सुश्री इन्दिरा किसलय

☆ पुस्तक समीक्षा ☆

☆ कोई नाम न दो…  –  संपादक- डाॅ शैलेश गुप्त वीर ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

कृति–कोई नाम न दो

संपादक- डाॅ शैलेश गुप्त वीर

समीक्षक- इन्दिरा किसलय

प्रकाशक- श्वेतवर्णा प्रकाशन नई दिल्ली

पृष्ठ-200

मूल्य-349/-

☆ प्रेम का मनोविज्ञान -बदलाव की बयार-“कोई नाम न दो” – सुश्री इन्दिरा किसलय

श्वेतवर्णा प्रकाशन नई दिल्ली से प्रकाशित इस कृति में 79  लघुकथाएँ संग्रहित हैं। सम्पादक हैं बहुभाषाविद् डॉ. शैलेश गुप्त वीर। यूँ भी प्रेम को कोई नाम कैसे दिया जा सकता है। वह तो गूंगे का गुड़ है। शब्दों का सहारा लेकर  अंश-अंश ही व्यक्त हो पाता है। प्रस्तुत संग्रह समकाल में प्रेम की विविध स्थितियों, धारणाओं, सामाजिक मान्यताओं और मनोवैज्ञानिक जटिलताओं का  सूक्ष्म रूपायन करता है।

पुराकाल में निसर्ग के सान्निध्य में परवान चढ़ने वाला लैला-मजनू वाला प्रेम अब इतिहास हो गया या कहें कि छुई मुई संवेदना ने जाग्रत चेतना का दामन थाम लिया है।

स्वतंत्रता, शिक्षा से उत्पन्न जागृति, आर्थिक आत्मनिर्भरता, कानून की स्त्री सापेक्ष स्थिति और टेक्नोलॉजी के बढ़ते चरण मनोभावों को विशाल स्तर पर प्रभावित कर रहे हैं। उपभोक्तावाद और सोच का खुला आकाश, स्त्री-पुरुष समान अधिकारों के तल पर सामाजिक संरचना को आंदोलित कर रहा है।

लघुकथाओं के लघुतम कलेवर में प्रेम के बहुआयामी पार्श्व उभरे हैं जो समाज वैज्ञानिकों के लिए चेतावनी भी है और गहन चिंतन का विषय भी। जिज्ञासा सिंह ने ड्रिंक के केवल एक सिप में वर्जनाओं को तोड़ने की झिझक और सामाजिक मान्यताओं के बदलते स्वरूप का दर्शन करवाया है। सारी कहानियाँ सम्प्रेषणीयता की दृष्टि से अनुपम हैं। कृति में कहीं प्लेटोनिक लव है, कहीं समझदार, कहीं दैहिक आकर्षण, कहीं व्यवहार और कहीं अस्तित्व के प्रति प्रचंड जागरूकता, ऐसे कितने ही रूप रिश्तों में बदलाव की सूचना दे रहे हैं। क्रांति अचानक आकार नहीं लेती शनैः शनैः असंतोष का बारूद इकट्ठा होता है। सामाजिक क्रांति में वर्षों से संचित ताप सतह पर नजर आता है। शुद्ध शब्दों में इन कथाओं को प्रेम का मनोविज्ञान समझाती, स्वप्निल अनुभूति का रूहानी विस्तार करती हुई कथाएँ कह सकते हैं।

मनोज कुमार झा ने “लिव-इन रिलेशनशिप “का एक अलग ही रूप सामने रखा है। रंजना जायसवाल ने विवाह की परंपरागत प्रथा को एक तीखे सवाल से शीशा दिखाया है—-” पिता कहते हैं अनजान व्यक्ति से बात नहीं करनी चाहिए पर शादी कर लेनी चाहिए —–?

राजेंद्र वर्मा की”” घर “”में भी प्रेम विवाह और तलाक को समान अधिकार की पृष्ठभूमि में उकेरा गया है। शिवानी की आईना भी क्रांतिकारी कथा है। अंजू खरबंदा की दृष्टि में” प्रेम पगे रिश्ते “जीवन के स्वीकार की दास्तां है। वार्धक्य को भी प्रेम और  सलीके से जिया जा सकता है। कमल कपूर की “बूढ़े प्रेमपाखी “कहानी यही कहती है। डॉ शैलेश गुप्त वीर की “सच्चा प्यार “प्रणयी जोड़ों के लिए नेत्रोन्मीलक है। डाॅ मिथिलेश दीक्षित की निर्णयकथा प्रभावित करती है। इन्दिरा किसलय कृत “चाहे जो हो ” कहानी एक नौकरीशुदा स्त्री का असफल जीवन और भटकाव की दास्तां कहती है।

कथितव्य है कि इस संग्रह में प्रख्यात लघुकथाकार –सुकेश साहनी, रामेश्वर काम्बोज हिमांशु, संतोष सुपेकर, अंजु दुआ जेमिनी, रघुविन्द्र यादव, विनोद सागर, उमेश महादोषी, योगराज प्रभाकर, सारिका भूषण आदि ने भी अपनी महनीय उपस्थिति दर्ज की है। शिल्प की दृष्टि से देखें तो कथाएं पर्याप्त न्याय कर रही हैं। कथ्य के वैशिष्ट्य के साथ संदर्भगत संवेदना, भाषा की स्पष्ट सामयिक अभिव्यक्ति पर जोर देने की बात संपादक” वीर जी “ने की है।

विगत दो दशक से लघुकथा ने पाठकों के हृदय में भरपूर स्थान पाया है। सुकेश साहनी की “फेस टाइम” ने एक ज्वलंत मुद्दे पर प्रकाश डाला है। सोशल मीडिया के रिश्तों पर पड़नेवाले प्रभाव को दर्शाया है।

नारी अस्मिता, तकनीकी विस्फोट, परंपरा और इक्कीसवीं सदी के बदलते परिदृश्य को चित्रांकित करती है हर लघुकथा। कथाओं की मारक क्षमता अद्वितीय है। कथा चयन हेतु संपादक वीर जी बधाई के पात्र हैं। निर्दोष मुद्रण, विषयानुरूप मुखपृष्ठ के साथ समस्त कथाएं लघुकथा के इतिहास में संपूर्ण अर्थवत्ता के साथ मौजूद हैं। ।

©  सुश्री इंदिरा किसलय 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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