आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’
(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि। संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – एक साथ देश की कुशल सदा मनाइए।।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २९० \ ☆
☆ एक साथ देश की कुशल सदा मनाइए।। ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆
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एक साथ, उठा माथ देश गीत गाइए
ज़िंदगी स्वतंत्रता है सत्य मत भुलाइए
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शीश कटे, लोग लुटे तब मिली स्वतंत्रता
सरफ़रोश नहीं हटे तब मिली स्वतंत्रता
याद करें फख्र से, न फर्ज भूल जाइए
ज़िंदगी स्वतंत्रता है नित्य गुनगुनाइए
एक साथ, उठा माथ देश गीत गाइए
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गोद सूनी हो गई, न आह होंठ ने करी
चाक-चाक दिल हुआ, न माँग फिर कभी भरी
सीखिए सबक, न अश्रु आँख से बहाइए
काम आएँ देश के, न देश बेच खाइए
एक साथ, उठा माथ देश गीत गाइए
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राजनीति राज की, न काज की तनिक रही
लोक नीति लोभ नीति, शोक नीति हो रही
अपनी वंश बेल को काक्रोच मत बनाइए
अदालतों में न्याय का मजाक मत उडाइए
एक साथ, उठा माथ देश गीत गाइए
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बेचना-खरीदना न जीत सत्य की कभी
संसदों में बैठ कर न बात करें दोमुही
नीर-क्षीर कभी कहीं, हो रहा दिखाइए
दीन-हीन को गले, अभी यहीं लगाइए
एक साथ, उठा माथ देश गीत गाइए
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जात-धर्म में न बाँट, काट-छाँट मत करें
मंदिरों में भक्ति हो, बजार-हाट मत करें
तीर्थ में न मद्य की नदी कभी बहाइए
किसान को, मजूर को, हुजूर मत रुलाइए
एक साथ, उठा माथ देश गीत गाइए
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© आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’
१५.८.२०२६
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