण: चुनौतियाँ और समाधान – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
भारत की पुरातात्विक विरासत विश्व के सबसे समृद्ध सांस्कृतिक खजानों में से एक है। मोहनजोदड़ो से लेकर खजुराहो, नालंदा से लेकर हम्पी तक, ये स्थल न केवल हमारे गौरवशाली अतीत के प्रतीक हैं, बल्कि इतिहास, वर्तमान और भविष्य के लिए शिक्षा, पर्यटन और राष्ट्रीय पहचान का आधार भी हैं। इन स्थलों की वर्तमान दशा चिंताजनक है। अतिक्रमण, पर्यावरणीय क्षति, उपेक्षा और अज्ञानता के कारण यह विरासत धीरे-धीरे नष्ट हो रही है। हमारी कितनी ही पुरातात्विक सम्पदा तस्करों द्वारा चोरी की गई तथा दुनियां भर के कई संग्रहालयों तक मंहगी कीमतों में पंहुचाई गई है। सोने के सिक्कों की लालच में कितने ही किलों की दीवारें क्षतिग्रस्त कर दी गई हैं।
भारत में 3, 600 से अधिक पुरातात्विक स्थल हैं, जिनमें से कई यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल हैं। परंतु इनमें से अधिकांश स्थल गंभीर समस्याओं का सामना कर रहे हैं।
अतिक्रमण और अवैध निर्माण: दिल्ली के पुराने किले के आसपास की अवैध बस्तियाँ या आगरा में ताजमहल के निकट प्रदूषण इसके उदाहरण हैं।
प्राकृतिक क्षति: मानसून, भूकंप और वनस्पतियों के बढ़ने से स्थलों की संरचना कमजोर होती है। उदाहरणार्थ, कोणार्क के सूर्य मंदिर का क्षरण।
पर्यटन का दबाव: ताजमहल जैसे स्थलों पर प्रतिदिन हजारों पर्यटकों के आने से संरचनात्मक दबाव बढ़ता है।
चोरी और तस्करी: प्राचीन मूर्तियों और कलाकृतियों की अवैध तस्करी एक बड़ी समस्या है। 2021 में, तमिलनाडु से चुराई गई 250 से अधिक मूर्तियाँ विदेशों में बरामद की गईं।
जागरूकता की कमी: स्थानीय समुदायों को इन स्थलों के ऐतिहासिक मूल्य का एहसास नहीं है, जिससे उपेक्षा बढ़ती है। पर्यटक स्वयं का नाम इन महत्वपूर्ण स्थलो की दीवारों पर लिख कर उन्हें क्षति पहुंचाते हैं। इस सब के बावजूद, सुरक्षा और संरक्षण के प्रयास भी सराहनीय हैं।
संरक्षण में युवाओं की भूमिका .. युवा समाज का सबसे गतिशील और प्रौद्योगिकी-साक्षर वर्ग है। उनकी भागीदारी से पुरातत्व संरक्षण को नई दिशा मिल सकती है।
युवा सोशल मीडिया के माध्यम से विरासत के महत्व को प्रचारित कर सकते हैं। उदाहरण के लिए, हैशटैग #SaveOurHeritage जैसे अभियान चलाये जा सकते हैं। स्वयंसेवी समूह बनाकर ‘युवा भारत फॉर हेरिटेज’ जैसे संगठन सक्रिय किये जा सकते हैं जो साइटों की सफाई और डॉक्यूमेंटेशन में मदद करते हैं।
तकनीकी नवाचार: युवा ड्रोन, 3D मॉडलिंग और AR/VR तकनीक से साइटों का डिजिटल संरक्षण कर सकते हैं। कोविड के दौरान ‘वर्चुअल संग्रहालय’ की लोकप्रियता इसका उदाहरण है।
शैक्षिक पहल: कॉलेजों में पुरातत्व क्लब बनाकर युवाओं को जोड़ा जा सकता है। एनएसएस और एनसीसी जैसी संस्थाओ के कार्यक्रमों में पुरातात्विक संरक्षण को शामिल किया जाना चाहिए।
सामुदायिक नेतृत्व: युवा स्थानीय समुदायों को प्रशिक्षित करके उन्हें संरक्षण प्रक्रिया का हिस्सा बना सकते हैं। उदाहरण के तौर पर, गुजरात के धोलावीरा में युवाओं ने ऐप विकसित करके पर्यटकों को साइट की जानकारी दी, जिससे जागरूकता बढ़ी।
