श्री श्याम खापर्डे
(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “एक अधूरा ख्वाब…”।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २६३ ☆
☆ # “एक अधूरा ख्वाब…” # ☆
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पूर्णिमा की रात थी
चांदनी की बरसात थी
चांद आसमान में खिला हुआ था
सितारों से जाकर मिला हुआ था
चंद्र किरण के लिए जो प्यासा था चकोर
जन्मों की प्यास बुझाकर हो रहा था विभोर
रातरानी की सुगंध महक रही थी
सुप्त भावनाएं धीरे-धीरे बहक रही थी
चांदनी रात में हम दोनों थे साथ में
बरसती चांदनी में हाथ थे हाथ में
पारिजात की गंध में बेसुध वो छुई-मुई
केवड़े के तने से जैसे लिपटी नागिन हो कोई
मादक पवन में मदहोश चमन में
अंगारे दहक रहे थे दोनों के बदन में
आगोश में एक दूसरे के खोए हुए थे
नाग नागिन से लिपटकर सोए हुए थे
मध्य रात्रि में कोई प्रेम राग गा रहा था
सारी कायनात पर नशा छा रहा था
ना संसार की चिंता ना खुद की खबर थी
पहलू में सोए चांद के चेहरे पर नजर थी
रात की खामोशी दे रही थी सदाऐं
प्रीत के गीत गा रही थी सारी दिशाएं
पता ही नहीं चला कब रात ढल गई
भोर की लालिमा प्रीत को छल गई
बिछड़ने की पास जब आई घड़ी
उसके नैनों से अश्रु की लग गई झड़ी
वो बेख़बर बेहोशी में गई मुझे छोड़कर
अरमानों से भरा मेरा मासूम सा दिल तोड़ कर
एक मधुर सा सपना नींद में ही टूट गया
एक अधूरा ख्वाब नींद और चैन दोनों लुट गया /
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© श्याम खापर्डे
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≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈




