डॉ कुंदन सिंह परिहार
(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय डॉ कुन्दन सिंह परिहार जी का साहित्य विशेषकर व्यंग्य एवं लघुकथाएं ई-अभिव्यक्ति के माध्यम से काफी पढ़ी एवं सराही जाती रही हैं। हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहते हैं। डॉ कुंदन सिंह परिहार जी की रचनाओं के पात्र हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं। उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय लघु व्यंग्य – ‘उधार के रिश्ते’। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३०७ ☆
☆ लघु व्यंग्य ☆ उधार के रिश्ते ☆
‘किराने का सामान कहां से लेते हो?’
‘सुल्तान किराना स्टोर से।’
‘उसकी दूकान से मत लो। वह दूसरे धरम का है। गुरूजी ने इन लोगों की दूकान का सामान लेने से मना किया है।’
‘हमें नहीं मालूम। कभी उसका धरम पूछा नहीं। आदमी ठीक है।’
‘तो क्या गुरूजी की बात नहीं मानोगे?’
‘मान लेंगे। फिर सामान कहां से खरीदें?’
‘हमारी दूकान से खरीदो। एकदम खालिस माल मिलेगा। दाम भी सही।’
‘ठीक है, लेकिन उसके यहां हमारा उधार चलता है। कभी टोकता नहीं। तुम्हारे यहां चलेगा क्या?’
‘ना भइया, अपने यहां उधार वुधार नहीं चलता। तुम उसी दूकान से खरीदो। ये गुरू लोग तो फालतू बरगलाते रहते हैं। इनके फेर में मत पड़ो।’
© डॉ कुंदन सिंह परिहार
जबलपुर, मध्य प्रदेश
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈






