स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”
(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया। वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – मत समझ हमको पराया…।)
साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २८३ – मत समझ हमको पराया…
कह कि तुझ पर
क्या विपत आई
कि तेरी आँख भर आई?
मत समझ हमको पराया
बोल दे भाई
गाँठ मन की खोल दे भाई ।
कह कि कुछ तू आपनी बीती
कुछ तू और की बीती
प्रमिल
सुन कि
कि
साथ में आजा, उड़ा मौजें
बाद में तस्वीर हम खोजें
कि तुझ पर कष्ट कैसा आ पड़ा है
अरे भाई, बैठ भी तो जा
एक
कि तू कब से खड़ा है
बोझ मन भर का रखे मन पर
भला क्या सोच पायेगा ?
अँधेरा आँख में आँखें
भला किस ओर जायेगा ?
बात अब तेरी समझ में आ गई होगी
मैं यही समझा
कि तेरे इरादों पर
कोई मुसीबत छा गई होगी।
स्व डॉ. राजकुमार “सुमित्र”
साभार : डॉ भावना शुक्ल
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