श्री सुरेश पटवा
(श्री सुरेश पटवा जी भारतीय स्टेट बैंक से सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों स्त्री-पुरुष “, गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर।)
यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – पग-पग नर्मदा यात्रा – भाग- ४६ ☆ श्री सुरेश पटवा
7.पग-पग नर्मदा यात्रा
नर्मदा परिक्रमा:दूसरा चरण
पिपरहा से सतधारा 14 नवम्बर 2019
पिपरहा में नर्मदा का एक रेतीला किनारा है। आश्रम व्यवस्था बहुत अच्छी है रात को स्वामी जी के सेवक ने स्वादिष्ट खिचड़ी खिलाई। रास्ते में गन्ने और तुअर की खड़ी फ़सल के अलावा कुछ न दिखता था। गुड़ की चरखी सक्रिय होने लगीं। तीन बड़े कड़ाह लाइन से बनाए, उनके नीचे आग जलाने हेतु ख़ाली जगह आगे तक चली गई है, आख़िर में धुँआ निकलने की चिमनी है जिनसे धुँआ निकल रहा था। पूरे भारत में करेली मंडी का गुड़ मशहूर है। गुड़ की दो और मंडी श्रीधाम और नरसिंहपुर में चालु हो गईं हैं। मंडी में किसान का गुड़ तीस-पेंतीस रुपए किलो बिकता है वह लोगों तक पहुँचते-पहुँचते सौ रुपए किलो हो जाता है। एक सहयात्री मुंशीलाल भाई ने एक किलो गुड़ और एक किलो तुअर दाल ख़रीदी, दूसरे जगमोहन भाई ने बीज रहित हल्के हरे रंग के भटे लेकर पिट्ठु बेग में रख लिए।
रास्ते में बहुत से परिक्रमा वासी मिले वे सब के सब कहार, ढीमर, नाई, विश्वकर्मा या पिछड़े वर्ग के थे। कोई भी ब्राह्मण, वैश्य, क्षत्रि, ठाकुर यहाँ तक कि कोई लोधी परिक्रमा शुरू करता या यात्रा करता नहीं मिला। परिक्रमा किसी मन्नत या जन्नत की कामना से की जाती है इसलिए नर्मदा के प्रति अगाध आस्था उनका अवलंबन होता है, उनकी प्रेरणा होती है। वे लट्ठा कपड़े की दो आधी लुंग्गी, दो आधी बाँह के कुर्ते के साथ उसी कपड़े से सिला दो तरफ़ा लटकन झोला काँधे पर लटकाते हैं, जिसमें दो शीशियों में नर्मदा जल और पूजा का सामान रखा रहता है। एक लोटा और गिलास होना ज़रूरी होता है। हाथ में एक छड़ी जिसे वे सुखनाथ कहते हैं उनका आभूषण है। कई नंगे पैर, कुछ चप्पल और कुछ प्लास्टिक जूते पहने मिले।
नर्मदा की छाती को छलनी करते रेत माफ़िया के कारिंदे दिखे उनसे बातें करने पर रेत माफ़िया कारोबार समझ आया। बीच नदी से रेत निकालने वाले को 250 रुपए, नाव से डंपर में भरने वाले को 200 रुपए मिलते हैं। एक डंपर के माफ़िया किंग को बाज़ार से 5000 रुपए मिलते हैं। 450 की लागत में 350 का डीज़ल जोड़ लें तो 4200 रुपयों का लाभ एक डंपर पर होता है। ऐसे पाँच फेरों पर 21000 रोज़ाना का धंधा है। पकड़े जाने का कोई डर नहीं क्योंकि पूरा काम दूसरों से कराया जाता है। यदि कारिंदे पकड़े भी गए तो पुलिस, प्रशासन, नेता विधायक किसी को गवाह नहीं बनने देते, कोई अड़ा तो उसकी लाश नर्मदा जी की भेंट चढ़ जाती है, अब प्रेस के लोग भी सक्रिय भागीदार हैं। इस महान देशभक्ति पूर्ण राष्ट्रवाद में दोनों राजनैतिक दलों के नेताओं और कार्यकर्ताओं में आपसी समझ से मिलीभगत विकसित होकर एक तंत्र का रूप ले चुकी है। नेता, पुलिस, अधिकारी, मिडिया इन सभी के परिजन, चंगु-मंगू सरकारी ठेकेदार या बिल्डर-कालोनाइजर्स, इन सभी को मुफ्त के भाव की रेत-गिट्टी-पत्थर-लकड़ी-जमीन मिलती है। इन दबंगों पर हाथ डालने की हिम्मत कौन करे, जो करे वो पिटे, मंत्री का दर्जा प्राप्त कम्प्यूटर बाबा भी नाकाम हैं। छोटी नदियों की बर्बादी के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता। चम्बल इलाके में ठाकुर मूंछ पर ताव देकर चम्बल में उत्खनन कर रहे हैं, सालों से रोकने की घोषणाएं हो रही हैं लेकिन होता कुछ नहीं, जो रोकने की हिमाकत करता है उस पर ट्राली चढ़ा दी जाती है। कई पुलिस, सरकारी अधिकारी जान गँवा चुके हैं। सभी नदियों की यही दुर्दशा है। स्वार्थ में अंधे लोग धरती माँ की छाती का सारा दूध निचोड़ कर उसे मरने के लिए छोड़ देंगे। स्थिति वाकई भयावह हैl गर्मियों में जगह जगह नर्मदा जी का प्रवाह रुक जाता है। बरगी डेम से अमावस्या/पूर्णिमा पर स्नान के लिए पानी छोड़ा जाता हैl अत्यधिक उत्खनन के कारण नर्मदा जी की जल धारण क्षमता कम हो गई है। सहायक नदियों का बारिश के बाद सूख जाना, जंगल की अत्यधिक कटाई जैसे कारक इसके लिए प्रमुख रूप से जिम्मेदार है।
शेर नदी अब तक नरसिंघपुर करकबेल के बीच ट्रेन से घरघराते हुए देखी थी जो लखनादौन के दक्षिणी पूर्वी जंगल में बटका से निकलती है हर्रई जागीर का घेर लगाकर नर्मदा से मिलने नीचे भागती है। रातीकटार गाँव के निकट नर्मदा में मिलती है। उसे नज़दीक से देखा, शेर नदी को नाव से पार किया। जहाँ मिलन होता है वहाँ ऐसा लगा मानो नर्मदा भी उत्तरी तट से दौड़कर शेर को गले लगाने भागती आई है, प्रेम की गहराई का नाप नहीं होता। नर्मदा-शेर मिलन स्थल का संगम बहुत गहरा था। वहाँ से बरमान राजमार्ग पुल दिखने लगा तो यात्रियों में ऊर्जा का संचार होकर क़दम तेज़ हो गए और बारह किलोमीटर की रुकरूक कर यात्रा पाँच घंटों में पूरी करके तीन बजे सतधारा पहुँच गए। जब सारे साथी नहाकर पूजा कर रहे थे, मन-मस्तिष्क में कुछ ऐसे विचार उभर आए।
हमारा धर्म हमें समग्रता में प्रकृति के प्रति कृतज्ञता प्रकट करना सिखाता है। वैदिक सभ्यता हमें प्रकृति के चर यथा पृथ्वी, अग्नि, अरुण, वरुण, आकाश और इंद्रियों के रूप में हमारे शरीर में मौजूद इन तत्वों के स्वामी मन स्वरुप इंद्र के प्रति यज्ञों से “तेरा तुझको अर्पण” करना सिखाता है। उपनिषद हमें आत्मा-परमात्मा से मिलाकर आध्यात्मिकता की रहस्यमयी दुनिया की दार्शनिक सैर कराते हैं। षठ दर्शन के निचोड़ स्वरुप वेदान्त दर्शन के आधार पर रचे पुराण जन साधारण को यज्ञों की कठिन दुरुह प्रक्रिया से हटाकर और आध्यात्मिकता की तर्क-वितर्क सघनता से बचाकर आश्चर्य जनक क़िस्से कहानियों के माध्यम से कर्म-अकर्म, धर्म-अधर्म, जन्म-पुनर्जन्म और निष्काम कर्म का अभ्यास कराते हुए वेदों के अरुण, वरुण, अग्नि, पृथ्वी, पेड़-पौधों, पशु-पक्षियों और नदियों की पूजा का पाठ पढ़ाते हैं। इसीलिए नर्मदा को देवी मानकर पूजना प्रकृति के प्रसाद जल तत्व जो 70% परिमाण में हमारे शरीर में जीवन की नैया खेता है, के प्रति कृतज्ञता प्रकट करना है। वेदों में वर्णित प्रकृति याने प्रथम-कृति के स्वामी रुद्र पुराणों में शिव हो गए हैं। नर्मदा का हरेक कंकड़ शंकर की तरह पूजनीय हो गया। लोकआस्था के पक्ष में इससे बड़ा कौन सा तर्क हो सकता है। नर्मदा के प्रति पूज्य भावना जीवन के प्रति आस्था की प्रतीक है। हिंदू धर्म कृतज्ञता पर टिका है, कृतघ्नता पर नहीं। सेमेटिक धर्म के अहमन्य कृतघ्न लोगों ने प्रकृति चरों की उपेक्षा से अपने देशों को सुलगते रेगिस्तान बना लिए हैं, भारत अभी भी सुजलाम-सुफलाम है।
क्रमशः…
© श्री सुरेश पटवा
भोपाल, मध्य प्रदेश
≈ संस्थापक सम्पादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈


