श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # २४ ☆
☆ लघुकथा ☆ ~ राघव और विश्वास ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆
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सुबह से रात तक सड़क पर अपनी गाड़ी दौड़ाते दौड़ाते राघव बुरी तरह से थक जाता था। अपने ऑटो को चार्जिंग में लगाकर खाना पीना खाकर जब वह बिस्तर पर लेटता तो उसे यह पता भी नहीं चलता कि वह जिंदा भी है। प्रत्येक दिन की भांति आज भी वह घर पहुंचा, लेकिन आज उसके लेटने का दिन नहीं था।
मुनमुनिया बुखार से तप रही थी, साथ ही साथ उसे उल्टी भी हो रही थी। अपनी मुनमुनिया को लेकर राघव और रज्जो दोनों अस्पताल की ओर भागे। पूरे दिन की कमाई के अलावा यही कोई तीन-चार सो रुपए और भी घर में थे। कुल मिलाकर लगभग 1000 ₹1200 से अधिक नहीं था।
जैसे-जैसे राघव का ऑटो आलमबाग की तरफ पढ़ रहा था, सुंदर सी मुनमुनिया की साँसे लम्बी -लंबी चलने लगी।
जरा पीछे मुड़कर देखो तो मुनमुनिया के पापा! देखो न हमारी मुनमुनिया कैसे कर रही है? इसकी सासे उल्टी चल रही है मुनमुनिया के पापा!.. राघव ने पीछे मुड़ देखा तो उसके होश उड़ गए। उससे अब ऑटो चलाए बन नहीं रहा था। किसी तरह से वह नहरिया चौराहे के पास एक बड़े नर्सिंग होम के पास पहुंचा। अस्पताल के रिसेप्शन पर बात की तो मरीज के रजिस्ट्रेशन करने की बात कही गयी। पूरे ₹500 तो रजिस्ट्रेशन में ही खर्च हो गए। अभी शेष इलाज बाकी था। राघव के पसीने छूट रहे थे आखिर वह करें तो क्या करें। इधर पैसे की तंगी उधर मुनमुनिया के लिए एक-एक पल भारी हो रहा था। राघव ने अपने कई ऑटो वाले साथियों को फोन मिलाया लेकिन लगभग सभी ने उटपटांग बातों के सिवाय कुछ भी मदद नहीं की। कई तो नशे में बुरी तरह से धुत होकर गालियां भी दे रहे थे।
राघव को अब कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा था। मुनमुनिया की हालत बिगड़ती चली जा रही थी। उसे वेंटिलेटर पर रखने के सिवाय कोई उपाय शेष नहीं बचा था। बड़े डॉक्टर का इंतजार था।
सर…इनके पास तो पैसे रुपए बिल्कुल नहीं है। कैसे उका इलाज किया जाए। वैसे जरुरी इंजेक्शन वगैरह तो दे दिया गया है लेकिन बच्चे की हालत ठीक नहीं है। बच्चे को अटेंड क़र रहे नर्स और अटेंडेंट ने डॉ विश्वास से यह बातें कहीं।
इस बच्चे को तत्काल वेंटिलेटर पर ले चलो। इसके अकाउंट में अभी ये ₹5000 डिपॉजिट करो, ऐसा कहते हुए डॉ. विश्वास ने नोटों की एक गड्डी नर्स के हाथ में पकड़ा दी। नर्स, अटेंडेंट और रज्जो तीनों हक्के – बक्के थे। रज्जो को विश्वास नहीं हो रहा था उसे लगा कि शायद डॉक्टर के रूप में भगवान ही आ गये। अस्पताल की ओ पी डी की बेंच पर सिसकी भरते हुए उस ऑटो ड्राइवर को डॉक्टर विश्वास ने देखक़र पहचान लिया था, जिसने एक दिन मुश्किल हालत में डॉक्टर साहब और उनके बेटे को एयरपोर्ट पहुंचाया था।
तेलीबाग और उतरेटिया के बीच जाम की स्थिति अत्यंत ही खराब थी। लगभग एक घंटे से कोई भी गाड़ी टस से मस नहीं हो रही थी। डॉ विश्वास को अपने बेटे को छोड़ने एयरपोर्ट जाना था। उनकी फ्लाइट के टेक आफ करने का समय धीरे-धीरे, नजदीक आ रहा था, लेकिन जाम खुलने का नाम नहीं ले रहा था।
हर हाल में हमें फ्लाइट पकड़ना ही होगा नहीं तो मेरा कैरियर बर्बाद हो जाएगा एक बीस बाइस वर्ष के बच्चे को ऐसा कहते हुए राघव ने सुना तो उसके कान खड़े हो गए।
क्यों साहब, बाबू ऐसा क्यों कह रहे हैं। कार की बगल में से गुजर रहे राघव ने डॉ विश्वास से पूछ लिया था।
डॉ विश्वास ने जब सारी बातें राघव से बताई तो राघव ने हाथ जोड़क़र कहा.. साहब आप अपनी कार को थोड़ा सासाइड में दबा कर इधर ही खड़ी कर दीजिए। जाम कब खुलेगा कुछ पता नहीं। मेरे साथ आईये न साहब…मैं कुछ करता हूं। राघव ने हाथ में साहब की अटैची उठाई और गली-गली होते हुए तीनों राघव के घर पहुंच गए।
यहां से गली-गली होते हुए राघव का ऑटो तेजी के साथ एयरपोर्ट की ओर भाग रहा था। सिक्योरिटी वालों ने एयरपोर्ट के पास पहुंचने ऑटो को रोका तो डॉक्टर साहब ने फ्लाइट छूटने का हवाला दिया तो उसे जाने का मौका मिला। डॉक्टर विश्वास का बेटा चेकिंग करने के बाद एयरपोर्ट के अंदर जा चुका था। उसके सपनों की उड़ान के पंख टूटने वाले थे कि राघव सचमुच राघव बन क़र आ गया था।
आज समय स्वयं को दुहरा रहा था। डॉक्टर विश्वास भगवान बन क़र आज मुनमुनिया का इलाज कर रहे थे। यह विश्वास तो राघव को भी नहीं हो रहा था।
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© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”
लखनऊ, उप्र, (भारत )
दिनांक 22-02-2025
≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





