स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”
(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया। वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – संकल्पित रहो…।)
साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २८२ – संकल्पित रहो… – १
लूट, हत्या, बलात्कार
आज/समाज
बेशर्मी की चादर ओढ़कर सो गया है
इसीलिये भ्रष्टाचार/ राष्ट्रीय धर्म हो गया है।
ईमान को दकियानूसी
और अहिंसा को कहा जा रहा है
कायरता का पर्याय
हाय!
क्या हो गया है मुझे और मेरे देश को
कौन तोड़ेगा जड़ता के परिवेश को?
शायद
झंकृत हो रहे हैं कृष्ण चेतना के तार
खुल रहे हैं किरनों के द्वार
कोई कहता है
कैसे हुआ होगा/ सृष्टि का जन्म और विस्तार
और हर बार कैसे होता है संहार!
है
अन्तः करण होता है मुखर
निकलते हैं स्वर
जब सम्बन्धों की सुगंध चुक जाती है।
जीवन की प्रगति रुक जाती है
और आरंभ होता है/ महाप्रलय महाविनाश
काश ! हम सोचते
कि हम अमृतपुत्र हैं
हमारी जिन्दगी वरदान है बाजार नहीं
और हम
मनुष्य हैं चीज नहीं
मगर हमें इतना भी तमीज नहीं
हम भूलते हैं भ्रमते हैं
और बाट जोहते हैं।
किसी अवतार की
गौतम, महावीर शंकराचार्य
या गाँधी की
या किसी चमत्कारिक आँधी की ।
दोस्तो!
चमत्कार एक भ्रम है
अट्टू अथक श्रम ही
परिवर्तन का उद्गम है।
संकल्पित रहो
आतंक का अंगुलिमाल
शरण में आयेगा
मन की दृढ़ता से
पूरा पर्यावरण शुद्ध हो जायेगा।
क्रमशः…
स्व डॉ. राजकुमार “सुमित्र”
साभार : डॉ भावना शुक्ल
112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश
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