श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ३८३ ☆
व्यंग्य – काँपटेबिलिटी सॉफ्टवेयर अपडेट करो भगवान
श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
कहा जाता है जोड़ियां स्वर्ग में बनती हैं, लेकिन लगता है भगवान को अपनी “मैचमेकिंग सिस्टम” की फाइलें फिर से स्कैन करनी होंगी। शायद उनके कंप्यूटर में “ विवाह सॉफ्टवेयर 1.0” अब बग से भर गया है। वरना धरती पर इतने असंगत युगल हर दिन “कम्पैटिबिलिटी एरर” क्यों दिखा रहे हैं।
शर्मा जी और उनकी पत्नी संगीता जी को ही ले लीजिए। शर्मा जी सुबह छह बजे उठकर योग और प्राणायाम करते हैं, और संगीता जी सुबह आठ बजे उठकर योगा नहीं बल्कि “जोगाड़” शुरू कर देती हैं कि आज खाना बाजार से किस तरह बुलवाया जाए । शर्मा जी नमक की मात्रा नाप-नापकर कम से कम खाते हैं और संगीता जी का सिद्धांत है कि “स्वाद, मूड से ज्यादा, भरपूर नमक से आता है।”
गुप्ता दंपति का हाल देखिए , गुप्ता जी को टीवी पर न्यूज़ देखना सबसे प्रिय लगता है, वो भी वो न्यूज़ जहां एंकर चीख-चीख कर बहस कर रहे हों। वहीं उनकी पत्नी सीमा जी को लगता है कि टीवी का उपयोग केवल “सास बहू सीरियल” के लिए है। नतीजा यह कि हर शाम गुप्ता जी और सीमा जी के बीच रिमोट वैसा ही मुद्दा बन जाता है जैसा संसद में बजट बिल। एक तरफ चीखता एंकर, दूसरी ओर रोती सास , घर में दोनों ही कार्यक्रम बराबर चलते हैं।
राजेश और कविता की जोड़ी में तो और भी दिलचस्प मेल है। राजेश को सुबह की सैर इतनी प्रिय है कि वो बिना घूमे दिन शुरू ही नहीं कर सकते। कविता के लिए सुबह की सैर का मतलब है,नींद में करवट बदल लेना। राजेश पार्क से लौटकर कहते हैं “तुम्हें भी चलना चाहिए था,” तो कविता तकिया पलटकर कहती हैं “तुम घूम आए न, कितने चैन से सोई मै पिछले एक घंटे।”
वर्मा जी को लगता है कि छुट्टी का दिन घर की डीप क्लीनिंग के लिए होता है, पंखा खोलो, बल्ब बदलो, स्क्रू कसो। और उनकी पत्नी मंजू जी मानती हैं कि छुट्टी का मतलब है “शॉपिंग डे”। नया कुकर, नई साड़ी, नई डील। सुबह से दोनों अपनी-अपनी दिशा में निकल पड़ते हैं, एक औजारों के साथ, दूसरी ऑफरों के साथ। शाम को थके हुए होते हैं, पर भगवान की राम मिलाई अपनी जोड़ी पर हंसते हैं।
कपड़ों पर भी मतभेद किसी राष्ट्रीय मुद्दे से कम नहीं। राठौर साहब की पत्नी को चटख रंग इतने पसंद है कि लगता है जैसे हर त्योहार होली ही हो। वहीं राठौर साहब को सफेद इतना प्रिय है कि लोग उन्हें देखकर पूछते हैं “क्या आप किसी फॉर्मल सम्मेलन से आ रहे हैं?” दोनों एक साथ बाजार जाते हैं, पत्नी कहती हैं “यह लाल साड़ी कितनी प्यारी है,” और पति सोचते हैं “अब घर में ट्रैफिक सिग्नल लगेगा क्या?”
