श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना पलाश : फागुन की अग्नि और प्रकृति का आध्यात्मिक स्पर्श। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – आलेख # २७९ ☆ पलाश : फागुन की अग्नि और प्रकृति का आध्यात्मिक स्पर्श

भारतीय ऋतुचक्र में वसंत केवल मौसम का परिवर्तन नहीं, बल्कि प्रकृति के अंतर्मन में जागते उत्सव का समय है। इसी ऋतु में वन-वन दहक उठता है पलाश (Butea monosperma) के केसरिया फूलों से। पत्तों से लगभग रिक्त शाखाओं पर जब ये अग्नि-सी आभा लिए पुष्प खिलते हैं, तब दूर से पूरा वन मानो दीपशिखाओं से आलोकित दिखाई देता है। इसीलिए पलाश को ‘वनाग्नि’ या ‘जंगल की ज्वाला’ भी कहा गया है।

भारतीय परंपरा में पलाश केवल एक वृक्ष नहीं, बल्कि पवित्रता और ऊर्जा का प्रतीक माना गया है। वैदिक अनुष्ठानों में इसकी लकड़ी और पत्तों का उपयोग होता रहा है। कहीं इसे यज्ञ की पवित्र अग्नि का प्रतीक माना गया, तो कहीं यह आस्था और तप की आभा से जुड़ गया। लोकविश्वास यह भी कहता है कि इसके केसरिया फूलों में तप, त्याग और उत्सव — तीनों का संगम दिखाई देता है।

फागुन के दिनों में जब कई वृक्षों से पत्ते झर जाते हैं और वन का स्वर कुछ विरल-सा लगने लगता है, तभी पलाश अपनी दहकती छटा से उस सूनेपन को भर देता है। उसकी शाखाएँ जैसे घोषणा करती हैं कि जीवन की अग्नि कभी बुझती नहीं, वह समय-समय पर नए रंगों में प्रकट होती रहती है। यही अनुभूति कवि के मन में दोहों के रूप में प्रस्फुटित होती है—

*

वन में खिले पलाश जब, धधके जैसे धाम।

प्रकृति रचाए अग्नि सा, रंगों वाला ग्राम॥

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पात झरे सब वृक्ष के, सूना लगे समाज।

खिलते हुए पलाश से, वन में बना सुराज॥

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टेसू की ये आग सी, डाली-डाली झूम।

धरती में जैसे मचे, फागुन वाली धूम॥

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रंग केसरी फूल का, जिससे जगे उजास।

सूखे मन में भी हुआ, आशा का विश्वास॥

*

वन में टेसू बोलता, सुनते सारे लोग।

धरा सजाए दिव्यता, भक्ति भाव संजोग॥

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दरअसल पलाश का खिलना केवल प्रकृति का दृश्य नहीं, बल्कि एक सूक्ष्म आध्यात्मिक संकेत भी है। यह हमें स्मरण कराता है कि जैसे सूखी शाखाओं पर भी अग्नि-सी आभा वाले फूल खिल उठते हैं, वैसे ही जीवन के निर्जन क्षणों में भी आशा और प्रकाश का उदय संभव है। शायद यही कारण है कि फागुन की हवा में झूमता पलाश हमें प्रकृति के साथ-साथ ईश्वर की सृजनात्मक लीला का भी आभास कराता है।

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©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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