श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  जी के आभारी हैं जो  साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास  करते हैं।

आज प्रस्तुत है  नौशाद जी द्वारा लिखित  “आठवाँ सुर” पर चर्चा।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा#  २१७ ☆

☆ “आठवाँ सुर” – लेखक – नौशाद ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

(किताब उपलब्ध करवाने हेतु, आभार Kavita Kafe UK – कविता कैफ़े यूके)

कृति – आठवाँ सुर

लेखक – नौशाद 

चर्चा : विवेक रंजन श्रीवास्तव, (लंदन)

☆ संगीत के उस्ताद का शब्द-संसार : ‘आठवाँ सुर’ – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

नौशाद अली को हम हिंदी सिनेमा के महान संगीतकार के रूप में याद करते हैं। बैजू बावरा, मुगल-ए-आज़म, मदर इंडिया, अनमोल घड़ी जैसी फिल्मों का संगीत उनकी पहचान है।

लेकिन जब संगीत का यह जादूगर शब्दों के संसार में प्रवेश करता है तो पता चलता है कि उसके भीतर एक संवेदनशील शायर भी था। ‘आठवाँ सुर’ इसी शायर नौशाद अली से हमारा परिचय कराती है। पुस्तक उनकी शायरी का संग्रह है, जिसमें ग़ज़ल, शेर और आत्मानुभूति के स्वर एक साथ दिखाई देते हैं।

‘आठवाँ सुर’ शीर्षक अपने आप में बड़ा अर्थपूर्ण है। भारतीय संगीत में सामान्यतः सात स्वरों की चर्चा होती है, लेकिन नौशाद के लिए जीवन के अनुभवों, प्रेम, विरह, स्मृति, पीड़ा और मृत्यु से निकली अनुभूति जैसे किसी अनसुने आठवें स्वर की तरह है। यही स्वर उनकी शायरी में सुनाई देता है। संगीतकार नौशाद ने फिल्मों में सुरों से भावों को व्यक्त किया था, शायर नौशाद शब्दों से वही काम करते हैं। शायद यही कारण है कि उनकी ग़ज़लों में भी एक लयात्मकता सहज रूप से नज़र आती है।

 नौशाद की शायरी केवल प्रेम की रूमानियत तक सीमित नहीं है। उसमें जीवन की नश्वरता, बिछोह, स्मृति, आत्मसंवाद और मृत्यु का बोध भी है। एक जगह वे लिखते हैं   —

“क्यों मिली थी हयात याद करो

याद रखने की बात याद करो।”

दो छोटे-से मिसरे हैं, लेकिन इनके भीतर पूरी जिंदगी का प्रश्न खड़ा हो जाता है। जीवन क्यों मिला था? हमने उसका क्या किया? और जाते-जाते क्या याद रह जाएगा? यह प्रश्न शायर स्वयं से भी करता है और पाठक से भी।

इसी तरह उनका एक और शेर है—

“इक बे-क़रार दिल से मुलाक़ात कीजिए

जब मिल गए हैं आप तो कुछ बात कीजिए।”

यहाँ भाषा सहज है, लेकिन भाव में गहराई है। ‘बेकरार दिल’ और ‘मुलाकात’ जैसे पारंपरिक ग़ज़ल के रूमानी शब्दों के माध्यम से नौशाद उस आत्मीय क्षण को पकड़ लेते हैं जिसमें मिलने के बाद भी मन की बात कहने की बेचैनी बनी रहती है।

 संग्रह की विशेषता इसकी सादगी है। नौशाद कठिन शब्दावली या चमत्कारपूर्ण बिंबों के पीछे नहीं भागते। वे उर्दू ग़ज़ल की परंपरा में रहते हुए भी अपनी बात को अपेक्षाकृत सीधे ढंग से कहते हैं। प्रेम है तो उसमें आत्मीयता है, विरह है तो उसमें पीड़ा है, स्मृति है तो उसके साथ एक कसक है। इसीलिए उनके शेर पढ़ते हुए ऐसा नहीं लगता कि कोई केवल शायरी कर रहा है। लगता है जैसे कोई अपने जीवन का हिसाब-किताब पाठकों के सामने रख रहा हो।

उनकी शायरी की जड़ें परंपरा में हैं और वे स्वयं इस परंपरा से अनजान नहीं थे। पुस्तक के एक पृष्ठ पर उनका आत्मव्यंग्य पूर्ण शेर है—

“करना है शायरी अगर ‘नौशाद’

‘मीर’ का कुल्लियात याद करो।”

यह केवल मीर के प्रति श्रद्धांजलि नहीं, बल्कि अपनी शायरी की सीमाओं की विनम्र स्वीकृति भी है। रचनाकार की पहचान इसी विनम्रता से होती है कि वह अपने पीछे खड़ी महान परंपरा को पहचानता है। नौशाद यहाँ अपने लिए भी एक कसौटी निर्धारित करते दिखाई देते हैं।