भोजन पर बात छिड़े तो हर जोड़ा किसी कुकिंग शो का प्रतियोगी लगता है। मिस्टर तिवारी नॉनवेज के शौकीन हैं और मैडम तिवारी प्याज तक नहीं खाती। पति के हाथों में चिकन टिक्का और पत्नी के हाथों में तुलसीपत्र, किचन और पूजा घर के बीच दो विचारधाराएं टकराती हैं। पर प्रेम देखिए, दोनों साथ बैठकर खाते हैं, शायद एक स्वाद से, दूसरा सहनशीलता से।
घूमने का मामला तो और भी मजेदार है। मिश्रा जी कहते हैं “कश्मीर चलो, ठंड में मज़ा है।” और उनकी पत्नी कहती हैं “गोवा चलो, धूप में मज़ा है।” नतीजा यह कि दोनों समझौते में शिमला के रास्ते निकलते हैं और मनाली पहुंचकर भी एक दूसरे के शारीरिक थर्मोस्टेट को दोष देते हैं।
फिटनेस का भी अपना संघर्ष है। श्रीमती अग्रवाल जीरो फिगर के लिए डाइट पर हैं सलाद, सूप, स्मूदी। और अग्रवाल जी कहते हैं “भई जीवन में स्वाद न रहे तो सेहत का क्या फायदा।” जब वो परांठे खाते हैं तो श्रीमती जी उसे देख कर कहती हैं “तुम्हें अपने दिल की चिंता नहीं?” अग्रवाल जी हंसते हुए कहते हैं “दिल की ही सुनता हूं, दिल को खुशी चाहिए।”
एक और वर्ग है, सेल्फी बनाम सन्नाटा। पत्नी को हर मौके पर फोटो चाहिए। खाना खाया, फोटो। मंदिर गए, फोटो। झगड़ा हुआ, तब भी फोटो, ताकि बाद में दिखा सकें। बल्कि झगड़ा ही इस बात पर शुरू होता है। श्रीमान जी को कैमरा देखकर ही तनाव हो जाता है, लगता है हर क्लिक के साथ उनके निजी जीवन की पिक्सल घटती जा रही है।
तो क्या अब समय आ चुका है कि भगवान जोड़ियां बनाने वाला अपना सॉफ्टवेयर अपडेट कर ले।
शायद ये सारे पति-पत्नी एक जैसे सोचने लगें तो क्या बच जाएगा? न बहस, न नोक झोंक वाली मुस्कान, “तुम हमेशा ऐसे ही क्यों करते हो ? वाला ताना, फब्ती।” विवाह तब वैसा हो जाएगा जैसे बिना नमक की खिचड़ी या बिना विज्ञापन का टीवी ।
इसलिए कहा जा सकता है कि भगवान ने जो जोड़ियां बनाईं, वे असंगति नहीं, रोचकता से भरी हैं। भगवान ने प्रेम के कोड में जानबूझकर थोड़ा “कन्फ्यूजन” डाला है, ताकि रिश्ते नीरस न हों। वरना शर्मा जी और संगीता जी अगर दोनों योगी बन जाएं, तो कौन ठहाके लगाएगा? गुप्ता जी अगर सीरियल देखने लगें, तो न्यूज चैनल बंद ना हो जाएंगे।
भगवान को सॉफ्टवेयर बदलने की जरूरत नहीं, बस उसमें एक नया अपडेट डालना चाहिए “विवाह वर्जन 2.0 बस इतना कि श्रीमती श्रीवास्तव के 20 डिग्री ऐ सी के चलते मिस्टर श्रीवास्तव को रात में दूसरे बेड रूम में शिफ्ट न होना पड़े।”
जहां हंसी है, वहीं रिश्ता स्वस्थ है, और जहां रिमोट की छीना-झपटी चल रही है, वहां प्रेम जिंदा है। आखिर मीठा विरोध ही तो विवाह की ऑक्सीजन है। थोड़ी ठंड, थोड़ी गर्मी, पर दोनों साथ में, हमेशा “स्वर्गिक संगति” में।
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© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’
म प्र साहित्य अकादमी से सम्मानित वरिष्ठ व्यंग्यकार
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≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





