कविराज विजय यशवंत सातपुते

 

(आज प्रस्तुत है कविराज विजय यशवंत सातपुते जी  की पश्चिमी महाराष्ट्र एवं अन्य स्थानों में हो रही सतत वर्षा के कारण प्रलय की जो स्थिति बन पड़ी है उस स्थिति से व्यथित हो कर लिखी गई सामयिक कविता महापूर. . . ! e-abhivyakti परिवार की संवेदनाएं समस्त महापूर से पीड़ित लोगों के साथ है। साथ ही हम उन सभी हाथों के जज्बे को सलाम करते हैं जो उनकी सहायता के लिए बढ़े हैं।)  

 

☆  महापूर. . . ! ☆

 

जीवन म्हणून     लागे हुरहूर

काळजाचा धूर    महापूर.

 

मोसमी वा-याने    आला धुवाधार

करी हाहाकार     महापूर.

 

धन, धान्य,पशू     कुणी ना वाचले

डोळ्यात साचले    दुःख, दैन्य.

 

पश्चिम पट्ट्यात   महाराष्ट्र प्रांती

जाहली का वांती  जीवनाला .

 

नदीच्या पाण्याने    व्यापले जीवन

तन, मन,  धन,      पाणावले.

 

ओल्या दुष्काळाने    झाली वाताहात

मदतीचे हात           पुढे आले.

 

निसर्गाच्या पुढे       वाकला माणूस

नको ना येऊस        अविनाशी.

 

येणे जाणे तुझे        आसवांच्या  सरी

आठवांच्या घरी     महापूर.

 

✒  © विजय यशवंत सातपुते

यशश्री, 100 ब दीपलक्ष्मी सोसायटी,  सहकारनगर नंबर दोन, पुणे 411 009.

मोबाईल  9371319798.

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