सुश्री इन्दिरा किसलय

☆ पुस्तक चर्चा ☆ समकालीन क्षणिकाकार” बारूद के शहर में माचिसों के घर☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

कृति- समकालीन क्षणिकाकार

संपादक- डाॅ. शैलेष गुप्त वीर

समीक्षक- इन्दिरा किसलय

प्रकाशक- इरा पब्लिशर्स, कानपुर

पृष्ठ- 132

मूल्य- 240/- रू

सन्नाटे का अजगर कमसिन देह निगल जाता है ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

इरा पब्लिशर्स, कानपुर द्वारा प्रकाशित “समकालीन क्षणिकाकार”, यह कृति क्षणिका जगत के सूक्ष्म स्पंदन और भावैश्वर्य को लेकर पाठकों को गहन चिन्तन हेतु उत्प्रेरित करती है। जिसके संपादक हैं बहुभाषाविद् साहित्यकार डाॅ. शैलेष गुप्त ‘वीर’। उनका विश्वास है कि “शीर्षकविहीन सूक्ष्म कविताएँ पाठक या श्रोता को सोचने-समझने हेतु अधिक स्पेस प्रदान करती हैं।” अर्थात् वैचारिक मंथन को विवश करने की सामर्थ्य उनमें होती है।

अधिकतम 30 शब्दों में क्षणिका अपनी यात्रा संपन्न करती है। अपने संपादकीय में डाॅ. वीर ने कम शब्दों में अर्थ के घनत्व को रेखांकित किया है। जो डाॅ. परमेश्वर गोयल उर्फ़ काका बिहारी की क्षणिका में ध्वनित होता है-

चिड़िया

चिड़े से बोली

जंगल से मन ऊब गया है

चलो! किसी गाँव

या शहर चलते हैं

चिड़ा बोला- नहीं-नहीं!

वहाँ आदमी रहते हैं!”

अनुभूति की गहराई एवं व्यंग्यात्मक रूप ग्रहण करने पर क्षणिका चिरजीवी हो जाती है। उसमें एक कौंध उत्पन्न होती है। प्रगल्भ चिन्तन एवं जगत जीवन के प्रति सतत चैतन्य क्षणिकाओं को उर्जित करता है। इन्हीं कसौटियों पर देश विदेश के 64 क्षणिकाकारों ने प्रस्तुत कृति में अपने हस्ताक्षर दर्ज़ किये हैं।इसके पहले भी डाॅ. वीर “बिन्दु में सिन्धु” एवं “शब्द-शब्द क्षणबोध” के माध्यम से क्षणिका विधा का सौंदर्य प्रकाशित कर चुके हैं।

विवेच्य कृति में डॉ. परमेश्वर गोयल, डाॅ. सरोजिनी प्रीतम, डाॅ. मिथिलेश दीक्षित, डाॅ. उमेश महादोषी, चक्रधर शुक्ल, रमेश कुमार भद्रावले, संदीप सृजन, डॉ. घमंडीलाल अग्रवाल, अविनाश ब्यौहार, डॉ. वेद प्रकाश अंकुर, पुष्पा सिंघी, कैलाश वाजपेयी, डाॅ. मीनू खरे जैसे कितने ही लब्धप्रतिष्ठ रचनाकार विधा को गौरव प्रदान कर रहे हैं। क्षणिका, फ्रीवर्स यानी मुक्त छन्द है। मात्राओं का कोई बंधन नहीं। सपाटबयानी, सृजन की दीर्घजीविता पर ग्रहण लगाती है। संप्रेषणीयता ऐसी हो कि मन में खलबली मचा दे। चक्रधर शुक्ल कहते हैं-

कंडक्टर ने खाया दस

परिवहन मंत्री

पचा गया/पूरी बस।”

कुछ भी ऐसा नहीं है, जो क्षणिका की परिधि में समा न सके। अशोक आनन की बानगी द्रष्टव्य है-

बारूद के शहर में/माचिस के घर/आदमी को है/हवाओं से डर।”

जीवन के अनगिन पार्श्व हैं। यथा- प्रेम-प्रणय, संवेदनहीनता, पर्यावरण ध्वंस, बिखरते रिश्ते, भ्रष्टाचार, मूल्यहीन राजनीति, युद्धोन्माद एवं न जाने क्या-क्या। इन्दिरा किसलय व्यथित हैं-

नयी सदी का

नया चलन है

जाने कैसा अनगढ़ मन है

लोग पूजते हैं बुद्ध

और शान्ति के लिए

करते हैं युद्ध।” 

अनाचार का दैत्य आतुर है सब कुछ निगल जाने को। डाॅ. शैलेष गुप्त ‘वीर’ इस ज्वलन्त सत्य को कुछ यों बयाँ करते हैं-

सन्नाटे का अजगर

कमसिन देह

निगल जाता है,

बिकाऊ मीडिया

बस! शोर मचाता है।” 

एक और विकट व्यंजना संदीप सृजन की कलम से निःसृत है-

वे वेबिनार में/भूख की/ व्याख्या कर रहे हैं,

जो लाॅकडाउन में/रोज़

नया व्यञ्जन/चख रहे हैं! 

132 पृष्ठों का यह संकलन नवांकुरों के लिये पाथेय सिद्ध होगा तो स्वनामधन्य रचना शिल्पियों के गौरव का उद्गाता। जेट एज में रफ़्तार का कहर विधाओं पर भी टूट रहा है। संक्षिप्त विधाओं की उपयोगिता निःसंदिग्ध हो चली है।

उत्कृष्ट संपादन, निर्दोष मुद्रण, इन्द्रधनुषी मुखपृष्ठ एवं वाणी का वैभव पाठकों से प्राप्त सराहना एवं विश्वास को निश्चय ही प्रमाणित करेगा।

समीक्षक –  सुश्री इंदिरा किसलय 

नागपुर, महाराष्ट्र

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares
0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest

0 Comments
Oldest
Newest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments