डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम विचारणीय कथा – ‘बहती गंगा में हाथ धोने वाले‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३१२ ☆

☆ व्यंग्य ☆ बहती गंगा में हाथ धोने वाले

देशभक्त कई किसिम के होते हैं। पहली किस्म के देशभक्त वे होते हैं जिनके दिल में देशभक्ति स्वाभाविक रूप से पैवस्त रहती है। उन्हें उसे याद नहीं करना पड़ता, न ही उसे बार-बार जगाना पड़ता है। वे अंग्रेज़ी कहावत के अनुसार अपनी देशभक्ति अपनी आस्तीन पर टांग कर प्रदर्शित नहीं करते।

दूसरी तरह के लोग वे होते हैं जिनकी देशभक्ति तभी जागती है जब देशभक्ति दिखाने से कुछ प्राप्ति की संभावना होती है। सूखी देशभक्ति से क्या फायदा? ऐसे ही लोग देशभक्ति के प्रदर्शन के लिए सड़कों पर उतरते हैं, देशभक्ति के नाम पर बवाल काटने को तैयार रहते हैं। ऐसे देशभक्त असली देशभक्तों का जीना मुहाल किये रहते हैं।

एक किस्म की देशभक्ति राजनीतिज्ञों की होती है। ये देश की सेवा के नाम पर बार-बार दल बदलते हैं। याद रखना मुश्किल होता है कि वे कौन-कौन से घाट का पानी पीकर आये हैं। कइयों को खुद भी याद नहीं होगा कि उन्होंने कितनी पार्टियां बदली हैं। सब कुछ देश की सेवा की दुहाई देकर होता है। देश की सेवा के लिए ये बेचारे अपने उसूल तृणवत त्याग देते हैं, ज़बान बदल देते हैं, अंतरात्मा का गला घोंट देते हैं।

बहुत से लोगों की देशभक्ति मौसम के हिसाब से बदलती है। सत्ता बदलने के साथ सत्ता की नीतियां बदलती हैं। बहुत से होशियार लोग इन्हें पढ़ते और गुनते हैं, और फिर उनको दुहने के लिए देशभक्ति का झंडा लेकर मैदान में उतर आते हैं। बहुत से लेखक और फिल्मकार यही करते हैं। इनकी देशभक्ति लाभ की संभावना के हिसाब से बढ़ती घटती है। ये मौके पर चौका लगाने वाले चतुर लोग होते हैं। जब अटल जी प्रधानमंत्री थे तब उनकी कविताओं के बहुत से गायक और प्रशंसक पैदा हो गये थे। उनके पद से हटते ही ये गायक भी ग़ायब हो गये थे। लालू यादव के एक प्रशंसक ने उन पर ‘लालू चालीसा’ लिखी थी। पुरस्कार- स्वरूप कवि जी राज्यसभा में सीट पा गये थे।

अभी चतुर लेखक सत्ता के ताकतवर लोगों पर पुस्तकें लिख रहे हैं और पर्याप्त प्रचार के साथ उनका विमोचन करा रहे हैं ताकि संदेश सही जगह पहुंच जाए और कृपा के द्वार खुल जाएं। राजाओं के ज़माने में यह काम भाट और चारण करते थे। कुछ फिल्मकार हैं जिन्हें सोते-सोते अचानक याद आता है कि देश में बहुत ज़ुल्म हुए हैं और उन पर किसी ज़िम्मेदार फिल्मकार ने फिल्म नहीं बनायी। सत्तर अस्सी साल पीछे तक दौड़ लगती है, पुराने कागज़-पत्र खंगाले जाते हैं, और साबित किया जाता है कि एक समुदाय ने दूसरे पर कितनी क्रूरता की है। नमक-मिर्च का भरपूर उपयोग होता है। भावनाओं की नदियां बहती हैं। कोशिश होती है कि उत्पीड़ित बताया गया समुदाय भीड़ों की शक्ल में सिनेमाघरों पर टूटे और सिनेमा- खिड़की पर चांदी बरसे। ऐसी फिल्मों को सत्ता का आशीर्वाद मिलता है, उन्हें मनोरंजन-कर से मुक्त किया जाता है। इसलिए खोज-खोज कर ऐसी घटनाओं पर फिल्में बनायी जा रही हैं।

यह मायने नहीं रखता कि इससे कितना आपसी सौहार्द्र बिगड़ता है, कितनी उत्तेजना फैलती है, कितना वैमनस्य होता है, आम आदमी की कितनी फजीहत होती है। फिल्मकार के लिए ये बातें निरर्थक होती हैं। वह ‘मिशन मोड’ में होता है। सच्चाई पर से पर्दा उठाना है, चाहे जो परिणाम हो। इस क्रम में गुज़रे वक्त के नेताओं को कठघरे में खड़ा किया जाता है, उनका मान-मर्दन होता है। नेताओं के लिए ये फिल्में लाभदायक होती हैं क्योंकि इनसे समुदायों में असुरक्षा की भावना बढ़ती है और वे गोलबंद होते हैं।

इन फिल्मकारों से पूछा जाता है कि वे दूसरे समुदाय के द्वारा किये गए ज़ुल्म और अन्याय पर फिल्म क्यों नहीं बनाते। जवाब मिलता है कि हर घटना पर फिल्म बनाने का ठेका हमीं ने नहीं ले रखा है। अन्य घटनाओं पर फिल्म अन्य फिल्मकारों को बनाना चाहिए। संदेश साफ है कि समझदार लोग वहीं हाथ डालेंगे जहां कुछ शहद मिलने की संभावना हो।

गनीमत यही है कि इस देश का आम आदमी शांतिप्रिय और धर्मनिरपेक्ष है और इसीलिए वह प्रोपेगंडा फिल्मों से प्रभावित नहीं होता। इन फिल्मों की कमाई के आंकड़ों से यह सिद्ध होता है। आम जनता को अच्छे कथानक और अच्छे अभिनय वाली फिल्में ही लुभाती हैं।

सत्ता के मिजाज़ के अनुसार रंग बदलने वाले और ‘जैसी बहै बयार, पीठ तब तैसी दीजे’ के सिद्धांत पर चलने वाले होशियार लोग हर युग में रहे हैं और हमेशा फलते-फूलते रहते हैं। डार्विन के सिद्धांत के अनुसार इनका ‘सर्वाइवल’ निश्चित है क्योंकि ये हर युग में ‘फ़िटेस्ट’ साबित होते हैं।

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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