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(साहित्यिक एवं सांस्कृतिक समाचार)
“व्यंग्य के रंग” पुस्तक का भव्य लोकार्पण एवं परिचर्चा ☆ साभार – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव
व्यंग्य साहित्य को समर्पित एक संकलन व्यंग्य के रंग
नई दिल्ली। हिंदी साहित्य के क्षेत्र में व्यंग्य विधा को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक पहल के रूप में “व्यंग्य के रंग” नामक व्यंग्य-संकलन का लोकार्पण एवं परिचर्चा समारोह 17 जनवरी, शनिवार को राजधानी दिल्ली के प्रतिष्ठित सांस्कृतिक केंद्र भारत मंडपम, प्रगति मैदान मे संपन्न हुई।
यह गरिमामय आयोजन ‘अद्विक पब्लिकेशन’ के तत्वावधान में आयोजित किया गया ।
इस पुस्तक में सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार विवेक रंजन श्रीवास्तव सहित देश और विदेश के 88 प्रतिष्ठित व्यंग्यकारों की श्रेष्ठ रचनाएँ संकलित की गई हैं।
व्यंग्य साहित्य को अक्सर केवल हास्य का माध्यम समझा जाता है। वास्तव में यह समाज की विसंगतियों, विडम्बनाओं और विरोधाभासों को उजागर करने की सबसे सशक्त विधा है। “व्यंग्य के रंग” इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए पाठकों को न केवल हँसने के लिए प्रेरित करता है बल्कि सोचने, आत्ममंथन करने और प्रश्न उठाने की चेतना भी प्रदान करता है।
आज के समय में समाज अनेक सामाजिक, राजनीतिक और नैतिक चुनौतियों से जूझ रहा है। ऐसे समय में व्यंग्यकार अपनी लेखनी के माध्यम से व्यवस्था पर तीखे प्रहार करता है। इस पुस्तक में संकलित रचनाएँ आम आदमी की पीड़ा, सत्ता की विडम्बनाएँ, सामाजिक दिखावे, बदलते मूल्यों और आधुनिक जीवनशैली की विसंगतियों को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करती हैं।
“व्यंग्य के रंग” एक ऐसा व्यंग्य-संग्रह है, जिसमें विविध विषयों, शैलियों और दृष्टिकोणों का अनूठा समावेश देखने को मिलता है। पुस्तक में शामिल 88 व्यंग्यकारों की रचनाएँ यह सिद्ध करती हैं कि हिंदी व्यंग्य केवल एक शैली नहीं, बल्कि एक सशक्त वैचारिक आन्दोलन है।
पुस्तक की प्रमुख विशेषताएँ —
- समाज और राजनीति पर तीखा किंतु सुसंस्कृत व्यंग्य
- समकालीन जीवन की सच्चाइयों का यथार्थ चित्रण
- हास्य के साथ गहरी वैचारिक दृष्टि
- भाषा की सरलता और प्रभावशीलता
- विविध पीढ़ियों के व्यंग्यकारों का समावेश
यह पुस्तक पाठकों को नवविचारों से साक्षात्कार कराने के साथ-साथ बौद्धिक संतुष्टि भी प्रदान करती है।
साभार – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘ विनम्र’
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