पुस्तक के आरंभिक पृष्ठों में आया उनका आत्मीय संस्मरण भी संग्रह को केवल शायरी की किताब नहीं रहने देता। उसमें परिवार, मृत्यु, स्मृति और अपने प्रियजनों से जुड़ा ऐसा मार्मिक प्रसंग आता है, जहाँ चार पंक्तियों में उनकी निजी पीड़ा कविता बन जाती है

“फिर उसी तरह कलेजे से लगा लो मुझको

गिरती दीवार हूँ लिल्लाह सँभालो मुझको।”

और आगे—

“जिसने फल-फूल दिये, प्यार दिया, साया दिया

मैं वही पेड़ हूँ मरने से बचा लो मुझको।”

यहाँ ‘पेड़’ केवल पेड़ नहीं रह जाता। वह जीवन, परिवार, आश्रय और बीतती उम्र का प्रतीक बन जाता है। यह प्रसंग पढ़ते हुए लगता है कि संगीतकार नौशाद के भीतर का शायर अपने जीवन के अंतिम सत्य से संवाद कर रहा है।

‘आठवाँ सुर’ की शायरी में याद एक महत्वपूर्ण भाव है। वे बीते हुये समय की बार-बार याद करते है। कभी प्रेम की याद के रूप में, कभी किसी बिछुड़े व्यक्ति की स्मृति बनकर और कभी अपने ही अतीत के आईने की तरह। एक शेर में वे कहते हैं—

“मैं लाख ढूँढूँ उसे ढूँढने से क्या होगा

मेरी तलाश में वो भी तो खो गया होगा।”

यहाँ तलाश का द्वंद्व बहुत सुंदर है। जिसे हम खोज रहे हैं, संभव है वह भी हमें खोजते-खोजते कहीं खो गया हो। प्रेम की यह पारस्परिक विडंबना शेर को साधारण विरह से उठाकर जीवन की व्यापक अनुभूति बना देती है।

नौशाद की शायरी का एक और महत्वपूर्ण पक्ष समय और मृत्यु का बोध है। जीवन को वे स्थायी उपलब्धि की तरह नहीं देखते। उनके यहाँ संसार आता-जाता है, रिश्ते बनते-बिगड़ते हैं और अंततः मनुष्य स्मृतियों में बदल जाता है। यही दृष्टि उनकी शायरी को केवल प्रेम-कविता का संग्रह बनने से बचाती है।

इस दृष्टि से ‘आठवाँ सुर’ को नौशाद के संगीत से अलग करके देखना भी उचित नहीं होगा। संगीत में उन्होंने भारतीय शास्त्रीय परंपरा को लोकप्रिय सिनेमा की भाषा में प्रतिष्ठित किया, शायरी में उन्होंने उसी सांस्कृतिक संस्कार को शब्दों का रूप दिया। उनके संगीत की तरह उनकी शायरी में भी माधुर्य, अनुशासन और भाव प्रधानता दिखाई देती है। किताब से गुजरते हुए नौशाद की रचनात्मक दुनिया में संगीत और कविता दो अलग-अलग धाराएँ नहीं, बल्कि एक ही संवेदनशील मन से निकले दो स्वर समझ आतें हैं। उनके जीवन और कला की यही बहुआयामी पहचान उन्हें विशिष्ट बनाती है।

‘आठवाँ सुर’ पढ़ते हुए सबसे सुखद बात यह लगती है कि यहाँ एक प्रसिद्ध संगीतकार अपने स्थापित व्यक्तित्व का सहारा लेकर शायर बनने की कोशिश नहीं करता। वह अपने शब्दों के बल पर सामने आता है। कहीं वह प्रेमी है, कहीं विरही, कहीं आत्मालोचक, कहीं जीवन से सवाल करता हुआ मनुष्य और कहीं अपनी स्मृतियों में लौटता हुआ वृद्ध। यही मानवीयता इस संग्रह को मूल्यवान बनाती है।

अनुमान लगा सकता हूं कि ये संग्रह उनके जीवन के लंबे सफर में मन का चैन ढूंढने का, समय समय पर कागज पर अभिव्यक्त प्रयासो का संकलन है।

नौशाद के संगीत को सुनते हुए हम उनके सुरों के जादू में खो जाते हैं,  ‘आठवाँ सुर’ पढ़ते हुए उन्हीं सुरों के पीछे छिपे मनुष्य से हमारा परिचय होता है। सात सुरों के महान साधक ने शब्दों में जो अतिरिक्त स्वर खोजा, शायद वही इस पुस्तक का ‘आठवाँ सुर’ है, एक ऐसा स्वर, जिसे कानों से कम और मन से अधिक सुना जा सकता है।

उन्हें श्रद्धांजलि

#लंदन_डायरी, #पुस्तक, #bhawan

चर्चाकार… विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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