जस्मिन शेख
☆ कथा कहानी ☆ प्यास… – मराठी लेखिका – उज्ज्वला केळकर ☆ हिन्दी भावानुवाद – जस्मिन शेख ☆
उज्ज्वला केळकर
जस्मीन करुना निकेतन क्रेश की सीढ़ियाँ उतरी और उसके पीछे-पीछे क्रेश के सब लोग… गेट तक चले आए।। सुनीता काफी देर से टैक्सी के साथ गेट के बाहर इंतज़ार कर रही थी। हालाँकि, जस्मीन के पैर वहाँ से हटने का नाम नहीं ले रहे थे। उसके कदम मानो थमसे गए थे। क्रेश के लिए यह क्षण ऐतिहासिक महत्व का था। पच्चीस साल पहले क्रेश ने अपनेमें समाए हुए उस छोटीसी बच्ची ने देखते ही देखते एम.बी.बी.एस. की पढ़ाई पूरी की थी। और अब आगे की पढ़ाई के लिए जर्मनी जा रही थी। क्रेश में आज सभी ने उसे अलविदा कह दिया। विदाई और उसकी यात्रा के लिए…… उसकी शिक्षा के लिए….. उसके भावी जीवन के लिए…… जनहित में समर्पित उसके जीवन उद्देश के लिए …. हार्दिक शुभकामनाएँ। इन सभी लोगों की आत्मयता उसके मन पर भारी पड़ रही थी। जैस्मिन को लगने लगा था कि उस भारीपण के नीचे उसका दम घुट रहा है। एक ओर, वह जल्द से जल्द इन सब से बाहर निकलना चाहती थी, लेकिन दूसरी ओर, उसके पैर और मन उन्ही में समा गए थे। उसे यह भी लग रहा था कि जितना ज़्यादा समय वह उनके साथ बिता सके, उतना अच्छा है। वह अपने मन की दुविधा से उलझन में थी। आज सुबह से ही, क्रेश का हर व्यक्ति उससे कुछ कहने के लिए झटपटा रहा था। समय कम था। और बात खत्म ही नही हो रही थी।
‘आज सिस्टर नैंन्सी यहाँ चाहिए थी।’ सिस्टर मारिया मन ही मन सोच रही थी। जैस्मीन को पढ़ाने और उच्च शिक्षा के लिए जर्मनी भेजने का सिस्टर नैंन्सी का सपना था। उन्होने यह बात कई लोगों को कई बार बताया था। वह खुशी से फुली न समाती। उसे और फादर फिलिप को…….
जस्मीन क्रेशने गोद ली हुई पहली बेटी! तब वह साढ़े तीन साल की थी। आज क्रेश परिवार काफ़ी बड़ा हो गया है। अलग-अलग उम्र की तीन साडे तीन सौ लड़कियाँ हैं। कुछ अनाथ बच्चे हैं, कुछ को उनके माता-पिता ने छोड़ दिया है, कुछ को यहाँ इसलिए लाया गया है क्योंकि वे हालात को संभाल नहीं पाईं। कुछ को आपराधिक सुधार गृह से भेजा गया है, कुछ घर से भाग गई हैं। क्रेश ने उन सभी पर अपने ममता की छाँव धरी है। उसने उन्हें जीवन दिया है, उनकी रक्षा की है, उन्हें शिक्षा प्रदान की है, हर एक के शक्ति के अनुसार!
