श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “चातुर्मास …“।)
अभी अभी # १०५२ ⇒ आलेख – चातुर्मास
श्री प्रदीप शर्मा
घंटा, मिनिट और सेकंड करते करते, दिवस, मास और बारहमास व्यतीत हो जाता है। इसी तरह पल करते हमने ज़िन्दगी के कितने वर्ष गुज़ार दिए। क्या खोया, क्या पाया, इस पर सोचने का वक्त अभी नहीं आया।
एक समय था, जब बारिश के समय में जीवन ठहर सा जाता था। आवागमन के साधन सीमित रहते थे। सड़कें पक्की नहीं थी। फ्लाई ओवर, रेलवे की सुविधा और आकाश मार्ग केवल महानगरों तक के ही लिए उपलब्ध था। विदेश यात्रा को bon voyage यानी शुभ विदेश यात्रा कहा जाता था, जिसमें समंदर पार बाहर जाया जाता था।।
साधु संत, महात्मा इस चातुर्मास में एक ही स्थान पर रहकर साधन भजन, ध्यान धारणा, कथा प्रवचन किया करते थे, जिसका लाभ श्रद्धालु जनता को मिल जाया करता था। सभी व्रत, उपवास, सत्संग इसी दौरान संपन्न होते थे। यही सनातन परम्परा आज भी अनवरत चली आ रही है।
लेकिन प्रकृति के इस क्रम में इस बार एक ऐतिहासिक बदलाव आया, जिसका न तो किसी को पूर्वानुमान था न ही किसी भविष्यदृष्टा की कोई चेतावनी। अचानक कोविड 19 ने हमला बोला और पूरी दुनिया को घर बैठा दिया। आप इसे आपातकालीन चातुर्मास भी कह सकते हैं। जिनका एक एक मिनिट कीमती था, वे बीस सेकंड तक केवल हाथ ही धोते रहते थे। वह भी एक बार नहीं, दिन में कई बार।
अगर कोरोना नहीं होता, तो उनके लिए मानसिक चिकित्सालय के दरवाज़े खुले हुए होते।।
मेरा चातुर्मास अभी भी कायम है ! नदी नारे न जाओ श्याम पैंया पड़ूं की तर्ज पर अनावश्यक बाहर न जाओ श्याम पैंया पड़ूं वाला निवेदन रोज सुनने को मिलता है। ध्यान धारणा बहुत हो गई, शायद यही एक सच्चे वानप्रस्थी की निशानी भी है। यानी बिना कुछ किए आसानी से तीसरे आश्रम में प्रवेश।
केश, जटा, दाढ़ी और वक्त किसी का इंतजार नहीं करते। इधर केश बढ़े, उधर सन्यास शुरू ! घर पर ही केश कर्तनालय खुल गए हैं, कोई बाबा नहीं बनना चाहता। सन्यासी तो कतई नहीं। भला हो राजनीति का, जिसने एक नया आश्रम सबके लिए उपलब्ध करवा दिया है। सोच रहा हूं, वानप्रस्थ के स्थान पर यह आश्रम कैसा रहेगा।।
© श्री प्रदीप शर्मा
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