सुश्री इन्दिरा किसलय
☆ पुस्तक समीक्षा ☆ छाँव जैसी औरतें… – कृतिकार – श्री पवन शर्मा ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆
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कृति–छाँव जैसी औरतें
कृतिकार–पवन शर्मा
समीक्षक–इन्दिरा किसलय
प्रकाशक–बोधि प्रकाशन जयपुर
मूल्य–249/-
पृष्ठ संख्या-141
☆ छाँव जैसी औरतें–संघर्ष साहस और संवेदना का दस्तावेज – सुश्री इन्दिरा किसलय ☆
सुख्यात लघुकथाकार “पवन शर्मा” द्वारा रचित कृति “छाँव जैसी औरतें “प्रथमतः शीर्षक के माध्यम से ही स्त्री विमर्श की प्रकाम्य दिशा का परिचय देती है। जिसमें स्त्री-जीवन के अकथ कथानक व्यंजित हैं। मुश्किल उतनी ही जरूरी, समकाल के यथार्थ का नैसर्गिक चित्रण करती हुई। वृक्ष की तरह सारी उष्मा एवं मौसम के आघात झेलकर छाँव देने वाली ललनाएं। कथाकार के शब्दों में” कभी रोटियों सी गोल कभी दरवाजों सी बंद। “
अभिव्यक्ति का अंदाज़ कहीं फैंटसी तो कहीं सामाजिक सरोकारों की सूक्ष्म पड़ताल बनकर उभरा है। समूचे संग्रह का प्राणस्वर है शीर्षकवाही लघुकथा जिसे शब्द चित्र कहना होगा। स्त्री मुक्ति का मानवीय परिप्रेक्ष्य—
“तुम्हारी पीढ़ी हमें सिर्फ छांव न मानकर इंसान माने। “””
” संवाद शैली” में रची गयी कथाएं, लीक से हटकर अपना स्थान बनाती हैं। कुछ लघुकथाएं बौद्धिक व्यायाम माँगती हैं। ऐसे प्रसंग जो हमारी दृष्टि से अक्सर ओझल रहे आते हैं, संग्रह में संवेदनशील प्रश्नों की झड़ी लगा देते हैं। सांघातिक सच के रूबरू खड़ा करते हैं।
दैनंदिन जीवन के घटनाक्रम तथा परिस्थितिजन्य संवेगों का कच्चा चिट्ठा कितनी ही लघुकथाओं में द्रष्टव्य है। परंपरा और रचनात्मक तर्कों का द्वन्द्व पाठकीय चेतना को उद्वेलित करता है।
“रात की महफिल”, ” जिनसे सुकून मिलता है” जैसी रचनाएं काव्यात्मक लालित्य उपलब्ध कराती हैं। परछाइयों के पार एवं कुर्सियों के पीछे फैंटसी है, जो संकल्पित उद्देश्य को उजागर करती है।
डूब की जमीन का दुःख में विस्थापन का दर्द है। “ऐसा नहीं देखना “-के केन्द्र में ज़ेन जी का उजड्ड पन है।
शहरी जीवन का खोखलापन और संत्रास भी कथाकार की दृष्टि में है। स्त्री विमर्श को बेहद ईमानदारी से वाणी दी गयी है। मनोवैज्ञानिक पेंच, अन्तर्द्वन्द्व और संलग्न सामाजिक पार्श्व की खोज। “सिर्फ औरतें नहीं हैं वे” में बदलाव की दस्तक दर्ज है।
“तलाश” अपने ढंग की अनूठी रचना है। पछतावे की कीलें ध्यान खींचती है।
” आँगन की चौखट में”नारी जीवन की यांत्रिकता है तो बीजी की भूल में एक सूत्र हस्तगत होता है “रिश्ते नाम से नहीं स्पर्श से चलते हैं। “मंच के पीछे में सियासत का घिनौना चेहरा है। “हँसते चेहरे” चार्ली चैप्लिन की याद दिलाती है।
अकेलेपन की टीस पर भी केन्द्रित हैं कुछ कथाएं।
सारी लघुकथाएं अंत में मन का कोई दर्दीला कोना खोलती हैं जो सामाजिक तानेबाने का अंदरूनी सच बयां करता है। रूहानी रिश्तों की खूबसूरती रूह की रोशनी में द्रष्टव्य है तो अपने हिस्से का सच पितृसत्तात्मक समाज का आईना है। शंख की आवाज़ और धुंध में बची औरत, भावुकता का सौंदर्य अनावृत्त करती हैं।
संग्रह की कथाओं की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता है कि वे निर्णायक मोड़ पर लाकर, पाठक को छोड़ देती हैं, उनका चैतन्य जाग्रत करती हैं।
भाषायी लालित्य एवं प्रवाह पाठकीय संवेदना से आत्मीयतापूर्ण रिश्ता बनाता है। शाब्दिक संयम, मितव्ययिता, एवं अभिजात्य ने भावों को सलीका प्रदान किया है। बोधि प्रकाशन जयपुर से प्रकाशित यह कृति निश्चय ही लघुकथेतिहास में अपने पदांक स्थिर कर क्रान्तिकामी वैचारिकी का सैलाब लाएगी।
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© सुश्री इंदिरा किसलय
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