ग्रीन टेम्पल चर्च शहर के एक बेहद ग्रामीण और पिछड़े इलाके में स्थित है। यह चर्च जर्मन मिशन द्वारा समर्थित है। फादर जर्मनसे इस चर्चा के मुख्य बिशप बनकर आए हैं। इस विश्वास के साथ कि गरीबों और ज़रूरतमंदों की सेवा करना प्रभु येशू का कार्य है, इसी विश्वास से उन्होंने अपने आस-पास के लोगों की मदद की। उन्होंने गरीबी से असमय नष्ट हो रही कलियों को जीवनदान दिया। प्रभु यीशु के संदेश को कर्म द्वारा फैलाने के उद्देश्य से उन्होंने चर्च की एक सहयोगी संस्था के रूप में निकेतन की शुरुआत की। फिर सिस्टर मारिया, सिस्टर ज्युथिका जर्मनी से आए। कुछ अन्य स्थानीय ईसाई कलीसियाओं ने भी मदद की।
फादर फिलिप ने क्रेश शुरू करने का फैसला करने के बाद, एक भिखारी दंपति से तीन या चार साल की बच्ची को गोद लिया, जिसे कुष्ठ रोग था। हम उसकी अच्छी देखभाल करेंगे, उसे खूब पढ़ाएंगे, उसका पालन-पोषण करेंगे, उसे जर्मनी भेजेंगे, लेकिन आप उससे बिल्कुल नहीं मिलेंगे, उसको अपना परिचय नहीं देंगे। भिखारी दंपति सहमत हो गए। उन्होंने सोचा होगा कि कम से कम लड़की का जीवन बेहतर होगा। फादरने डॉ. थॉमस से पूरी जांच करने को कहा। लड़की प्रभावित नहीं हुई थी। प्रभु की लीला। उसने अपने हाथों को अपनी छाती पर हाथ से क्रॉस कर लिया। बाद में उसका नमकरण हो गया। सिस्टर नैंन्सीने एक नाम सुझाया। जस्मीन, एक ऐसा फूल जो अपनी उपस्थिति से पूरे वातावरण को सुगंधित कर देता है….. जस्मीन।
जस्मीन…क्रेशने गोद ली हुई पहली लड़की । जस्मीन जो पहले सड़कों पर पली-बढ़ी थी, उस सीमित वातावरण में इतनी घबरा जाती थी कि कोई उसे छूता या कोई अगर वह पास आती भी, तो वह डर से सिकुड जाती, मेमनेकी तरह!।
जस्मीन को अपने जीवन के उन टुकड़ों को इकट्ठा करके अपनी जीवन कहानी गढ़ने का जुनून सवार हो गया था, जो उसने समय-समय पर क्रेशमें दूसरों की बातचीत से इकट्ठा किए थे। दरअसल, उसमें कभी किसी से कुछ पूछने की हिम्मत नहीं हुई। वह बहुत शर्मीली और संकोची थी, लेकिन वह हमेशा सोचती थी कि उसके माता-पिता कौन हैं। फादरने उसे पहली बार कब और कहाँ देखा था? उन्होंने उसे गोद लेने के बारे में कैसे सोचा? अगर उन्होंने यह नहीं सोचा होता, अगर उसके माता पिताने हमें उन्हें देने से इनकार कर दिया होता, तो आज हम कहाँ होते? हमारी ज़िंदगी कैसी होती?
शायद ऊन भिखारी की तरह हमारा शरीरभी सड जाता । शायद नही, यकीनन! हम भी सडा हुआ शरीर लेकर घसीटते हुए जिंगकी काटते रहते। उस स्थिति में हम क्या सोचते? हम सोचते की यही जीवन है, और कुछ नहीं।
हम किसी और की दुहाई देकर जीते या किसी के घृणा के कार बनते।
कई सवाल…… सवालों का एक चक्रव्यूह। हर सवाल उलझाने वाला है। वह अपने मन में जवाब ढूँढ़ने की कोशिश करती रहेगी। वह अपने मन में उस स्थिति में अपना ही रूप देखेगी। उसे हर बार अलग उत्तर मिलेगा।
स्कूल जाते समय, वह सड़क पर भिखारियों को देखती, कोढ़ियों को जो चपटी नाक, टूटी उंगलियाँ, सूजे हुए हाथ-पैर और गंदे कपड़ों के साथ ग्रीन टेम्पल के क्रेश के आसपास घूमते थे। कभी कोई ठेले पर गाड़ी खींचता या बैठकर घूमता हुआ महारोगी। वह उनके प्रत्येक चेहरे को ध्यान से देखती और उनमें अपनी समानता खोजने की कोशिश करती। वह किसकी आँखों को अपनी जैसी समझती? यह किसका रंग है? अपने माता-पिता के बारे में सोचकर उसका पूरा शरीर काँप उठता। उसके शरीर रोमांचित हो जाता था।
स्कूल जाते समय, वह उन्हें देखती हुई धिरे धिरे आगे बढती। जब वह देखती कि वे उस पर ध्यान दे रहे हैं, तो सभी भिखारी शोर मचाते।” बहन, गरीब को दो पैसे दे दो। भगवान तुम्हें अमीर बना देगा। वह तुम्हें खुश कर देगा।” वह हँस पडती। उन्हें पैसे दो और इसीलिए भगवान उन्हें अमीर बना देगा। तो फिर भगवान उन्हें सीधे पैसे क्यों नहीं देते? लेकिन फिर उसके अंतरमन पर हुये प्रभु यीशु के संस्कार उसे याद आते। गरीबों के दुख दूर करो। प्रभु यीशु जीवन भर गरीबों की मदद करते रहे। सिर्फ़ अपने लिए मत जियो। दूसरों के लिए जियो।
उसे फादर फिलिप का मधुर भाषा में दिया गया उपदेश याद आया। फिर उसने मन ही मन सोचा, “इनके फैले हुए हाथों में कुछ पैसे रख दूँ। काश ये मेरे माता-पिता होते, तो चाय की चुस्की लेते। पैसे होते, तो सब्ज़ियाँ लाकर खाते। एक पल के लिए उनके उदास और मेहनती चेहरों पर खुशी की एक चमक आ जाती।
लेकिन उसके पास पैसे नहीं थे। वह क्रेशसे अपनी ज़रूरत की किताबें और कॉपियाँ ले आती। स्कूल में उसे जो पढ़ाई का सामान चाहिए था, वो सभी मिलता, पर पैसे कभी नहीं मिलते। क्रिसमस,इस्टर जैसे मौकों पर क्रेश की तरफ़ से वहाँ जमा भिखारियों को मिठाइयाँ बाँटी जातीं। जैस्मिन उन्हें बाँटने में पहल करती। उसे लगता कि क्रेश में भिखारियोंको भरपेट खाना खिलाना चाहिए। पर वह कुछ नहीं कर सकती थी। रोज़ खाना खाते हुए जस्मिन प्रार्थना करती, “हे प्रभु, जैसे मुझे बढिया खाना मिलता है, वैसे ही मेरे माता-पिता और दूसरे लोग भी मिला दो…..और सभी लोगोंको भी. आमेन…..।”
उसे अपने माता-पिता का ज़िक्र क्यों करना पड़ता है?
कहते हैं कि प्यार और स्नेह संगति से पैदा होता है। बचपन से उसे उनकी संगति नही मिली, फिर भी उसका मन लगातार उनके बारे में क्यों सोचता रहता है? उसकी सोच उनके इर्द-गिर्द क्यों घूमती रहती है? क्या वह नहीं जानती कि इसके पीछे भी कोई ईश्वरी संकेत है? क्रेशमें सभी उसे प्यार करते हैं, लेकिन हम यहाँ अजनबी हैं।…… हम भिखारी हैं।…… उसकी यह जीवनकहानी सुनकर उसके दिल में जो भावना पैदा हुई थी, उसे वह कभी नहीं मिटा पाई।
आज शाम चार बजे क्रेश के मनोरंजन कक्ष में जस्मीनको विदाई देने के लिए एक छोटा सा कार्यक्रम आयोजित किया गया। उसकी पढ़ाई की आदतों, विनम्र और मधुर व्यवहार की खूब प्रशंसा की गई। सिस्टर मारिआने उसकी बहुत प्रशंसा की और कहा कि स्कूल की सभी लड़कियों को उस पर गर्व होना चाहिए। स्कूल की लड़कियों को उसका अनुसरण करना चाहिए। जैस्मिन भी अभिभूत हो गई।
हम कौन हैं? उन्होंने हमारे और हम जैसे कई लोगों के लिए कितना कुछ किया है? उन्होंने हमें अपने पाले में खींचने के लिए इतना कुछ क्यों किया? लोग आलोचना करते हैं। वे कहते हैं कि लोगों को धर्मसे भ्रमित करने के लिएयेसारी साजिश है। लेकिन आलोचक, जो इन्ही को दोष देते हैं, उन्होंने क्या किया है,हम जैसी लड़कियों को आश्रय और सुरक्षा देने के लिए ? उनका आंतरिक उद्देश्य केवल धर्म का प्रसार करना नहीं था। उनके हृदय में शुद्ध मानवता का एक झरना बह रहा था और उन्हें यीशु के दूत के संदेश और शिक्षाओं में अटूट विश्वास था। वह संदेश दूसरों तक पहुँचने अर्थ उन्हें अपने पाले में खिंचना नहीं हो सकता। वे अपनी मातृभूमि से दूर आए और यहीं रहे। उन्होंने यहाँ के लोगों की यथासंभव सेवा की। उन्होंने कहाँ सभी को अपने पाले में खींचा, हम उनके जन्म के ऋणी हैं।
जस्मीन के हृदय में फादर फिलिप और सिस्टर नैंन्सीके लिए कृतज्ञता का एक असीम भाव उमड़ पड़ा। जस्मीन बोलने के लिए उठी, लेकिन आज उसे बोलने के लिए शब्द नहीं मिल रहे थे। उसने बस इतना ही कहा।
इसी क्रेश ने ही मुझे उभारा है, उसके प्रति मेरा भी कुछ कर्तव्य है, लेकिन अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद, मैं यहाँ आऊँगी। इस क्रश में रहकर मैं जनसेवा करुँगी। उसने कुष्ठ रोग पर और अधिक शोध करने की मंशा भी व्यक्त की। उसके मन में फिर से विचारों की लहरें उठीं। वह सपने देखने लगी।
जब हम लौटेंगे, तो हम एक छोटा सा निकेतन, कुष्ठरोगीयोंके लिए एक साफ-सुथरी कॉलोनी और उनके लिए एक आधुनिक अस्पताल बनाएंगे। क्रेश के आसपास कोई ‘लेपर’ नहीं होना चाहिए। कोई भीख न मांगे। सभी को अपनी कॉलोनी में काम करना चाहिए और खाना चाहिए।
प्रभु यीशु, ईश्वर ने हमें अपने दृढ़ संकल्प में दृढ़ रहने की शक्ति दी है।
पर हमें आने में चार या पाँच साल लगेंगे। तब तक यहाँ कौन जीवित रहेगा ? क्या हमारे माता-पिता उनमें से होंगे? क्या हम अपने हाथों से उनकी थोड़ी सी भी सेवा कर पाएंगे?
कोई जस्मीन के बारे में बोल रहा था…,कोई उसकी सहेलियों बारे में..उसके स्कूल के दोस्तों के बारे में बात कर रहा था,…….लेकिन वह कुछ सुन नहीं पा रही थी। सामने हॉल में, एक बड़ा पोस्टर था जिसमें प्रभु यीशु एक महिला को पानी पिला रहे थे। नीचे लिखा था: ‘उन्होने दिये हुए पानी से जो तृप्त होता है, उसे फिर प्यास नहीं लगती।’
उसे फादर फिलिप्स के सर्मन की याद आई। किसी शरमोणी महिला की कहानी। प्रभु ने उस पापी महिला को दर्शन दिया। क्या उसके माता-पिता पापी थे ? तो उन्हें पानी कौन देता? यीशु उस पापी महिला को करीब लाए और उसे जीवन का जल, आध्यात्मिक जल दिया। उसकी प्यास हमेशा के लिए बुझ गई। हम तो प्रभु यीशु द्वारा दिए गए पानी में डूबे रहते हैं।सर से पाँव तक। फादरने हमें इस पानी के करीब लाए, लेकिन फिर भी हम प्यासे थे। हम बहुत प्यासे थे। हम अपने अनदेखे माता-पिता को देखने के लिए प्यासे थे। हमारी आंखें बहुत प्यासी थीं। हमारा गला सूख गया था। हम बहुत प्यासे थे। हमारा जी घबरा गया….इतनी प्यास….
क्रेश सेबाहर आते समय जस्मीन का मन इन सभी विचारों से भर गया।सुनीता उसे बार-बार जल्दी आने के लिए कह रही थी। वह जस्मीन के साथ मुंबई तक जाने वाली थी। जस्मीन टैक्सी के पास पहुँची और जैसे ही बाकी सब गेट के पास खडे रहे। टैक्सीका दरवाज़ा खोलकर अंदर बैठते वक्त उसने सामने फुटपाथ पर जाने-पहचाने भिखारियों को देखा। भिखारी माथे पर अधुरे हाथ रखे राहगीरों से रहम की भीख माँग रहे थे। जस्मीन फिर बाहर आई, टैक्सी का दरवाज़ा बंद किया, भिखारियों के पास गई, पर्ससे कुछ नोट और सिक्के उनकी थाली,कटोरोंमें डाले, और मन ही मन कहा, “मेरे अनजान माता-पिता, मेरे काम में मेरी सफलता के लिए प्रार्थना करो, मुझे आशीर्वाद दो।”
वह टैक्सी में बैठ गई। टैक्सी चल पड़ी। उसने गेट पर खड़े क्रेशके सभी लोगों और सामने फुटपाथ पर बैठे भिखारियों की ओर हाथ हिलाया। बुझ-बुझीसी चार आँखे बेबस होकर जाती हुई टैक्सी की ओर देखती रही।
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मूल लेखिका – सौ. उज्ज्वला केळकर
संपर्क – निलगिरी, सी-५ , बिल्डिंग नं २९, ०-३ सेक्टर – ५, सी. बी. डी. – नवी मुंबई , पिन – ४००६१४ महाराष्ट्र
मो. 836 925 2454, email-id – kelkar1234@gmail.com
भावानुवाद – जस्मिन शेख
मिरज. मो 9881584475
≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈




