श्रीमती सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’
(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “जल संरक्षण”।)
☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २७९ ☆
🌻लघु कथा🌻 🪴परोपकार 🪴
चमचमाती कार से उतर सीधे चौराहे पर बने स्टेज पर पहुंचे अतिथि महोदय का सभी ने ह्दय से स्वागत अभिनंदन किया। आगे आने पुष्प हार पहनाने की होड़ मची थी। सोशल मीडिया का समय तस्वीरें भी खींची जा रही थी। गाँव में अत्यंत आत्मियता के साथ आयोजन को मनाया जा रहा था।
अतिथि महोदय ने प्रणाम स्वीकार करते, प्रणाम करते अपना भाषण आरंभ किया— जीवन में सेवा का अवसर जब भी आए खोना नही चाहिए। जब कभी मिले उसे जरुर कर लेना चाहिए।परोपकार करते ही रहना चाहिए।
अब मुझे ही देखिए – – – मैनें शहर में एक वृद्धा आश्रम का शुभारंभ किया और सर्व प्रथम मैनें अपनी ही माँ को वृध्दाआश्रम में रहने भेज दिया।
बात सुनते ही खुसुर-पुसुर होने लगी। पंडाल खाली होते देर न लगी। अतिथि महोदय समझ पाते–किसी ने पीछे से आवाज लगाई। ऐसे परोपकार से हम गाँव वाले बिना परोपकार के भी रह सकते हैं।
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© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





