स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”
(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया। वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – प्रायमरी का मास्टर…३।)
साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २९८ ☆
☆ – प्रायमरी का मास्टर…३ ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”
शायद आप कहें-
‘क्या मास्टरों ने तुझे
वकील किया है ?’
जी माई बाप
न तो मैं वकालत पढ़ा हूँ और
न किसी ने मुझे वकील किया है
मैं मास्टर हूँ, मैंने खुद ‘फील‘
किया है
लेकिन क्या कहें अपने राज को ?
क्या कुछ भी नहीं सूझता
इस बीसवीं सदी के सभ्य समाज को?
यह ठीक है कि हम दोषी ठहरा सकते हैं
ब्रिटिश राज को।
अब तो अपना ही राज है
जनता ही राजा है
तो ये वक्त का तकाजा है
कि समय रहते चेतना चाहिये
अपने शासन को,
कि ‘राष्ट्र का निर्माता‘ तरसता न रहे
दवा वस्त्र या राशन को।
कि अपनी सरकार करेगी कुछ विचार
मगर इसी संदर्भ में
एक कड़ी बात याद आती है-
कि भरोसे की भैंस
वैसे तो मुझे है भरोसा
अक्सर
पड़ा ही ब्याती है। इसलिये
समाज से भी कुछ कहना।
मेरा फर्ज है।
क्रमशः…
स्व डॉ. राजकुमार “सुमित्र”
साभार : डॉ भावना शुक्ल
112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश
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