श्रीमती शशि सराफ
(श्रीमती शशिसुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता ‘मेरा रचयिता…‘।)
☆ शशि साहित्य # २१ ☆
कविता – मेरा रचयिता… ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ
बड़े मनोयोग से सुना रहे थे हम ,दास्तां अपनी,
चीत्कार सुन हड़बड़ा कर होश जो आया.
यह अजनबी मंजर नया नया सा था,
यह कुछ और नहीं!!!
अपने उन्ही शब्दों को,
लहुलुहान हो, चोट खाकर लौटते देखा..
ना टटोल मेरे मन को,
कि दोबारा सुनाऊं हाल,
अब तो खुद से भी कुछ कहने का अब मन नहीं..
शिकवा तो अब किसी से, कैसा भी नहीं.
हजारों साल से खड़े पत्थरों में,
धड़कनें सुनने की झूठी ख्वाहिश…
यह खता मेरी है, किसी और की तो नहीं..
मेरा सारा मनुहार, यूं व्यर्थ हो गया,
सींच कर खुद को,मेरे आंसुओं से,
वह और भी मजबूत हो गया.
अब मैं हूं और सिर्फ मेरा रचयिता,
वह अच्छा-अच्छा लिख रहा..
और मैं खुश होकर पढ़ रही.
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© श्रीमती शशि सराफ
जबलपुर, मध्यप्रदेश
≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈




