डॉ.राजेश ठाकुर
( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का मंतव्य उनके ही शब्दों में – “पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना “सावन का अंधा…“.)
साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # ४२
कविता – सावन का अंधा… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर
मुझको हरा ही हरा दिख रहा है
मैं सावन का अंधा हुआ जा रहा हूँ ll
प्रभारों के बोझों से इतना लदा हूँ, हम्मालों का कंधा हुआ जा रहा हूँ ll
मैं सावन का…
=1=
रंगा न लहू से, वो अख़बार कैसा
हिंसा क़त्ल चोरी कपट काला पैसा
कालाबाज़ारी दलालों की मण्डी, मैं उफ़ गोरखधंधा हुआ जा रहा हूँ ll
=2=
डायनिंग सैट सोफा किचन सैट सब हैं, अपसैट माइण्ड चुप्पी साधे लब हैं
फँसते चुनिन्दा ही जालों के फन्दे, मैं बेबस परिन्दा हुआ जा रहा हूँ ll
मैं सावन का…
=3=
चंदा जुटाने में मशगूल बंदा, ज़माना बख़ाने भले इसको गंदा
मुनाफ़े की अब न गुंज़ाइश तनिक़ भी, मैं बिजनिस इक मन्दा हुआ जा रहा हूँ ll
मैं सावन का….
=4=
‘राजेश’ मन-ही-मन, बेशुमार प्यार भी, पर हो न पाया कभी दिल से इज़हार भी
चुपके तकिये में छुपाके पढ़ें कई, मैं यूँ गुलशन नंदा हुआ जा रहा हूँ ll
मैं सावन का…
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© प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर
शासकीय कॉलेज़ केवलारी
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