डॉ.राजेश ठाकुर
( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का मंतव्य उनके ही शब्दों में – “पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना “मस्ताने…“.)
साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # ३१
कविता – मस्ताने… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर
=1=
लेकर के छुट्टी घर में वो सुस्ताने चले हैं
अंगड़ाई लेके देखिये मस्ताने चले हैं
=2=
कोई सबूत हाथ न लग जाए इसलिए
पहन वो दोनों हाथ में दस्ताने चले हैं
=3=
अदालतों में पैसे देके धुलते पाप हैं
फ़िर क्यों वे गंगाघाट पे नहाने चले हैं
=4=
फ़रमाया बेवड़े ने इक, सफ़ाई में अपनी
ख़ुद-ब-ख़ुद क़दम उफ़ मयखाने चले हैं
=5=
हालात अपने घर के जो सम्हाल न सके
दुनिया को ‘राजेश’ वो समझाने चले हैं
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© प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर
शासकीय कॉलेज़ केवलारी
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