संरक्षण के उपाय.. पुरातात्विक विरासत को बचाने के लिए निम्नलिखित उपाय कारगर हो सकते हैं:
– वैज्ञानिक प्रबंधन: पत्थरों और भित्तिचित्रों को संरक्षित करने के लिए रासायनिक उपचार और जल निकासी व्यवस्था आवश्यक है।
कानूनी सख्ती: ‘प्राचीन स्मारक संरक्षण अधिनियम, 1958’ को और सशक्त बनाने की आवश्यकता है। अवैध खुदाई और तस्करी पर कठोर दंड होने चाहिए।
सामुदायिक भागीदारी: स्थानीय लोगों को पर्यटन से गाइड के रूप में जोड़कर या पर्यटको के लिये उपयोगी किताबों की बिक्री, खान पान की स्थानीय वस्तुओ आदि के विक्रय से उन्हें आर्थिक लाभ पहुँचाना।
निजी-सार्वजनिक भागीदारी: ‘अडॉप्ट ए हेरिटेज’ योजना के तहत कॉर्पोरेट्स को साइटों के रखरखाव की जिम्मेदारी दी जा सकती है।
जलवायु अनुकूलन: समुद्र तटीय स्थलों जैसे महाबलीपुरम को जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से बचाने के लिए विशेष योजनाएँ बनाना।
सरकार की जवाबदारी ..केंद्र और राज्य सरकारों को उनकी भूमिकाएँ निभानी होंगी:
पर्याप्त बजट आवंटन: पुरातत्व विभाग को संसाधन मुहैया कराना। वर्तमान में, भारत का पुरातत्व बजट अमेरिका या यूरोप के मुकाबले नगण्य है।
अंतर्राष्ट्रीय सहयोग: यूनेस्को और इकॉमोस जैसे संगठनों के साथ मिलकर प्रशिक्षण और तकनीकी सहायता लेना।
कानूनों का क्रियान्वयन:ASI (भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण) को अधिक अधिकार देकर अतिक्रमण हटाने में सक्षम बनाना।
शिक्षा और शोध: पुरातत्व विभागों को आधुनिक उपकरणों से लैस करना और विश्वविद्यालयों में शोध को प्रोत्साहित करना।
सतत पर्यटन:ई-टिकटिंग, समय-सीमित प्रवेश और पर्यावरण-अनुकूल सुविधाएँ विकसित करना।
सरकार की ‘राष्ट्रीय विरासत मिशन’ जैसी योजनाएँ सराहनीय हैं, लेकिन इन्हें गति देने की आवश्यकता है।
स्थानीय प्रशासन का कर्तव्य .. स्थानीय निकायों की भूमिका अहम होती है:
नियमित निगरानी: साइटों के आसपास अवैध निर्माण रोकने के लिए सचेत रहना।
कचरा प्रबंधन: ताजमहल जैसे स्थलों के निकट प्लास्टिक मुक्त क्षेत्र घोषित करना।
आपदा प्रबंधन: बाढ़ या भूकंप जैसी आपात स्थितियों के लिए योजनाएँ तैयार रखना।
सामुदायिक जुड़ाव: स्थानीय लोगों को साइटों के इतिहास से अवगत कराने के लिए कार्यशालाएँ आयोजित करना।
सुरक्षा उपाय: CCTV और सेंसर लगाकर चोरी रोकना।
उदाहरण के लिए, मध्य प्रदेश में सांची स्तूप के आसपास स्थानीय प्रशासन ने सौर ऊर्जा से चलने वाली रोशनी की व्यवस्था की है, जिससे रात्रि पर्यटन को बढ़ावा मिला है।
पुरातात्विक विरासत का संरक्षण केवल सरकार या विशेषज्ञों का नहीं, बल्कि समाज के प्रत्येक वर्ग का दायित्व है। युवाओं की ऊर्जा, सरकार की नीतियाँ, स्थानीय प्रशासन की कार्यवाही और जनता की जागरूकता—इन सभी के समन्वय से ही हम अपने इतिहास को भविष्य के लिए सुरक्षित कर सकते हैं। हमारी सभ्यता की परीक्षा इस बात में है कि हम अपने इतिहास को कितना सम्मान देते हैं।
चर्चाकार… विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’
समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार
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≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈







