डॉ. अशोक कुमार ‘मंगलेश’
☆ गहरे पानी पैठ – लेखिका : डॉ. मुक्ता ☆ समीक्षक – डॉ. अशोक कुमार ‘मंगलेश’ ☆
पुस्तक- गहरे पानी पैठ
लेखिका – डॉ मुक्ता
प्रकाशक – SGSH Publications
मूल्य– 350
पृष्ठ संख्या– 264
☆ मानव मूल्यों एवं सामाजिक सरोकारों के बहुमूल्य प्रकरणों का दस्तावेज: गहरे पानी पैठ – डॉ. अशोक कुमार ‘मंगलेश’ ☆
निबंध लेखन अथवा शैली गद्य साहित्य की एक गूढ़ विधा है जिसे गहरे पानी में बैठने के समान योग साधक की भांति रचनाकार को बैठना पड़ता है, वह भी खुली आँखों के। निबंध के अनेक प्रकार हैं जिनमें सामाजिक, साहित्यिक, शैक्षिक, ललित एवं चिंतनपरक आदि। विवेच्य निबन्ध संग्रह ‘गहरे पानी पैठ’ के साथ प्रस्तुत होती हैं डॉ मुक्ता। लेखिका एवं कवयित्री साहित्यिक जगत में विलक्षण प्रतिभा की धनी हैं। इनके सर्जनात्मक क्रम में इनकी विलक्षणता को देखा जा सकता है। इनका संपूर्ण साहित्य चुनौतीपूर्ण, दुर्लभ और लीक से हटकर है जिसमें गूढ़ से गूढ़तम रूप में विविध रचनाधर्मिता पाई जाती है। इसलिए हम इन्हें अन्य विद्वानों से विलग श्रेणी में खडा पाते हैं। डॉ मुक्ता जी प्रथमतः काव्य की मर्मज्ञ पाठक हैं, किंतु प्रस्तुत निबंध संग्रह के अतिरिक्त उनके अब तक 300 से अधिक निबंध सामने आ चुके, जो इन्हें निबंध लेखन के क्षेत्र में अग्र-पंक्ति में खड़ा करते हैं। जो अपने आप में साहित्यिक जगत में कीर्तिमान संस्थापित करती हैं। वर्तमान में इनसे अधिक निबंधों का सृजन-प्रकाशन एवं प्रस्तुतिकरण शायद ही अन्य किसी का हो। वह साहित्य की गद्य-पद्य दोनों विधाओं की एक समान मर्मज्ञ एवं अधिकारी विद्वान हैं। मैं जब कभी उनकी रचनाओं को पढ़ने बैठता हूँ तो समझ नहीं पाता कि उनका गद्य पढ़ा जाए या पद्य है। उनके सृजन में गहनता तो है ही, रचनाओं के विषय बड़े सामयिक और सामाजिक मूल्यों से संपृक्त होते हैं, जो एक सजग रचनाकार का पहला दायित्व है। डॉ. मुक्ता ने अपने इस निबंध संग्रह में राष्ट्रव्यापी घटनाओं, मानवीय संवेदनाओं, भावनाओं, पीड़ाओं, नारी-अस्मिता के अतिरिक्त शिक्षाप्रद, प्रेरणादायक एवं साहित्यिक तथा विमर्शगत अथवा चिंतनपरक और सुचिन्तनपरक 75 निबंधों को संगृहीत किया है। 21 वीं सदी अथवा वर्तमान में हिंदी साहित्य को लेकर साहित्यकार डॉ. मुक्ता चिंतातुर है। आज समाज ईमानदारी, सत्यनिष्ठा, राष्ट्रीयता, सहृदयता तथा कल्याण कारक भावों से दूर होते जा रहा है। मनुष्य परहित के मार्ग से हटकर, स्वहित की ओर उन्मुख हो गया है। वस्तुतः उनका निबन्ध सृजन सद्गुणी एवं सद्मार्गदर्शन से भरपूर सत्य, अहिंसा, प्रेम, दया, करुणा, उदारता, सहनशीलता, संयम एवं त्याग से परिपूर्ण चिंतनशील हैं; यथा- दिशाहीन समाज और घटते जीवन-मूल्यों ने मनुष्य को मानवताहीन बना दिया है, किराये का मकान बनाम घर के अंतर को नजरअंदाज कर युवा पीढ़ी संस्कारहीन हो, नैतिक मूल्यों का ह्रास कर रहें हैं, क्यों? मातृ हंता युवा, ज़िंदगी की शर्त- संधि-पत्र, स्मित-रेखा औ’ संधि, बाल यौन उत्पीड़न समस्या व समाधान, मज़दूरी इनकी मजबूरी आदि जो भी निबंध हैं प्रश्न चिह्न खड़ा करते हैं, चूंकि आज इंसान चलता-फिरता पुतला बन, आरक्षण के सहारे अपने-अपने खेमों में बंटा हुआ गुमशुदगी के रिश्तों के समान सुनता और सहन करता है, अपेक्षा-उपेक्षा से त्रस्त है, साथ ही लेखिका सोचती है कि विभिन्न मंचों पर सुविधा-प्राप्त सम्मान-कितने सार्थक हैं और नारी अस्मिता-प्रश्नों के दायरे में क्यों? यह कैसा राम राज्य है जिसमें कानून, शिक्षा, संस्कार व समाज में ऑनर किलिंग, सेल्फ मैरिज, बढ़ते तलाक, अविश्वास, आधुनिकता व नारी के बदलते तेवर संवेदनहीन हो गए, क्या प्रॉब्लम है? कब थमेगा यह सिलसिला क्या ये काफ़िले चलते रहेंगे, सोचते हैं लोग क्या कहेंगे, पुरुष वर्चस्व, तारीफ़ सुनना, मानसिक प्रदूषण बढ़ गया है, जिंदगी लम्हों की किताब के समान अथवा मौन भी खलता है और लफ़्ज़ों के ज़ायके भी बदल गए हैं, दोस्ती क्या है, सहनशक्ति बनाम दण्ड के मायने बदल गए है, अंतर्मन की शांति भंग हो गई है, खामोशियों की जुबाँ में ज़िन्दगी समझौता बन गई है अब तो लगता है मौन सबसे कारगर दवा है या फिर खामोशी एवं आबरू बचाने का सिलसिला है जहाँ जीवन संभव नहीं, असंभव हो गया, रिश्ते बनाम ग़लतफ़हमी, ज़बर्दस्ती नहीं ज़बर्दस्त, अहं बनाम अहमियत, बदलाव बनाम स्वीकार्यता, चिन्ता बनाम पूजा, समय व जिंदगी, उपलब्धि व आलोचना, जुनून बनाम नफ़रत सब अधूरी ख्वाहिशें हैं, ठीक ही कहा है ‘आईना झूठ नहीं बोलता’ इस बदलते परिप्रेक्ष्य में चाहे साहित्यकार और उसकी शब्द साधना, महाभारत नहीं रामायण, उपहार व सम्मान, मनन व आनंद, कभी दोस्ती और क़ामयाबी को खोजती रहे किंतु ज़िंदगी मैं शब्द, तुम अर्थ, शिकायतें कम, शुक्रिया ज्यादा में कहीं खो गई है, इसी बीच कोरोना काल और जीवन के शाश्वत् सत्य- प्रेम, प्रार्थना और क्षमा, हिम्मत, प्यार व परवाह, उम्मीद, कोशिश अथवा रिश्ते बनाम संवेदनाएं, संतान का सुख: संतान से सुख, चाहे कोरोनाकाल में सम्बंधों की बात हो, सब प्रयास विफल ही रहे अर्थात नाकामयाबी ही हाथ लगी।
जहाँ इनके निबंधों का जटिल-साहित्यिक, बोधगम्य रूप सामने आया है, वहीं दूसरी ओर सरल और अपेक्षाकृत महनीय रूप भी। संपूर्णत: इनकी शब्द-शक्ति लोकमंगल से जुड़ी हुई है तथा निबंधकार डॉ. मुक्ता निबंध के भविष्य पर अपने कालखंड को विभिन्न प्रकारों के दृष्टि-पथ में रखकर विचार करती हुई प्रतीत होती हैं। निबंध पाठक की आत्मा और मस्तिष्क दोनों को प्रभावित करने में निहित हैं जो एक प्रकार से प्रेरक, शिक्षाप्रद, अवलोकन और चिंतन की चेतना का स्वत: प्रस्फुटन हैं। लेखिका ने वर्तमान युग में जीवन और साहित्य में भव्यता, जीवन का ह्रास और क्षुद्रताओं, संकीर्णताओं, विषमताओं तथा विकास से चिंतत होकर जीवन और साहित्य को समीक्षित करने तथा सर्वोत्तम ज्ञान-राशि के प्रचार-प्रसार को कारक रूप में प्रस्तुत करती हैं। भौतिकवादी युग में मानव-मन को संतुलित रखने और विश्रांति प्रदान करने का स्तुत्य प्रयास किया है। मानवीय परंपराओं और सामाजिक मूल्यों से सामंजस्य स्थापन हुआ है। सामाजिक सरोकारों के अंतर्गत ही व्यक्ति जनरीतियों, रूढ़ियों, नियमों, सिद्धांतों आदि कुशलताओं और आवश्यक आदतों को सीखता है, इस दृष्टि से ये महत्वपूर्ण निबंध समाज के प्रत्येक वर्ग के लिए उपयोगी सिद्ध होंगे। कुल मिलाकर निबंध विविध विषयक प्रकरणों भौतिक और वैचारिक परिवेश का समन्वय के साथ विवेचन प्रस्तुत करते हैं। अभिव्यक्ति में अनेक ऐसे बिंदु- समाज-राजनीति में परिव्याप्त विसंगतियों, विडंबनाओं, विद्रूपताओं तथा भ्रष्टाचार व कदाचार आदि नानारूपों में मुखरित अथवा उपस्थित हुए हैं, जो विमर्शगत अध्ययन का सटीक क्षेत्र बने हैं। संग्रह के सामाजिक, सांस्कृतिक एवं मानवीय बोध पहलू का सन्निवेश लेखिका को लोक-जीवन के अधिक-से-अधिक नजदीक लाता है। वह अपने युगीन परिवेश को संपूर्ण गुण-दोषों के साथ अपने निबंधों में चित्रित करने का प्रयास करती है।
प्रकृत संग्रह में लोकतत्त्वों की व्याप्ति और विचारों की व्यापकता इतनी है कि पाठक उनसे प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता, क्योंकि निबंधकार का भाव एवं विचार पक्ष इतना अधिक गहन है कि समस्त सृष्टि के लोकतत्त्वों को समाए हुए हैं।
यह निबंध-संग्रह शिल्प और लोक-रंजन का अनुपम संग्रह है, जो अवसाद से दूर समाज व सृजन के वृहद लोक में ले जाता है। लेखिका का अभीष्ट भी शायद यही है कि उनका रचा अधिसंख्य पाठकों तक पहुँचे और उनकी ज्ञानग्रंथी को कचोटे। निःसंदेह प्रस्तुत निबंध-संग्रह अथवा आलेख संग्रह जीवन, साहित्य, संस्कृति और लोक के विराट सत्य के अन्वेषण का उपक्रम है जो समुद्र मंथन के समान संग्रहणीय है, साथ ही पठनीय, श्लाघनीय तथा सराहनीय बन पड़ा है।
निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि निबंध-संग्रह ‘गहरे पानी पैठ’ समाज के भिन्न-भिन्न अंगों में संतुलन बनाए रखने का सद्प्रयास करते हैं। लेखिका का आग्रह भी शाश्वत है कि साहित्य, नित्य परिवर्तनशील समाज का वास्तविक रूप प्रतिनिधित्व करे तथा समाज के पुनर्गठन के लिए सृजन में नए-नए विचारों को प्रस्फुटित करें। यदि साहित्य को एक रचनात्मक शक्ति के रूप में अपना दायित्व निर्वहन करना है तो साहित्यकार को नवीन विचारों की देन में समाज का नेतृत्व करना होगा, यही राजधर्म, राष्ट्रधर्म, साहित्यधर्म एवं मानव धर्म है। उक्त संदर्भ में डॉ मुक्ता का रचना संसार समग्रतः समसामयिक समाज के अनुरूप सटीक एवं सार्थक रूप में सृजित है। पुस्तक छात्र-छात्राओं, विद्यालयों तथा महाविद्यालयों के लिए बहुत उपयोगी है। चूंकि जो साहित्य सम्पूर्ण समाज का हित, कल्याण और सुसंस्कारों से सुसज्जित होता है वह सदैव उपयोगी होता है। जहाँ चिंतन और मंथन है वहाँ भाषा गम्भीर और तत्सम प्रधान है, अतः निबंधों की भाषा विषयानुसार है। सहज, सरल प्रवाहमयी भाषा का प्रयोग निबंधों को बोधगम्य बनाता है।
© डॉ. अशोक कुमार ‘मंगलेश’
साहित्यालोचक एवं अनुवादविद
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≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈





