श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # २१ ☆
☆ लघुकथा ☆ ~ मज़बूरी की नींद ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆
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प्रीतम ने टिफिन को साहब के मेज पर रखा लेकिन स्वयं को खड़ा नहीं रख पाया। मेज को सहारा देते हुए आखिरकार वह उकुडू होकर जमीन पर बैठ गया ।
यह क्या प्रीतम! तुम्हारी तबीयत ठीक तो है न बेटा?
तुम्हें तो आज आराम करना चाहिए था… रजनीश जी ने कहा।
प्रीतम कुछ भी जवाब नहीं दे पाया, उसने रजनीश जी की बात से अपनी सहमति जताते हुए सिर हिला दिया, मानो वह कह रहा था कि..सर! सच में मेरी तबीयत आज बहुत खराब है।
वैसे इस समय बहुत तेज वायरल फैला हुआ है,.. तुम्हें आज नहीं आना चाहिए था।
अच्छा तुम अपना बारकोड दिखाओ। मैं कल के टिफिन का ऑनलाइन पेमेंट किये देता हूँ.. रजनीश ने कहा।
प्रीतम ने किसी तरह से जींस के जेब से मोबाइल निकाला और बारकोड खोलकर रजनीश जी के आगे कर दिया। उसके मोबाइल में कल वाले टिफिन का पेमेंट आ गया था ।
प्रीतम ने थम्भ का सिम्बल बनाते हुए कहा.. सर पेमेंट आ गया। तेज ज्वर के बीच हल्की सी सुकून भरी मुस्कान के साथ वह आफिस से बाहर निकल गया।
प्रीतम ने जिस दिन दस हजार रूपये प्रति माह – फिक्स वेतन वाली आउट सोर्स की नौकरी छोड़कर, टिफिन सप्लाई का छोटा सा बिजनेस खोला था, उस दिन उसके चेहरे की खुशी देखने लायक थी। उसका उत्साह परवान चढ़ रहा था। पैसे की तंगी के चलते वह स्वयं ही खाना बनाता था, साथ ही साथ स्वयं ही करीब 20-25 लोगों को विभिन्न ऑफिसेज में टिफिन सप्लाई करता था। उसका पूरा दिन खाना बनाने में और टिफिन सप्लाई करने में बीत जाता था।
ऑफिस बंद होने का वक्त हो गया था लेकिन अभी तक प्रीतम न तो पैसा लेने आया न ही खाली टिफिन उठाने आया था।
शायद आज उसके छोटे से व्यापार, थोड़ी सी खुशियाँ एवं तनिक से उत्साह तीनों के अवकाश का दिन था। वह बुखार से बुरी तरह तप रहा था और पेरासिटामोल की 650 एमजी की गोली खाकर मज़बूरी और चिंता की नींद सो रहा था।
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© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”
लखनऊ, उप्र, (भारत )
दिनांक 22-02-2025
≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈




