श्री राजेश सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # २३ ☆

☆ संदेशप्रद लघुकथा ☆ प्रकृति का संवाद ☆ श्री राजेश सिंह ‘श्रेयस’ ☆

घर के दूसरी मंजिल पर लगी एसी की सफाई करने वाले आ गए थे। इंटीरियर की सफाई हो चुकी थी। अब बारी थी, एसी के आउटर फैन के सर्विसिंग की। अचानक विमलेश की नजरें आउटर फैन के पीछे गोल गोल मुड़े मोटे पाइपों के बीच अपने बच्चों की हिफाजत में बैठी मादा कबूतर पर गयीं।

 उसने देखा की गोल-गोल मुडे पाईप के बीच में कबूतर के जोड़े ने एक छोटा सा घोंसला बना रखा है। शायद इसमें वह और उसके नन्हे नन्हे बच्चे भी थे।

 *

घर के मुखिया नील के आँखों में अपनी आँखों के द्वारा बोलते हुए उस कबूतर मां ने बड़े ही आरत भाव से कहा-

क्या भैया ! आज आप अपने जीवन में थोड़े सुख के लिए मुझे और मेरे बच्चों को आश्रयहीन कर दोगे ??

भैया मेरा घर तो नहीं उजड़ोगे ??

मादा कबूतर की आंखों में आँशु थे और उसके नन्हें तन की भाव भंगिमा में अपने उपर आया महासंकट साफ-साफ झलक रहा था।

मकान से बंधा एसी का आउटर फैन सब कुछ सुन रहा था। आखिरकार जब उससे नहीं रहा गया तो वह बोल ही पड़ा-

भईया !! आप सबकी की सुख सुविधा के लिए मेरा छोटा भाई दिन और रात ठंडी हवा फेकता है। बदले में मुझे क्या मिलता है ! बदले में मुझे गर्म हवा फेंकने पड़ती है। मैं गर्म हवा के थपेड़े झेलता हूं भैया।

खुले प्रकृति में विचरण करने वाले यह पशु -पक्षी, जीव पौधे सभी मुझे भला बुरा कहते हैं।

घर की गर्म हवा के अलावा, धूप, बरसात और जाड़े की पीड़ा झेलता हूँ। मुझे सुकून नहीं मिलता है भईया ! सुकून नहीं मिलता है… यह कहता हुआ एसी का आउटर फैन रो पड़ा।

उसने अपनी बात आगे भी जारी रखी।

भईया ! मुझे तनिक सुकून देने का जब मौका मिला तो मैंने इन दो पक्षियों के जोड़ों को अपने बच्चों को जन्म देने हेतु अपने पीछे आश्रय दे दिया। इनके बच्चों की आवाज सुनता हूं तो मुझे अच्छा लगता है। इन पति पत्नी की आपस की चर्चा को सुनता हूँ तो मेरा भी दिन बीत जाता है। इन्हें क्या, ये मेरे गर्म हवा और कांपते शरीर के बीच बैठक़र पूरा दिन और पूरी रात गुजारा देते हैं।

इन्हें मत उजाड़ना मेरे भैया ! इन्हे मत उजाड़ना। ये प्रकृति की अनमोल धरोहर हैं। प्रकृति के साथ हो रहे खिलवाड़ के कारण इन पशु पक्षीयों का अस्तित्व तो स्वयं ही खतरे में पड़ता चला जा रहा है.. भईया।

अभी मकान नंबर 1135 के दूसरी मंजिल पर लगा आउटर फैन अपनी बात का ही रहा था कि मकान नंबर 1136 के पहले तल्ले पर लगे दूसरे एसी के आउटर फैन के आगे लगा मासूम सा दिखने वाला फूलों से सजा हुआ पौधा बोल पड़ा –

भैया!! जरा मेरी भी दशा देखो। मेरे कुल खानदान ने पूरी जिंदगी मानवता के स्वास्थ, उनके सुखमय जीवन के लिए,शुद्ध ऑक्सीजन, आंखों के आगे एक हरा भरा संसार और आध्यात्मिक शांति के लिए सुंदर-सुंदर फूल दिए। लेकिन आजकल आउटर फैन भैया न जाने क्यों,पूरे दिन और पूरी रात मुझ पर गर्म हवा फेंकते हैं, मेरी पीड़ा को समझिए।

एसी का आउटर फैन लगभग बिलखते हुए बोल पड़ा –

बहन ! यह मेरी मजबूरी है मैं ऐसा निर्जीव इन मनुष्य द्वारा ही बनाया हुआ ढाचा हूं, जो चल फिर नहीं सकता। जहां बैठा दिया जाता हूं वहीं बैठकर अपनी सेवा देता हूं। मेरा रिमोट तो इन चलते फिरते इंसानों के भीतर है। मुझे मजबूरी में उनकी उंगलियों पर ही नाचना पड़ता है। भला इसमें मेरी क्या गलती है। मुझे माफ करना मेरी बहन, मुझे माफ करना…ऐसा कहते हुए दूसरे एसी का आउटर फैन रो पड़ा।

इस संवाद को शायद मूक मानवता के कान सुन रहे थे या नहीं सुन रहे थे लेकिन साहित्य की नजरे और साहित्य की कलम कहां देखने और लिखने से चुकने वाली थी।

अचानक मादा कबूतर आउटर फैन के पीछे से उड़कर सामने के मकान पर लगे सोलर पैनल पर बैठ गई। लेखक की नजरे उधर पड़ी तो वहां का दृश्य और भी अधिक कारूणिक था।

नर कबूतर, अपनी पत्नी से अपनी पूछ पटक पटक कर पूछ रहा था कि –

अजी बोलो ! क्या कोई बात हो गई क्या? हमारे बच्चे सुरक्षित नहीं है क्या ? हे भगवान ! कौन सा खतरा आ गया हमारी सुरक्षा इतनी खतरे में क्यों पड़ती जा रही है।

 उन दोनों पति-पत्नी के बीच में चर्चा हो ही रही थी तब तक लेखक ने देखा कि एसी के मालिक के भीतर का करुणा भाव जगा। उन्होंने एसी के आउटर फैन की सफाई रूकवा दी। शायद विगत दिनों पहाड़ों में हुई भारी त्रासदी की याद, और घर मानव संघार या प्रचंड प्रलय की तस्वीर उनके जेहन में आ गयी थी।

नर और मादा कबूतर दोनों निश्चिंत थे। हल्की-फुल्की सफाई करके मिस्त्री मजदूर जा चुके थे। दुबारा से कबूतर मां अपने बच्चों के पास आ गई थी। उसके मन से घर के मालिक नील के प्रति ढेर सारी दुआएं निकल रही थीं।

***

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

कवि, लेखक, समीक्षक

लखनऊ, उप्र, (भारत )

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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