सुश्री ज्योत्स्ना कपिल

☆ पुस्तक समीक्षा ☆ साहित्य की गुमटी (व्यंग्य संग्रह) –  लेखक   : धर्मपाल महेन्द्र जैन ☆ सुश्री ज्योत्स्ना कपिल

पुस्तक  : साहित्य की गुमटी (व्यंग्य संग्रह)

लेखक   : धर्मपाल महेन्द्र जैन

प्रकाशक : शिवना प्रकाशन, सीहोर (म. प्र.)

मूल्य – 275

पृष्ठ – 154

वर्ष – 2025

सरल, चुटीली और प्रभावशाली – साहित्य की गुमटी – सुश्री ज्योत्स्ना कपिल ☆ 

व्यंग्य के क्षेत्र में धर्मपाल महेंद्र जैन जी एक प्रतिष्ठित नाम हैं। वह हिन्दी व्यंग्य विधा के गिने-चुने बेहतरीन व्यंग्यकारों में से एक हैं। पिछले वर्ष शिवना प्रकाशन द्वारा प्रकाशित उनके व्यंग्यों का एक रोचक संग्रह आया था ‘साहित्य की गुमटी’। जितना आकर्षक पुस्तक का शीर्षक है उतने ही लुभावने और सोचने को विवश करने वाले उनके व्यंग्य हैं। इस पुस्तक में धर्मपाल जी ने साहित्य जगत की विसंगतियों, दिखावा और परिवर्तित होती प्रवृत्तियों पर हास्यपूर्ण अंदाज में तीखा कटाक्ष किया है। यह पुस्तक पाठक को हँसी-हँसी में गंभीर मुद्दों पर सोचने को भी विवश करती है।

श्री धर्मपाल महेंद्र जैन

यहाँ गुमटी को एक प्रतीक के रूप में इस्तेमाल किया गया है। जिस प्रकार सड़क किनारे लगी गुमटी में भांति- भांति के लोग आते-जाते रहते हैं, ठीक उसी प्रकार साहित्य रूपी गुमटी में भी भिन्न-भिन्न श्रेणी के यथा- लेखक, पाठक, आलोचक और प्रकाशकों की भीड़ दिखाई देती है। जो स्वयं को बहुत महान समझने का भ्रम पाले रखती है। उनकी कुंठा, उनके आग्रह, उनकी बेचारगी, यह सब इन पात्रों में, उनके संवाद और उनकी आदतों को व्यंग्यात्मक शैली में प्रस्तुत किया गया है।

संग्रह की पहली रचना ‘ज़हर के सौदागर’ लेखक की एक जबरदस्त व्यंग्य रचना है, जिसमें लेखक ने समाज में फैल रही नफरत, हिंसा, अफवाह और स्वार्थ जैसे जहर पर तीखा व्यंग्य किया है। कहानी में ज़हर बेचने वाली एक दुकान का उदाहरण देकर लेखक समाज की वास्तविक स्थिति को उजागर करते हैं। रचना में बताया गया है कि पहले ज़हर का उपयोग सीमित था, लेकिन समय के साथ इसकी माँग तेजी से बढ़ने लगी। यह बढ़ती माँग केवल वास्तविक ज़हर की नहीं, बल्कि समाज में फैल रहे झूठ, नफरत और दुर्भावना जैसे मानसिक ज़हर की ओर संकेत करती है। यहाँ लेखक बड़ी कुशलता से यह दिखाते हैं कि कैसे लोग बिना सोचे-समझे इन विषैले विचारों को फैलाते हैं और समाज को दूषित कर देते हैं।

‘ वाट्सऐप नहीं भाट्सएप’ में समकालीन सामाजिक व्यवहार, विशेषकर व्हाट्सएप समूहों में दिखने वाली प्रवृत्तियों पर एक तीक्ष्ण कटाक्ष किया गया है। आजकल व्हाट्सएप समूहों में होने वाली ‘अतिश्योक्तिपूर्ण’ प्रशंसा और चापलूसी दिखाई गई है। यहाँ हम देखते हैं कि कैसे कुछ सदस्य एक-दूसरे की रचनाओं की अतिश्योक्ति पूर्ण प्रशंसा करते हैं। यदि भूले से उनकी रचनाओं से असहमति जता दी जाए या आलोचना कर दें तो उसे व्यक्तिगत हमले की तरह लिया जाता है। ‘भाषा के हाइवे पर गड्ढे ही गड्ढे’ में समकालीन आलोचना पर गहरा कटाक्ष किया गया है। लेखक कहते हैं कि किसी कृति पर आलोचना देखकर ही पता चल जाता है कि वह मित्र द्वारा लिखी गई है अथवा अमित्र द्वारा। यदि मित्र की रचना है तो अपने ही किसी बंदे से लिखवाकर भेज देता है परन्तु यदि वह अमित्र की है (जो की होती है। क्योंकि लेखक आपस में प्रतिद्वंदिता के चलते अमित्र ही अधिक होते हैं) तो उसपर ऐसी आलोचना लिखी जाती है कि लेखक आत्महीनता का शिकार होकर लिखना ही भूल जाए।’ ‘लाइक बटोरो और कमाओ’ में अलग ही बानगी देखने को मिलती है। यहाँ फेसबुक की उस प्रवृत्ति का प्रदर्शन है जहाँ सारा फ़साना बस लाइक कमेंट का है। अगर जिन्दा हो, तो लाइक कमेंट करके अपने जीवित होने का प्रमाण दो। ‘ईडी है तो प्रजातंत्र स्थिर है’ आज की राजनीति का ज्वलंत उदाहरण है – हम राजनीतिज्ञ हैं दोमुँहे सांप जैसे। हमारे एक तरफ ईडी है तो दूसरी तरफ सीबीआई। हमको काहे का डर?

इसी प्रकार संग्रह में एक से बढ़कर व्यंग्य हैं जो हमारे समाज की राजनैतिक, आर्थिक, मानसिक, धार्मिक विचारधारा, लोगों के दोगलेपन पर सटीक प्रहार करते हैं। लिखने को तो इतना कुछ है कि अगर लिखने बैठूं तो एक पुस्तक ही बन जाएगी। धर्मपाल जी के व्यंग्य से मेरा साक्ष्य पहली बार हुआ है और मैं उनकी पैनी दृष्टि से चमत्कृत हुई हूँ, कायल हुई हूँ। एक व्यंग्यकार बनने के लिए आपमें तीखी दृष्टि, हास्यबोध, बेहतरीन वैचारिक क्षमता और जागरूकता होना बेहद आवश्यक है। धर्मपाल जी ऐसे ही जीनियस रचनाकार हैं जिनकी विचारशीलता का फलक बहुत विस्तृत है। संग्रह के कई व्यंग्य बेहद तीखे बन पड़े हैं- बम्पर घोषणाओं के जमाने में, रक्तबीज का क्या मतलब, होरी खेले व्यंग्य वीरा अवध में, विदेश में परसाई से दो टूक, साहब को जुकाम है पर…, संस्कृति एक संक्रामक बीमारी है, सरकार तुम ट्रिलियन हम पाई, अफवाह को अफवाह रहने दें, सांप अब सभ्य हो गए हैं, साहित्य अकादमी-सी पान गुमटी इत्यादि।

संग्रह की भाषा सरल, चुटीली और प्रभावशाली है। वे भारी-भरकम शब्दों का कहीं भी प्रयोग नहीं करते, बल्कि बहुत सहज भाव में गहरी बात कह देते हैं। कई स्थानों पर व्यंग्य इतना तीक्ष्ण है कि पाठक मुस्कुराते हुए भी समाज और साहित्य की वास्तविकता को महसूस करता है। संग्रह में साहित्यिक आयोजनों, पुरस्कारों की होड़, लेखकों की भंगिमा, उनके स्वार्थ और आलोचना की राजनीति जैसी स्थितियों पर तीक्ष्ण कटाक्ष हैं। धर्मपाल जी अपने व्यंग्यों के माध्यम से यह बताने का प्रयास करते हैं कि साहित्य केवल प्रसिद्धि पाने का साधन नहीं, बल्कि समाज को दिशा देने का माध्यम होना चाहिए।

यह एक ऐसा संग्रह है जो मनोरंजन के साथ-साथ साहित्यिक दुनिया की वास्तविकता को भी जाहिर करता है। धर्मजी की पैनी दृष्टि और हास्यपूर्ण शैली इस पुस्तक को रोचक और प्रभावशाली बनाती है। यह पुस्तक उन पाठकों के लिए एक बेहतरीन उपहार है जो व्यंग्य साहित्य में रुचि रखते हैं। यह एक रोचक व विचारोत्तेजक व्यंग्य-संग्रह है। इसमें लेखक ने साहित्यिक दुनिया की विभिन्न प्रवृत्तियों, दिखावे और विसंगतियों पर तीखे लेकिन हास्यपूर्ण व्यंग्य किए हैं। लेखक की पैनी दृष्टि और चुटीली भाषा इस संग्रह को तीखी धार देती है। मैं इस संग्रह के लिए धर्मपाल जी को बधाई देती हूँ और उनकी आगामी कृति के लिए शुभकामनायें, प्रतीक्षा की घड़ियाँ शुरू हो गई हैं।

©  सुश्री ज्योत्स्ना कपिल

18-ए, विक्रमादित्य पुरी, स्टेट बैंक कॉलोनी, बरेली 243003

मो.- 9412291372

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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