डॉ कुंदन सिंह परिहार
(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय डॉ कुन्दन सिंह परिहार जी का साहित्य विशेषकर व्यंग्य एवं लघुकथाएं ई-अभिव्यक्ति के माध्यम से काफी पढ़ी एवं सराही जाती रही हैं। हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहते हैं। डॉ कुंदन सिंह परिहार जी की रचनाओं के पात्र हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं। उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम विचारणीय कथा – ‘समाज में बाहुबलियों की अहमियत’। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३१० ☆
☆ व्यंग्य ☆ समाज में बाहुबलियों की अहमियत ☆
हाल ही में एक घटना ऐसी हुई जिसने बहुत भावुक कर दिया। बरेली में एक अभिनेत्री की बहन के घर पर एक बाहुबली के आदेश पर गोलियां चल गयीं। बाहुबली की नाराज़ी का कारण यह था कि अभिनेत्री की बहन ने एक कथावाचक के द्वारा स्त्रियों के विरुद्ध दिये गये बयान पर अपना रोष व्यक्त किया था। बाहुबली ने अभिनेत्री की बहन की टिप्पणी को सनातन का अपमान बताया था और उन्हें दंडित करने का निश्चय जताया था ।बाहुबली ने यह भी चेतावनी दी कि सनातन का अपमान करने वाले किसी भी व्यक्ति को बख्शा नहीं जाएगा।
खबर सुनकर भावुकता से मेरा दिल भर आया। दो दिन तक कंठावरोध रहा। जहां सनातन के इतने बलशाली रक्षक हों वहां सनातन को हानि पहुंचाने की जुरअत भला कौन कर सकता है? अब सनातन पूर्णतया सुरक्षित है। हमारा संत समाज अब निश्चिन्त हो सकता है। अब सनातन को हल्के में लेने की मूर्खता भला कौन करेगा? ‘जब जब होय धरम की हानी, बाढ़ैं असुर अधम अभिमानी; तब तब धरि प्रभु विविध शरीरा, हरहिं कृपानिधि सज्जन पीरा।’ प्रभु कौन सा रूप धरकर धर्म की रक्षा के लिए अवतरित हो जाएंगे, कौन कह सकता है? कथावाचकों का पक्ष लेते हुए बाहुबली ने स्पष्ट कर दिया है कि ‘इनहिं कुदृष्टि बिलोकै जोई, ताहि वधे कछु पाप न होई।’ अब कथावाचक निश्चिंत होकर बीस फीट दूर से प्रेतग्रस्त आदमी को थप्पड़ लगा सकते हैं या छात्रों को बिना पढ़े पास होने के नुस्खे बता सकते हैं।
बाहुबली की धमकी के बाद कथावाचकों पर जब तब फब्तियां कसने वालों को सांप सूंघ गया है। उन पर गुस्सा दिखाने वाले कलमधारी अब चुपचाप अपनी कलम चबा रहे हैं। उनके शब्द डर के मारे कागज पर उतरने से इनकार कर रहे हैं।
सनातन के रक्षक एक वकील साहब सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की टिप्पणी से ऐसे नाराज़ हुए कि उन्होंने उसे सनातन का अपमान माना और मुख्य न्यायाधीश की तरफ जूता उछाल दिया। इस पराक्रम के साथ उन्होंने नारा दिया—‘सनातन का अपमान, नहीं सहेगा हिंदुस्तान ।’ दुष्यंत कुमार ने लिखा था ‘एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो।’ वकील साहब को कोर्ट के चेंबर में कोई पत्थर नज़र नहीं आया तो जूता उछाल दिया। बहादुरी के इस काम से वकील साहब ने बता दिया कि कि वे देश की न्याय व्यवस्था को जूते की नोक पर रखते हैं। वकील साहब ने यह नहीं बताया कि उन्हें पूरे हिंदुस्तान का वकील बनने के लिए किसने वकालतनामा सौंपा था।
बाहुबली की धमकी से जो सन्नाटा खिंचा उससे धर्म की रक्षा के मामले में एक नया आयाम उद्घाटित हुआ। हमारे देश में धर्मस्थलों की सुरक्षा पर सरकार का बहुत धन व्यय होता है। नये राम मंदिर की सुरक्षा के इंतज़ाम पर नज़र डालें तो दिमाग चक्कर खा जाता है। तीन प्रकार के बल वहां सुरक्षा में लगाये गये हैं, कैमरों और ड्रोन की तैनाती है, मंदिर को घेरती चार किलोमीटर की दीवार है। कई दूसरे धर्मस्थलों पर भी सुरक्षा बल तैनात हैं। गरज़ यह कि जो संसार की रक्षा करते हैं उनकी रक्षा आदमी कर रहा है। कई धर्मगुरुओं को भी सरकार के खर्चे पर सुरक्षा दी गयी है, जो सवाल पैदा करती है कि अपने को भगवान का कृपापात्र मानने वालों और मृत्यु का दिन पूर्व निर्धारित मानने वालों को आदमी की दी हुई सुरक्षा की ज़रूरत क्यों पड़ती है?
तो दिमाग में यह विचार आता है कि अगर पीपीपी अर्थात पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप के अंतर्गत सरकार धर्म की रक्षा हेतु बाहुबलियों का सहयोग लेने लगे तो मामला ‘कम कीमत बालानशीं’ वाला हो जाएगा। बाहुबली की एक चेतावनी आएगी और धर्म के कार्यों में गड़बड़ी करने वाले सभी उपद्रवियों के औसान ढीले हो जाएंगे। फिर धर्मगुरुओं को भी सुरक्षा की ज़रूरत नहीं रहेगी।
देश के कई क्षेत्रों में बाहुबलियों की तूती बोलती है, उनकी अदालतें लगती हैं, लेकिन अफसोस है कि सरकार ने उनकी ताकत और क्षमताओं का समुचित उपयोग नहीं किया। जो काम सरकार द्वारा लाखों रुपया खर्च करने पर भी नहीं होता वह बाहुबली के एक निर्देश पर हो सकता है।
राहत की बात है कि कुछ राज्यों ने अपने बाहुबलियों की संभावनाओं को पहचाना है और उनका सहयोग लेने में रुचि दिखायी है। बिहार के आसन्न चुनाव के लिए एक दल ने तीन बाहुबलियों को मैदान में उतारा है, जब कि दूसरे दल ने एक पूर्व बाहुबली के संभावना-संपन्न पुत्र और एक ऐसे बाहुबली की पुत्री को टिकट दिया है जो फिलहाल संगीन अपराध में जेल में बन्द हैं और जनता की सेवा करने की स्थिति में नहीं हैं। पुत्री ने साफ घोषणा की है कि वे अपने यशस्वी पिता को जेल से बाहर लाने के लिए ही चुनाव लड़ना चाहती हैं। एक और बाहुबली की पत्नी को भी टिकट से नवाज़ा गया है। कुछ दिन पूर्व सुशासन बाबू ने कानून में परिवर्तन करके एक बाहुबली को उनकी उपयोगिता को देखते हुए जेल से मुक्त कराया था। अब उनके पुत्र को टिकट दिया गया है ताकि पिताजी पुत्र के पीछे बैठकर ‘बैक सीट ड्राइविंग’ कर सकें। इस तरह जब बाहुबली कानून के शिकंजे में आ जाते हैं तो उनकी पत्नी या पुत्र को टिकट दे दिया जाता है ताकि समाज की सेवा में अवरोध न हो।
यह संतोष की बात है कि अपराधी प्रवृत्ति के लोगों की हमेशा धर्म में रुचि रही है। देश के दस्यु अक्सर मंदिरों में घंटे चढ़ाते रहे हैं। जो पिंडारी कहलाते थे वे काली के उपासक होते थे। वाल्मीकि की डाकू से महर्षि बनने की कथा सर्वविदित है।
मेरे ख़याल से बाहुबलियों की उपयोगिता और उनकी क्षमता के मद्देनज़र सरकार को चाहिए कि संकोच त्याग कर समाज के कल्याण में उनकी भागीदारी सुनिश्चित करे। ‘साफ छिपते भी नहीं, सामने आते भी नहीं’ वाली नीति की अब कोई ज़रूरत नहीं है।
ताज़ा समाचार यह है कि बिहार के चुनाव में करीब दो दर्ज़न बाहुबली मैदान में उतर रहे हैं। अब मेरी चिन्ता यह है कि कहीं ऐसा न हो कि धीरे-धीरे विधानसभा की सारी सीटों पर बाहुबली विराज जाएं और बिहार प्रगति के मार्ग पर ऐसा सरपट दौड़े कि पूरा देश देखता रह जाए।
© डॉ कुंदन सिंह परिहार
जबलपुर, मध्य प्रदेश
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





